अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
ततः प्रभृति लोके5स्मिन् पूज्य: सर्वधनुष्मताम् । आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्य: समरेष्वपि चाभवत्,तभीसे वे इस लोकमें सम्पूर्ण धनुर्धारियोंक पूजनीय (आदरणीय) हो गये और समरांगणमें प्रचण्ड मार्तण्डकी भाँति प्रतापी अर्जुनकी ओर किसीके लिये आँख उठाकर देखना भी कठिन हो गया
tataḥ prabhṛti loke 'smin pūjyaḥ sarva-dhanuṣmatām | āditya iva duṣprekṣyaḥ samareṣv api cābhavat ||
तभी से इस लोक में वह समस्त धनुर्धारियों के लिए पूजनीय हो गया; और रणभूमि में भी वह आदित्य के समान दुष्प्रेक्ष्य—अर्थात् देखने में कठिन—हो उठा।