अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
(यदाश्रौषं वनवासे तु पार्थान् समागतान् महर्षिशि: पुराणै: । उपास्यमानान् सगणैर्जातसख्यान् तदा नाशंसे विजयाय संजय ।॥) यदाश्रौषं त्रिदिवस्थं धनज्जयं शक्रात् साक्षाद् दिव्यमस्त्रं यथावत् | अधीयानं शंसितं सत्यसन्ध॑ तदा नाशंसे विजयाय संजय,जब मैंने सुना कि वनवासमें भी कदुन्तीपुत्रोंके पास पुरातन महर्षिगण पधारते और उनसे मिलते हैं। उनके साथ उठते-बैठते और निवास करते हैं तथा सेवक-सम्बन्धियोंसहित पाण्डवोंके प्रति उनका मैत्रीभाव हो गया है। संजय! तभीसे मुझे अपने पक्षकी विजयका विश्वास नहीं रह गया था। जब मैंने सुना कि सत्यसंध धनंजय अर्जुन स्वर्गमें गये हुए हैं और वहाँ साक्षात् इन्द्रसे दिव्य अस्त्र-शस्त्रकी विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और वहाँ उनके पौरुष एवं ब्रह्मचर्य आदिकी प्रशंसा हो रही है, संजय! तभीसे मेरी युद्धमें विजयकी आशा जाती रही
yadāśrauṣaṁ vanavāse tu pārthān samāgatān maharṣibhiḥ purāṇaiḥ | upāsyamānān sagaṇair jātasakhyān tadā nāśaṁse vijayāya sañjaya || yadāśrauṣaṁ tridivasthaṁ dhanañjayaṁ śakrāt sākṣād divyam astraṁ yathāvat | adhīyānaṁ śaṁsitaṁ satyasandhaṁ tadā nāśaṁse vijayāya sañjaya ||
संजय! जब मैंने सुना कि वनवास में भी पृथा-पुत्रों के पास प्राचीन महर्षि अपने गणों सहित आते हैं, उनके साथ उठते-बैठते हैं, उनके बीच निवास करते हैं और पाण्डवों से मैत्री कर चुके हैं—तभी से मुझे अपने पक्ष की विजय का भरोसा न रहा। और जब मैंने सुना कि सत्यसंध धनंजय अर्जुन स्वर्ग में जाकर साक्षात् शक्र (इन्द्र) से विधिपूर्वक दिव्यास्त्रों की शिक्षा पा रहे हैं और वहाँ उनके पराक्रम तथा संयम की प्रशंसा हो रही है—तभी फिर मेरी विजय-आशा जाती रही।