
Mukti-tattva Upadeśa: Knowledge as the Direct Cause of Liberation
प्रेतकल्प में आत्मा की दशा और कर्मफल की चर्चा करते हुए गरुड़ परलोक-भय से आगे बढ़कर संसार से मुक्ति का उपाय पूछते हैं। वे विष्णु से मोक्ष का शाश्वत साधन जानना चाहते हैं। भगवान अद्वैत तत्त्व बताते हैं—निर्गुण, स्वप्रकाश ब्रह्म ही सत्य है; अनादि अविद्या और कर्म के उपाधियों से जीव-भेद प्रतीत होता है और सूक्ष्म शरीर मुक्ति तक बना रहता है। फिर उपदेश में तात्कालिकता आती है—मनुष्य-जन्म दुर्लभ है और तत्त्व-ज्ञान के लिए श्रेष्ठ; काल, रोग और मृत्यु विलम्ब को घातक बनाते हैं। आसक्ति, कुसंग, इन्द्रिय-विषय-चोरी, दम्भ और पाखण्ड की निन्दा होती है; केवल कर्मकाण्ड, बाह्य वैराग्य-चिह्न और अनुभूति-विहीन शास्त्र-विवाद को निरर्थक कहा जाता है। अंत में ज्ञान, विवेक और गुरु-उपदेश को प्रत्यक्ष मोक्ष-कारण बताकर, अंतिम समय के लिए वैराग्य, प्रणव (ॐ) जप, प्राण-संयम, ब्रह्म-चिन्तन तथा मोक्ष-क्षेत्रों का निर्देश दिया जाता है। परम्परा, श्रवण-पाठ का फल और पुराण व वक्ता के सम्मान की विधि बताकर, यम-भय को मुक्तिदायी ज्ञान में बदलने वाले प्रेतकल्प के उद्देश्य से इसे जोड़ा जाता है।
Verse 1
मनुष्यस्य सुखदुः खप्रापकधर्माधर्मनिरूपणं नामाष्टचत्वारिंशत्तमो ऽध्यायः गरुड उवाच / श्रुता मया दयासिन्धो ह्यज्ञानाज्जीवसंसृतिः / अधुना श्रोतुमिच्छामि मोक्षोपायं सनातनम्
गरुड़ बोले—हे दया-सिन्धु! मैंने सुना है कि अज्ञान से जीव की संसृति (आवागमन) होती है। अब मैं सनातन मोक्ष-उपाय सुनना चाहता हूँ।
Verse 2
भगवन्देवदेवेश शरणागतवत्सल / असारे घोरसंसारे सर्वदुः खमलीमसे
हे भगवन्, देवों के देवेश, शरणागत-वत्सल! इस असार, घोर संसार में, जो समस्त दुःखों से मलिन है, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।
Verse 3
नानाविधशरीरस्था अनन्ता जीवराशयः / जायन्ते च म्रियन्ते च तेषामन्तो न विद्यते
अनेक प्रकार के शरीरों में स्थित जीव-समूह अनन्त हैं। वे जन्म लेते हैं और मरते हैं, पर उनके लिए इस चक्र का कोई अन्त नहीं दिखता।
Verse 4
सदा दुः खातुरा एव न सखी विद्यते क्कचित् / केनोपायेन मोक्षेश मुच्यन्ते वद मे प्रभो
वे सदा दुःख से पीड़ित रहते हैं; कहीं भी उनका कोई सखा नहीं होता। हे मोक्षेश! किस उपाय से वे मुक्त होते हैं? हे प्रभो, मुझे बताइए।
Verse 5
श्रीभगवानुबाच / शृणु तार्क्ष्य प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि / यस्य श्रवणमात्रेण संसारान्मुच्यते नरः
श्रीभगवान बोले— हे तार्क्ष्य (गरुड़), सुनो; जो तुमने मुझसे पूछा है, उसे मैं कहूँगा। जिसके केवल श्रवण से मनुष्य संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
Verse 6
अस्ति देवः परब्रह्मस्वरूपो निष्कलः शिवः / सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वेशो निर्मलो ऽद्वयः
एक देव हैं जिनका स्वरूप परब्रह्म है— निष्कल, शिव, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश्वर, निर्मल और अद्वैत।
Verse 7
स्वयञ्ज्योतिरनाद्यन्तो निर्विकारः परात्परः / निर्गुणः सच्चिदानन्दस्तदंशा जीवसंज्ञकाः
वह स्वयंज्योति, अनादि-अन्त, निर्विकार और परात्पर हैं। वह निर्गुण सच्चिदानन्द हैं; जीव कहलाने वाले (प्राणी) उनके अंश कहे जाते हैं।
Verse 8
अनाद्यविद्योपहता यथाग्नौ विस्फुलिङ्गकाः / देहाद्युपाधिसम्भिन्नास्ते कर्मभिरनादिभिः
अनादि अविद्या से आच्छादित जीव, अग्नि की चिंगारियों के समान, देह आदि उपाधियों से भिन्न-भिन्न हो जाते हैं— यह भेद अनादि कर्मों के कारण है।
Verse 9
सुखदुः खप्रदैः पुण्यपारूपैर्नियन्त्रिताः / तत्तज्जातियुतं देहमायुर्भोगञ्च कर्मजम्
पुण्य-पापरूप कर्म— जो सुख-दुःख देने वाले हैं— उनके द्वारा जीव नियंत्रित होता है। उसी के अनुरूप जाति-युक्त देह, आयु और भोग— सब कर्मजन्य होते हैं।
Verse 10
प्रतिजन्म प्रपद्यन्ते तेषामपि परं पुनः / ससूक्ष्मलिङ्गशरीरमामोक्षादक्षरं खग
वे जन्म-जन्मांतर में बार-बार देहधारण करते रहते हैं; हे खग (गरुड), उनके लिए भी मोक्ष तक सूक्ष्म लिङ्ग-शरीर सहित अविनाशी सूक्ष्म देह बनी रहती है।
Verse 11
स्थावराः कृमयश्चाजाः पक्षिणः पशवो नगः / धार्मिकास्त्रिदशास्तद्वन्मोक्षिणश्च यथाक्रमम्
कर्मानुसार क्रम से जीव स्थावर, कृमि, बकरी, पक्षी, पशु और मनुष्य बनते हैं; उसी प्रकार कोई धर्मात्मा होता है, कोई त्रिदश (देव) पद पाता है, और कोई क्रमशः मोक्ष को प्राप्त होता है।
Verse 12
चतुर्विधशरीराणि धृत्वा मुक्त्वा सहस्रशः / सुकृतान्मा नवो भूत्वा ज्ञानी चेन्मोक्षमाप्नुयात्
चार प्रकार के शरीरों को हजारों बार धारण करके छोड़ देने पर भी, पुण्य के कारण भी नया (जन्म) न हो; यदि वह ज्ञानी हो, तो मोक्ष को प्राप्त होता है।
Verse 13
चतुरशीतिलक्षेषु शरीरेषु शरीरिणाम् / न मानुषं विनान्यत्र तत्त्वज्ञानन्तु लभ्यते
चौरासी लाख योनियों में देहधारियों के शरीरों में, मनुष्य-देह के बिना कहीं भी तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं होता।
Verse 14
अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि कोटिभिः / कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसञ्चयात्
इस संसार-चक्र में जीव हजारों जन्मों के हजारों करोड़ों के बाद भी, पुण्य-संचय से कभी-कभी ही दुर्लभ मनुष्य-जनम पाता है।
Verse 15
सोपानभूतं मोक्षस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् / यस्तार यति नात्मानं तस्मात्पापतरो ऽत्र कः
मोक्ष की सीढ़ी समान यह दुर्लभ मनुष्य-देह पाकर भी जो अपने आत्मा को संसार-सागर से पार नहीं उतारता, उससे बढ़कर यहाँ पापी कौन है?
Verse 16
नरः प्राप्येतरज्जन्म लब्ध्वा चेन्द्रियसौष्ठवम् / न वेत्त्यात्महितं यस्तु स भवेद्ब्रह्मघातकः
जो मनुष्य यह मानवजन्म पाकर और इन्द्रियों की पूर्ण सामर्थ्य पाकर भी अपने आत्म-हित को नहीं जानता, वह ब्राह्मण-हन्ता के समान निन्दनीय होता है।
Verse 17
विना देहेन कस्यापि पुरुषार्थो न विद्यते / तस्माद्देहं धनं रक्षेत्पुण्यकर्माणि साधयेत्
देह के बिना किसी का भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता। इसलिए देह को धन की भाँति सुरक्षित रखे और पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करे।
Verse 18
रक्षेच्चसर्वदात्मानमात्मा सर्ब्वस्य भाजनम् / रक्षणे यत्नमातिष्ठेज्जीवन् भद्राणि पश्यति
अतः सदा अपने आप की रक्षा करे, क्योंकि आत्मा सबका आधार और पात्र है। आत्म-रक्षा में दृढ़ प्रयत्न करे; जीवित रहते ही शुभ फल देखता है।
Verse 19
पुनर्ग्रामः पुनः क्षेत्र पुनर्वित्तं पुनर्गृहम् / पुनः शुभाशुभं कर्म न शरीरं पुनः पुनः
फिर गाँव मिल सकता है, फिर खेत; फिर धन, फिर घर। फिर शुभ-अशुभ कर्म होते हैं—पर यह शरीर बार-बार नहीं मिलता।
Verse 20
शरीररक्षणोपायाः क्रि यन्ते सर्वदा बुधैः / नेच्छन्ति च पुनस्त्यागमपि कुष्ठादिरोगिणः
बुद्धिमान लोग सदा शरीर की रक्षा के उपाय करते हैं; कुष्ठ आदि रोगों से पीड़ित भी फिर से देह-त्याग नहीं चाहते।
Verse 21
तद्गोपितं स्याद्धर्मार्थं धर्मो ज्ञानार्थमेव च / ज्ञानं तु ध्यानयोगार्थमचिरात्प्रविमुच्यते
उस उपदेश को धर्म के हेतु गोपनीय/संरक्षित रखना चाहिए; और धर्म भी वास्तव में ज्ञान के लिए है। ज्ञान फिर ध्यान-योग के लिए है; उससे शीघ्र पूर्ण मुक्ति होती है।
Verse 22
आत्मैव यदि नात्मानमहीतेभ्यो निवारयेत् / को ऽन्यो हितकरस्तस्मादात्मानं सुखयिष्यति
यदि मनुष्य स्वयं अपने को अहितकारी बातों से न रोके, तो फिर उससे हित करने वाला दूसरा कौन उसे सुखी करेगा?
Verse 23
इहैव नरकव्याधेश्चिकित्सां न करोति यः / गत्वा निरौषधं देशं व्याधिम्थः किं करिष्यति
जो यहाँ ही नरक की ओर ले जाने वाली ‘व्याधि’ का उपचार नहीं करता, वह औषधि-रहित देश में जाकर रोगी होकर क्या कर सकेगा?
Verse 24
व्याघ्रीवास्ते जरा चायुर्याति भिन्नघटाम्बुवत् / निघ्नन्ति रिपुवद्रोगास्तस्माच्छ्रेयः समभ्यसेत
जरा व्याघ्री की भाँति घात लगाए बैठी है, और आयु फूटे घड़े के जल की तरह बह जाती है। रोग शत्रु की तरह मारते हैं; इसलिए परम श्रेय का अभ्यास करना चाहिए।
Verse 25
यावन्नाश्रयते दुः खं यावन्नायान्ति चापदः / यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावच्छ्रेयः समभ्यसेत्
जब तक दुःख ने आश्रय नहीं लिया, जब तक आपदाएँ नहीं आईं और जब तक इन्द्रियाँ क्षीण नहीं हुईं—तब तक मनुष्य को परम श्रेय, अर्थात् आध्यात्मिक कल्याण, का निरन्तर अभ्यास करना चाहिए।
Verse 26
यावत्तिष्ठति देहो ऽयं तावत्तत्त्वं समभ्यसेत् / सन्दीप्तकोशभवने कूपं खनति दुर्मतिः
जब तक यह शरीर टिके, तब तक तत्त्व-ज्ञान का निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। जो मूढ़ जलते हुए भण्डार-गृह में कुआँ खोदता है, वह आग लगने पर जल खोजने वाले के समान है।
Verse 27
कालो न ज्ञायते नानाकार्यैः संसारसम्भवैः / सुखं दुःखं जनो हन्त न वेत्ति हितमात्मनः
संसार से उत्पन्न नाना कार्यों में उलझकर काल का बोध नहीं होता। लोग सुख के पीछे दौड़ते और दुःख से भागते हैं, पर अपने आत्म-हित को नहीं जानते।
Verse 28
जातानार्तान्मृतानापद्भष्टान्दृष्ट्वा च दुः खितान् / लोको मोहसुरां पीत्वा न बिभेति कदाचन
पीड़ितों, मृतकों, आपदा से नष्ट हुए और दुःख में डूबे लोगों को देखकर भी यह लोक मोह-रूपी मदिरा पीकर कभी भयभीत नहीं होता, न जागता है।
Verse 29
सम्पदः स्वप्नसंकाशा यौवनं कुसुमोपमम् / तडिच्चपलमायुष्यं कस्य स्याज्जानतो धृतिः
सम्पत्ति स्वप्न के समान है, यौवन पुष्प के समान। आयु बिजली की चमक-सी चंचल है—यह जानकर किसे प्रमाद में ढील या अस्थिरता हो सकती है?
Verse 30
शतं जीवितमत्यल्पं निद्रालस्यैस्तदर्धकम् / बाल्यरोगजरादुः खैरल्पं तदपि निष्फलम्
सौ वर्ष का जीवन भी अत्यन्त अल्प है; उसका आधा निद्रा और आलस्य में नष्ट हो जाता है। जो शेष रहता है, उसे बाल्य, रोग, जरा और दुःख बहुत थोड़ा कर देते हैं—और वह भी निष्फल हो जाता है।
Verse 31
प्रारब्धव्ये निरुद्योगी जागर्तव्ये प्रसुप्तकः / विश्वस्तश्च भयस्थाने हा नरः को न हन्यते
जहाँ कर्म आरम्भ करना चाहिए वहाँ जो उद्यमहीन रहे, जहाँ जागना चाहिए वहाँ जो सोया रहे, और भय के स्थान में जो विश्वास कर बैठे—हाय! ऐसे दोषों वाला कौन मनुष्य नष्ट नहीं होता?
Verse 32
तोयफेनसमे देहे जीवेनाक्रम्य संस्थिते / अनित्याप्रयसवासे कथ तिष्ठति निर्भयः
जब यह देह जल के फेन के समान है और उसमें जीव आकर निवास करता है—ऐसे अनित्य और दुर्बल आवास में आसक्त होकर कोई कैसे निश्चिन्त (निर्भय) रह सकता है?
Verse 33
अहिते हितसंज्ञः स्यादध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः / अनर्थे चार्थविज्ञानः स्वमर्थं यो न वेत्ति सः
जो अहित को हित समझे, अध्रुव को ध्रुव कहे, और अनर्थ में अर्थ का ज्ञान माने—वह अपने वास्तविक कल्याण को नहीं जानता।
Verse 34
पश्यन्नपि प्रस्खलति शृण्वन्नपि न बुध्यति / पठन्नपि न जानाति देवमायाविमोहितः
देखते हुए भी वह ठोकर खाता है, सुनते हुए भी नहीं समझता; पढ़ते हुए भी नहीं जानता—क्योंकि वह देव-माया से मोहित है।
Verse 35
तन्निमज्जज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे / मृत्युरोगजराग्राहैर्न कश्चिदपि बुध्यते
यह समस्त जगत् गहरे काल-सागर में डूबता जा रहा है; मृत्यु, रोग और जरा रूपी ग्राहों से ग्रस्त होकर भी कोई सचमुच नहीं जागता।
Verse 36
प्रतिक्षणभयं कालः क्षीयमाणो न लक्ष्यते / आमकुंभ इवांभः स्थो विशीर्णो न विभाव्यते
क्षण-क्षण भय देने वाला काल, जो हर पल क्षीण होता जा रहा है, दिखाई नहीं देता; जैसे पानी में रखा कच्चा घड़ा चुपचाप गलता है और पता नहीं चलता।
Verse 37
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम् / ग्रथनञ्च तरङ्गाणामास्था नायुषि युज्यते
वायु को बाँधना, आकाश को टुकड़ों में काटना, या तरंगों को गाँठना—ये सब जितना संभव है, उतना ही जीवन को स्थायी मानकर उस पर भरोसा करना भी अयुक्त है।
Verse 38
पृथिवी दह्यते येन मेरुश्चापि विशीर्यते / शुष्यते सागरजलं शरीरस्य च का कथा
जिस (काल-बल) से पृथ्वी दग्ध होती है और मेरु पर्वत तक चूर-चूर हो जाता है, तथा सागर का जल भी सूख जाता है—तो फिर इस शरीर की क्या बिसात?
Verse 39
अपत्यं मे कलत्रं मे धनं मे बान्धवाश्च मे / जल्पन्तमिति मर्त्याजं हन्ति कालवृको बलात्
“मेरे बच्चे, मेरा पत्नी, मेरा धन, और मेरे बन्धु”—ऐसा बकता हुआ मनुष्य-छाग को काल-रूपी वृक बलपूर्वक मार गिराता है।
Verse 40
इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम् / एवमीहासमायुक्तं कृतान्तः कुरुते वशम्
“यह किया गया, यह करना है, यह दूसरा किया या अधूरा”—ऐसी चंचल दौड़-धूप में बँधा मनुष्य कृतान्त (मृत्यु) के वश में आ जाता है।
Verse 41
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम् / न हि मृत्युः प्रतीक्षेत कृतं वाप्यथ वाकृतम्
कल का काम आज कर ले, और आज का काम भी पूर्वाह्न में कर ले; क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि काम हुआ या नहीं हुआ।
Verse 42
जरादर्शितपन्थानं प्रचण्डव्याधिसैनिकम् / अधिष्ठितो मृत्युशत्रुं त्रातारं किं न पश्यति
जब जरा मार्ग दिखा देती है और प्रचण्ड रोगों की सेना घेर लेती है, तब भी सामना होते हुए मनुष्य त्राता, मृत्यु-शत्रु (भगवान्) को क्यों नहीं देखता?
Verse 43
तृष्णासूचीविनिर्भिन्नं सिक्तं विषयसर्पिषा / रागद्वेषानले पक्वं मृत्युरश्राति मानवम्
तृष्णा की सूई से बेधा हुआ, विषयों के घी से सिक्त, और राग-द्वेष की आग में पका हुआ—ऐसे मनुष्य को मृत्यु पकड़कर निगल जाती है।
Verse 44
बालांश्च यौवनस्थांश्च वृद्धान गर्भगतानपि / सर्वानाविशते मृत्युरेवम्भूमिदं जगत्
बालक हों, यौवन में स्थित हों, वृद्ध हों, या गर्भ में ही हों—मृत्यु सबको आ घेरती है; ऐसा ही यह पृथ्वी-लोक है।
Verse 45
स्वदेहमपि जीवो ऽयं मुक्त्वा याति यमालयम् / स्त्रीमातृपितृपुत्त्रादिसम्बन्धः केन हेतुना
यह जीव अपने ही शरीर को छोड़कर यमलोक को चला जाता है। फिर पत्नी, माता, पिता, पुत्र आदि से संबंध किस कारण से माना जाए?
Verse 46
दुः खमूलं हि संसारः स यस्यास्ति स दुः खितः / तस्य त्यागः कृतो येन स सुखी नापरः क्वचित्
संसार वास्तव में दुःख का मूल है; जो उससे बँधा रहता है वह दुःखी होता है। जिसने उस आसक्ति का त्याग कर दिया वही सुखी है—और कोई कहीं नहीं।
Verse 47
प्रभवं सर्वदुः खानामालयं सकलापदाम् / आश्रयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत्क्षणात्
संसार को समस्त दुःखों का उद्गम, सभी आपदाओं का निवास और सारे पापों का आश्रय जानकर, उसे क्षणभर में ही त्याग देना चाहिए।
Verse 48
लोहदारुमयैः पाशैः पुमान्बद्धो विमुच्यते / पुत्त्रदारमयैः पाशैर्मुच्यते न कदाचन
लोहे या लकड़ी के बंधनों से बँधा मनुष्य छूट सकता है; पर पुत्र और पत्नी के बंधनों से बँधा कभी नहीं छूटता।
Verse 49
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान् / तावन्तो ऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः
जीव मन में जितने प्रिय संबंध बनाता है, उतने ही शोक के शूल उसके हृदय में गड़ जाते हैं।
Verse 50
वञ्चिताशेषवित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशितः / हा हन्त विषयाहारैर्देहस्थोन्द्रियतस्करैः
देह में बसे इन्द्रिय-रूपी चोर विषयों का आहार करके प्राण और सुख को ही खा जाते हैं। उन्हीं से समस्त धन से वंचित होकर लोग नित्य विनाश को प्राप्त होते हैं—हाय, हाय!
Verse 51
मांसलुब्धो यथा मत्स्यो लोहशङ्कुं न पश्यति / सुखलुब्धस्तथा देही यमवाधां न पश्यति
जैसे मांस के लोभ में मछली लोहे के काँटे को नहीं देखती, वैसे ही सुख-लोभी देही यम की यातना और दण्ड को नहीं देखता।
Verse 52
हिताहितं न जानन्तो नित्यमुन्मार्गगामिनः / कुक्षिपूरणनिष्ठा ये ते नरा नारकाः खग
हे खग (गरुड़)! जो हित-अहित को नहीं जानते, सदा कुमार्ग पर चलते हैं, और केवल पेट भरने में लगे रहते हैं—वे नरकवासी बनते हैं।
Verse 53
निद्राभीमैथुनाहाराः सर्वेषां प्राणिनां समाः / ज्ञानवान्मानवः प्रोक्तो ज्ञानहीनः पशुः स्मृतः
निद्रा, भय, मैथुन और आहार—ये सब प्राणियों में समान हैं; ज्ञानवान को ही ‘मानव’ कहा गया है, और ज्ञानहीन को पशु-तुल्य माना गया है।
Verse 54
प्रभाते मलमूत्त्राभ्यां क्षुत्तृड्भ्यां मध्यगे रवौ / रात्रौ मदननिद्राभ्यां बाध्यन्ते मूढमानवाः
प्रातः मूढ़ मनुष्य मल-मूत्र से, मध्याह्न में भूख-प्यास से, और रात्रि में काम तथा निद्रा से पीड़ित होते रहते हैं।
Verse 55
स्वदेहधनदारादिनिरताः सर्वजन्तवः / जायन्ते च म्रियन्ते च हा हन्ताज्ञानमोहिताः
अपने शरीर, धन, पत्नी आदि में आसक्त सभी प्राणी जन्म लेते हैं और मरते हैं—हाय, हाय—अज्ञान से मोहित होकर।
Verse 56
तस्मात्सङ्गः सदा त्याज्यः सचेत्त्यक्तुं न शक्यते / महद्भिः सह कर्तव्यः सन्तः सङ्गस्य भेषजम्
इसलिए आसक्ति और कुसंग सदा त्यागने योग्य हैं। यदि पूर्णतः त्याग न हो सके, तो महापुरुषों और सज्जनों का संग करो—सत्संग ही आसक्ति की औषधि है।
Verse 57
सत्सङ्गश्च विवेकश्च निर्मलं नयनद्वयम् / यस्य नास्ति नरः सो ऽन्धः कथं न स्यादमार्गगः
सत्संग और विवेक—ये दो निर्मल नेत्र हैं। जिनके पास ये नहीं, वह मनुष्य अंधा है; वह सन्मार्ग से कैसे न भटकेगा?
Verse 58
स्वस्ववर्णाश्रमाचारनिरताः सर्वमानवाः / न जानन्ति परं धर्मं वृथा नश्यन्ति दाम्भिकाः
अपने-अपने वर्णाश्रम के आचार में लगे हुए भी लोग परम धर्म को नहीं जानते; दम्भी जन व्यर्थ ही नष्ट हो जाते हैं।
Verse 59
किमायासपराः केचिद्व्रतचर्यादिसंयुताः / अज्ञानसंवृतात्मानः सञ्चरन्ति प्रचारकाः
कुछ लोग केवल परिश्रम में तत्पर, व्रत-चर्या आदि से युक्त होकर भी, अज्ञान से ढके अंतःकरण वाले, उपदेशक बनकर क्यों भटकते फिरते हैं?
Verse 60
नाममात्रेण सन्तुष्टाः कर्मकाण्डरता नराः / मन्त्रोच्चारणहोमाद्यैर्भ्रामिताः क्रतुविस्तरैः
कर्मकाण्ड में रत मनुष्य केवल नाम और बाह्य आडंबर से ही संतुष्ट रहते हैं; मंत्रोच्चार, होम आदि तथा यज्ञों के विस्तृत प्रपंच से वे भ्रमित होकर भटक जाते हैं।
Verse 61
एकभुक्तोपवासाद्यैर्नियमैः कायशोषणैः / मूढाः परोक्षमिच्छन्ति मम मायाविमोहिताः
मेरी माया से मोहित मूढ़ जन एकभुक्त, उपवास आदि देह को सुखाने वाले नियमों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभूति से परे वस्तु को पाना चाहते हैं।
Verse 62
देहदण्डनमात्रेण का मुक्तिरविवेकिनाम् / वल्मीकताडनादेव मृतः किन्नु महोरगः
अविवेकी जन केवल देह-दण्डन से कैसी मुक्ति पाएँगे? यदि वल्मीक पर प्रहार करने से ही काम बनता, तो क्या महा-सर्प मात्र उससे मर जाता?
Verse 63
जटाभाराजिनैर्युक्ता दाम्भिका वेषधारिणः / भ्रमन्ति ज्ञानिवल्लोके भ्रामयन्ति जनानपि
जटाओं का भार और अजिन धारण किए, दम्भी वेषधारी ज्ञानियों के समान लोक में घूमते हैं और लोगों को भी भ्रमित करते हैं।
Verse 64
संसारजसुखासक्तं ब्रह्मज्ञो ऽस्मीतिवादिनम् / कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टं तं त्यजेदन्त्यजं यथा
जो संसारिक सुखों में आसक्त होकर भी ‘मैं ब्रह्मज्ञ हूँ’ कहता है, और कर्म तथा ब्रह्म—दोनों से भ्रष्ट है, उसे वैसे ही त्याग देना चाहिए जैसे अन्त्यज को।
Verse 65
गृहारण्यसमा लोके गतव्रीडा दिगम्बराः / चरन्ति गर्दभाद्याश्च विरक्तास्ते भवन्ति किम्
इस लोक में घर भी वन के समान हो सकते हैं; जो निर्लज्ज होकर नग्न, गधे आदि की भाँति भटकते हैं—क्या केवल इससे वे सचमुच विरक्त हो जाते हैं?
Verse 66
मृद्भस्मोद्धूलनादेव मुक्ताः स्युर्यदि मानवाः / मृद्भस्मवासी नित्यं श्वा स किं मुक्तो भविष्यति
यदि केवल मिट्टी और भस्म का लेपन करने से ही मनुष्य मुक्त हो जाए, तो जो कुत्ता सदा मिट्टी-भस्म में रहता है, क्या वह भी मुक्त हो जाएगा?
Verse 67
तृणपर्णोदकाहाराः सततं वनवासिनः / जम्बूकाखुमृगाद्याश्च तापसास्ते भवन्ति किम्
जो सदा वन में रहकर तिनका, पत्ता और जल का ही आहार लेते हैं—क्या सियार, चूहे, हिरन आदि इसी से तपस्वी हो जाते हैं?
Verse 68
आजन्ममरणान्तञ्च गङ्गादितटिनीस्थिताः / मण्डूकमत्स्यप्रमुखा योगिनस्ते भवन्ति किम्
जो जन्म से मृत्यु तक गंगा आदि नदियों में ही स्थित रहते हैं—मेंढक, मछली आदि—क्या वे इसी से योगी हो जाते हैं?
Verse 69
पारावताः शिलाहाराः कदाचिदपि चातकाः / न पिबन्ति महीतोयं व्रतिनस्ते भवन्ति किम्
कबूतर कंकड़-पत्थर का आहार करते हैं और चातक कभी धरती का जल नहीं पीता—क्या केवल इससे वे व्रती हो जाते हैं?
Verse 70
तस्मान्नित्यादिकं कर्म लोकरञ्जनकारकम् / मोक्षस्य कारणं साक्षातत्त्वज्ञान खगेश्वर
इसलिए, हे खगेश्वर! लोक-हित और लोक-रंजन के लिए किए जाने वाले नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म मोक्ष के प्रत्यक्ष कारण नहीं हैं; मोक्ष का साक्षात् कारण तो तत्त्व-ज्ञान ही है।
Verse 71
षर्ड्शनमहाकूपे पतिताः पशवः खग / परमार्थं न जानन्ति पशुपाशनियन्त्रिताः
हे खग! षड्दर्शन-रूपी महाकूप में गिरे हुए पशु-सदृश जीव, पशुपाशों से नियंत्रित होकर परम अर्थ को नहीं जानते।
Verse 72
वेदशास्त्रार्णवैर्घेरैरुह्यमाना इतस्ततः / षडूर्मिनिग्रहग्रस्तास्तिष्ठन्ति हि कुतार्किकाः
वेद-शास्त्र-रूपी भयानक समुद्र की धाराओं से इधर-उधर बहाए जाते हुए, कुतार्किक लोग षडूर्मियों के निग्रह में फँसकर वहीं अटके रहते हैं।
Verse 73
वेदागमपुराणज्ञः परमार्थं न वेत्ति यः / विडम्बकस्य तस्यैव तत्सर्वं काकभाषितम्
जो वेद, आगम और पुराणों का ज्ञाता होकर भी परम अर्थ नहीं जानता, उस विडम्बक के लिए वह सारा ज्ञान केवल कौए की बक-बक के समान है।
Verse 74
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयमिति चिन्तासमाकुलाः / पठन्त्यहर्निशं शास्त्रं परतत्त्वपराङ्मुखाः
“यह ज्ञान है, यह ज्ञेय है”—ऐसी चिन्ता से व्याकुल होकर, परतत्त्व से विमुख लोग दिन-रात शास्त्र पढ़ते रहते हैं।
Verse 75
वाक्यच्छन्दोनिबन्धेन काव्यालङ्कारशोभिताः / चिन्तया दुःखिता मूढास्तिष्ठन्ति व्याकुलेन्द्रियाः
सुन्दर वाक्य-छन्दों से रचे, काव्यालंकारों से शोभित होकर भी, चिंता से पीड़ित मूढ़ जन व्याकुल इन्द्रियों सहित खड़े रह जाते हैं।
Verse 76
अन्यथा परमं तत्त्वं जनाः क्लिश्यन्ति चान्यथा / अन्यथा शास्त्रसद्भावो व्याख्यां कुर्वन्ति चान्यथा
अन्यथा लोग परम तत्त्व को उलटा समझकर कष्ट पाते हैं; और फिर शास्त्रों के सत्य भाव को भी अन्यथा मानकर विकृत व्याख्या करते हैं।
Verse 77
कथयन्त्युवन्मनीभावं स्वयं नानुभवन्ति च / अहङ्कारस्ताः केचिदुपदेशादिवार्जिताः
वे उन्मनी-भाव (जहाँ वाणी और मन लय हो जाते हैं) की बातें तो कहते हैं, पर स्वयं उसका अनुभव नहीं करते; कुछ तो केवल अहंकार-परायण, सच्चे उपदेश आदि से रहित होते हैं।
Verse 78
पठन्ति वेदशास्त्राणि बोधयन्ति परस्परम् / न जानन्ति परं तत्त्वं दर्वी पाकरसं यथा
वे वेद-शास्त्र पढ़ते हैं और परस्पर उपदेश भी देते हैं, पर परम तत्त्व को नहीं जानते—जैसे पकवान का रस करछी नहीं चखती।
Verse 79
शिरो वहति पुष्पाणि गन्धं जानाति नासिका / पठन्ति वेदशास्त्राणि दुर्लभो भावबोधकः
शिर तो केवल पुष्प ढोता है, सुगन्ध नासिका जानती है; वैसे ही वेद-शास्त्र बहुत पढ़े जाते हैं, पर उनके भाव को जानने वाला दुर्लभ है।
Verse 80
तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्वा मूढः शास्त्रेषु मुह्यति / गोपः कक्षागते च्छागे कूपं पश्यति दुर्मतिः
अपने ही आत्मा में स्थित तत्त्व को न जानकर मूढ़ जन शास्त्रों में भ्रमित होता है; जैसे कक्ष में दबा बकरा होते हुए भी दुर्बुद्धि ग्वाला उसे कुएँ में खोजता है।
Verse 81
संसारमोहनाशाय शाब्दबोधो न हि क्षमः / न निवर्तेत तिमिरं कदाचिद्दीपवार्तया
संसार-मोह के नाश के लिए केवल शब्द-ज्ञान पर्याप्त नहीं; दीपक की बात सुनने मात्र से अंधकार कभी नहीं मिटता।
Verse 82
प्रज्ञाहीनस्य पठनं यथान्धस्य च दर्पणम् / अतः प्रज्ञावतां शास्त्रं तत्त्वज्ञानस्य लक्षणम्
विवेकहीन के लिए शास्त्र-पाठ अंधे के लिए दर्पण समान है; इसलिए विवेकी जन के लिए शास्त्र तत्त्व-ज्ञान का सच्चा लक्षण और साधन है।
Verse 83
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयं सर्वन्तु श्रोतुमिच्छति / दिव्यवर्षसहस्राच्च शास्त्रान्तं नैव गच्छति
‘यह ज्ञान है, यह ज्ञेय है’—फिर भी वह सब कुछ सुनना चाहता है; हजार दिव्य वर्षों के बाद भी वह शास्त्रों के अंत तक नहीं पहुँचता।
Verse 84
अनेकानि च शास्त्राणि स्वल्पायुर्विघ्नकोटयः / तस्मात्सारं विजानीयात्क्षीरं हंस इवाम्भसि
शास्त्र अनेक हैं, आयु अल्प है और विघ्न करोड़ों हैं; इसलिए सार को पहचानकर ग्रहण करो—जैसे जल में हंस दूध को अलग कर लेता है।
Verse 85
अभ्यस्य वेदशास्त्राणि तत्त्वं ज्ञात्वाथ बुद्भिमान् / पलालमिव धान्यार्थी सर्वशास्त्राणि सन्त्यजेत्
वेद-शास्त्रों का अभ्यास करके और तत्त्व को जानकर बुद्धिमान पुरुष को समस्त शास्त्रीय विवाद छोड़ देना चाहिए—जैसे धान्य चाहने वाला भूसी को त्याग देता है।
Verse 86
यथामृतेन तृप्तस्य नाहारेण प्रयोजनम् / तत्त्वज्ञस्य तथा तार्क्ष्य न शास्त्रेण प्रयोजनम्
हे तार्क्ष्य (गरुड़)! जैसे अमृत से तृप्त व्यक्ति को साधारण आहार की आवश्यकता नहीं रहती, वैसे ही तत्त्वज्ञ को शास्त्र-आश्रय की आगे आवश्यकता नहीं रहती।
Verse 87
न वेदाध्ययनान्मुक्तिर्न शास्त्रपठनादपि / ज्ञानादेव हि कैवल्यं नान्यथा विनतात्मजः
हे विनता-आत्मज (गरुड़)! केवल वेदाध्ययन से मुक्ति नहीं होती, न ही शास्त्र-पाठ से; कैवल्य तो केवल ज्ञान से ही प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।
Verse 88
नाश्रमः कारणं मुक्तेर्दर्शनानि न कारणम् / तथैव सर्वकर्माणि ज्ञानमेव हि कारणम्
न तो आश्रम (जीवन-स्थिति) मुक्ति का कारण है, न दर्शन-मत कारण हैं; वैसे ही कर्मों का समूह भी कारण नहीं—ज्ञान ही वास्तव में कारण है।
Verse 89
मुक्तिदा गुरुवागेका विद्याः सर्वा विडम्बिकाः / शास्त्रभारसहस्रेषु ह्येकं सञ्जीवनं परम्
गुरु-वाणी का एक वचन ही मुक्ति देने वाला है; अन्य सब विद्याएँ केवल दिखावा हैं। हजारों शास्त्र-भारों के बीच वही एक परम संजीवनी उपदेश है।
Verse 90
अद्वैतं हि शिवं प्रोक्तं क्रिययापरिवर्जितम् / गुरुवक्त्रेण लभ्येत नाधीतागमकोटिभिः
शिव को अद्वैत कहा गया है, जो कर्मकाण्ड की सीमा से परे हैं। वे गुरु के मुख से प्राप्त उपदेश से मिलते हैं, करोड़ों आगम पढ़ने से नहीं।
Verse 91
आगमोक्तं विवेकोत्थं द्विधा ज्ञानं प्रचक्षते / शब्दव्रह्मागममयं परं ब्रह्म विवेकजम्
ज्ञान दो प्रकार का कहा गया है—आगम से कहा हुआ और विवेक से उत्पन्न। पहला शब्द-ब्रह्म रूप आगममय है, और परब्रह्म का साक्षात्कार विवेक से होता है।
Verse 92
अद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चापरे / समं तत्त्वं न जानन्ति द्वैताद्द्वैतविवर्जितम्
कुछ लोग अद्वैत चाहते हैं और कुछ द्वैत; पर वे उस सम तत्त्व को नहीं जानते जो द्वैत और अद्वैत—दोनों से रहित है।
Verse 93
द्वे पदे बन्धमोक्षाय नममेति ममेति च / ममेति बध्यते जन्तुर्नममेति प्रमुच्यते
बंधन और मोक्ष के लिए दो ही शब्द हैं—‘मेरा’ और ‘मेरा नहीं’। ‘मेरा’ से जीव बँधता है, ‘मेरा नहीं’ से मुक्त होता है।
Verse 94
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तिदा / आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम्
वही कर्म है जो बंधन का कारण न बने; वही विद्या है जो मुक्ति दे। अन्य कर्म केवल परिश्रम है, और अन्य ‘विद्या’ मात्र शिल्प-कौशल है।
Verse 95
यावत्कर्माणि दीप्यन्ते यावत्संसारवासना / यावदिन्द्रियचापल्यं तावत्तत्त्वकथा कुतः
जब तक कर्मों की ज्वाला प्रज्वलित है, जब तक संसार-वासना बनी रहती है और इन्द्रियाँ चंचल हैं—तब तक तत्त्व की कथा कैसे हो सकती है?
Verse 96
यावद्देहाभिमानश्च ममता यावदेव हि / यावत्प्रयत्नवेगो ऽस्ति यावत्संकल्पकल्पना
जब तक देहाभिमान और ‘मेरा’ की ममता है; जब तक प्रयत्न का वेग बना है; तब तक संकल्प और कल्पना रूपी मनोवृत्तियाँ उठती रहती हैं।
Verse 97
यावन्नो मनसः स्थैर्यं न यावच्छास्त्रचिन्तनम् / यावन्न गुरुकारुण्यं तावत्तत्त्वकथा कुतः
जब तक मन में स्थैर्य नहीं, जब तक शास्त्र-चिन्तन नहीं, और जब तक गुरु की करुणा-प्रसाद नहीं—तब तक तत्त्व की सच्ची कथा कैसे हो?
Verse 98
तावत्तपो व्रतं तीर्थं जपहोमार्चनादिकम् / वेदशास्त्रागमकथा यावत्तत्त्वं न विन्दति
तप, व्रत, तीर्थ-यात्रा, जप-होम-पूजन आदि, तथा वेद-शास्त्र-आगम की कथाएँ—ये सब तब तक ही हैं, जब तक तत्त्व का साक्षात्कार नहीं होता।
Verse 99
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वावस्थासु सर्वदा / तत्त्वनिष्ठो भवेत्तार्क्ष्य यदीच्छेन्मोक्षमात्मनः
इसलिए, हे तार्क्ष्य (गरुड़), सर्वदा और सर्वावस्थाओं में, समस्त प्रयत्न से तत्त्व में निष्ठावान रहो—यदि अपने लिए मोक्ष चाहते हो।
Verse 100
धर्मज्ञानप्रसूनस्य स्वर्गमोक्षफलस्य च / तापत्रयादिसन्तप्तश्छायां मोक्षतरोः श्रयेत्
धर्म और आत्मज्ञान से पुष्पित मोक्ष-वृक्ष स्वर्ग तथा परम-मुक्ति के फल देता है। तापत्रय आदि से दग्ध जन को उसी मोक्षतरु की छाया में शरण लेनी चाहिए।
Verse 101
तस्माज्ज्ञानेनात्मतत्त्वं विज्ञेयं श्रीगुरोर्मुखात् / सुखेन मुच्यते जन्तुर्घोरसंसारबन्धनात्
अतः मुक्तिदायक ज्ञान द्वारा आत्मतत्त्व को श्रीगुरु के मुख से जानना चाहिए; तब जीव घोर संसार-बन्धन से सहज ही मुक्त हो जाता है।
Verse 102
तत्त्वज्ञस्यान्तिमं कृत्यं शृणु वक्ष्यामि ते ऽधुना / येन मोक्षमवाप्नोति ब्रह्म निर्वाणसंज्ञकम्
तत्त्वज्ञानी का अंतिम कर्तव्य सुनो, अब मैं तुम्हें बताता हूँ—जिससे वह मोक्ष, अर्थात् निर्वाण नामक ब्रह्म-स्थिति को प्राप्त करता है।
Verse 103
अन्तकाले तु पुरुष आगते गतसाध्वसः / छिन्द्यादसंगशस्त्रेण स्पृहां देहे ऽनु या च तम्
परन्तु अंतकाल आ जाने पर, भय-रहित पुरुष को असंग-रूपी शस्त्र से देह के प्रति जो स्पृहा पीछे-पीछे चलती है, उसे काट देना चाहिए।
Verse 104
गृहात्प्रव्राजितो धीरः पुण्यतीर्थजलाप्लुतः / शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने
धीर पुरुष गृहत्याग कर, पुण्यतीर्थ के जल में स्नान करके, शुद्ध एकान्त स्थान में विधिपूर्वक रचित आसन पर बैठ जाए।
Verse 105
अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम् / मनो यष्छेज्जितश्वासो ब्रह्म बीजमविस्मरन्
शुद्ध मन से परम त्रिविध ब्रह्माक्षर (अ-उ-म्) का निरन्तर अभ्यास करे। मन को वश में कर, श्वास को जीतकर, ब्रह्म-बीज (प्रणव) को कभी न भूले।
Verse 106
नियच्छेद्विषयेभ्यो ऽक्षान्मनसा बुद्धि सारथिः / मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया
मन के द्वारा बुद्धि—सारथी बनकर—इन्द्रियों को विषयों से रोके। कर्मों से खिंचे हुए मन को विवेक से शुभ लक्ष्य में स्थिर रखे।
Verse 107
अहं ब्रह्म परं धाम ब्रह्माहं परमं पदम् / एवं समीक्ष्य चात्मानमात्मन्याधाय निष्कले
“मैं ब्रह्म हूँ, परम धाम; मैं ब्रह्म हूँ, परम पद।” इस प्रकार आत्मा का चिंतन करके, अपने को निष्कल आत्मा में स्थापित करे।
Verse 108
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् / यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्
‘ॐ’—एकाक्षर ब्रह्म—का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए, जो देह त्यागकर प्रस्थान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
Verse 109
न यत्र दाम्भिका यान्ति ज्ञानवैराग्यवर्जिताः / सुधियस्तां गतिं यान्ति तानहं कथयामि ते
जहाँ ज्ञान और वैराग्य से रहित दम्भी नहीं जाते, उसी गति को सुबुद्धि जन प्राप्त करते हैं; वही गन्तव्य मैं तुम्हें बताता हूँ।
Verse 110
निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः / द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुः खसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्
जो मान और मोह से रहित हैं, आसक्ति-जन्य दोषों को जीत चुके हैं, अध्यात्म में नित्य स्थित हैं और जिनकी कामनाएँ शांत हो गई हैं—सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त वे अमूढ़ उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
Verse 111
ज्ञानह्रदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे / यः स्नाति मानसे तीर्थे स वै मोक्षमवाप्नुयात्
ज्ञान-ह्रद और सत्य-जल वाले, राग-द्वेष के मल को हरने वाले उस मानस-तीर्थ में जो स्नान करता है, वह निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
Verse 112
प्रौढवैराग्यमास्थाय भजते मामनन्यभाक् / पूर्णदृष्टिः प्रसन्नात्मा स वै मोक्षमवाप्नुयात्
जो प्रौढ़ वैराग्य धारण करके अनन्य-भक्ति से मेरा भजन करता है—जिसकी दृष्टि पूर्ण है और आत्मा प्रसन्न है—वह निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
Verse 113
त्यक्त्वा गृहं च यस्तीर्थे निवसेन्मरणोत्सुकः / मुक्तिक्षेत्रेषु म्रियते स वै मोक्षमवाप्नुयात्
जो गृह का त्याग करके तीर्थ में मरण-उत्सुक होकर निवास करता है, और मुक्ति-क्षेत्रों में देह त्याग करता है—वह निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
Verse 114
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिक / पुरी द्वारवती ज्ञेयाः सप्तैता मोक्षदायिकाः
अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा पुरी और द्वारवती (द्वारका)—ये सातों मोक्ष देने वाली पवित्र पुरियाँ जाननी चाहिए।
Verse 115
ज्ञानवैराग्यसहितं श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्
ज्ञान और वैराग्य सहित इस उपदेश को सुनकर मनुष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
Verse 116
मोक्षं गच्छन्ति तत्त्वज्ञा धार्मिकाः स्वर्गतिं नराः / पापिनो दुर्गतिं यान्ति संसरन्ति खगादयः
तत्त्वज्ञानी मोक्ष को जाते हैं; धर्मात्मा पुरुष स्वर्गगति को प्राप्त होते हैं। पापी दुर्गति को जाते हैं, और पक्षी आदि योनियाँ बार-बार संसार में भटकती रहती हैं।
Verse 117
सूत उवाच / स्वप्रश्रोत्तरराद्धान्तमेवं भगवतो मुखात् / श्रुत्वा हृष्टतनुस्तार्क्ष्यो ननाम जगदीश्वरम्
सूत बोले—अपने प्रश्नों और उनके उत्तरों से निकले इस सिद्धान्त को भगवान् के मुख से सुनकर, हर्ष से रोमांचित शरीर वाले तार्क्ष्य (गरुड़) ने जगदीश्वर को प्रणाम किया।
Verse 118
सन्देहो मे महान्नष्टो भवद्वाक्यविरोचनात् / इत्युक्त्वा विष्णुमामन्त्र्य स गतः कश्यपाश्रमम्
आपके वचनों की प्रकाशमयी स्पष्टता से मेरा महान् सन्देह नष्ट हो गया। ऐसा कहकर उसने भगवान् विष्णु से अनुमति लेकर कश्यप के आश्रम को प्रस्थान किया।
Verse 119
सद्यो देहान्तरं याति यथा याति विलम्बतः / अनयोरुभयोश्चैव न विरोधस्तथैव वः
जैसे (जीव) तुरंत दूसरे देह में चला जाता है, वैसे ही वह विलम्ब से भी जाता है। इन दोनों कथनों में कोई विरोध नहीं है—इसी प्रकार समझो।
Verse 120
सर्वमाख्यातवांस्तात श्रुतो भगवतो यथा / मारीचो ऽपि मुदं लेभे श्रुत्वा वाक्यं रमापतेः
प्रिय तात, मैंने भगवान से जैसा सुना था वैसा ही सब कुछ कह दिया। रमापति के वचन सुनकर मरीचि ने भी महान् आनंद पाया।
Verse 121
अपाकृतस्तु सन्देहो ब्राह्मणा भवतां मया / उक्तं सुपर्णसंज्ञन्तु पुराणं परमाद्भुतम्
हे ब्राह्मण, तुम्हारा संदेह मैंने दूर कर दिया है; और ‘सुपर्ण’ नामक यह परम अद्भुत पुराण भी कह दिया गया।
Verse 122
इदमाप हरेस्तार्क्ष्यस्तार्क्ष्यादाप ततो भृगुः / भृगोर्वसिष्ठः संप्राप वामदेवस्ततः पुनः
यह उपदेश हरि से तार्क्ष्य (गरुड़) ने पाया; तार्क्ष्य से फिर भृगु ने; भृगु से वसिष्ठ ने प्राप्त किया; और उसके बाद वामदेव ने पुनः ग्रहण किया।
Verse 123
पराशरमुनिः प्राप तस्माद्व्यासस्ततो ह्यहम् / मया तु भवतां प्रोक्तं परं गुह्यं हरेरिदम्
उससे पराशर मुनि ने प्राप्त किया; फिर व्यास ने, और फिर वास्तव में मैंने। और मैंने तुमसे हरि का यह परम गोपनीय उपदेश कहा है।
Verse 124
य इदं शृणुयान्मर्त्यो यो वाप्यभिदधाति च / इहामुत्र च लोके स सर्वत्र सुखमाप्नुयात्
जो मनुष्य इसे सुनता है या इसका पाठ भी करता है, वह इस लोक और परलोक—दोनों में—सर्वत्र सुख प्राप्त करता है।
Verse 125
व्रजतः संयमन्यां यद्दुः खमत्र निरूपितम् / अस्य श्रवणतः पुण्यं तन्मुक्तो जायते ततः
संयमनी (यमधाम) की यात्रा करने वाले पर जो दुःख यहाँ कहा गया है, उसका केवल श्रवण करने से पुण्य उत्पन्न होता है और फिर मनुष्य उससे मुक्त हो जाता है।
Verse 126
अत्रोक्तकर्मपाकादिश्रवणाच्च नृणामिह / वैराग्यमावहेद्यस्मात्तस्माच्छ्रोतव्यमेव च
यहाँ बताए गए कर्म-फल आदि का श्रवण करने से इस लोक के मनुष्यों में वैराग्य उत्पन्न होता है; इसलिए इसे अवश्य सुनना चाहिए।
Verse 127
भजत जितहृषीकाः कृष्णमेनं मुनीशं समजनि बत यस्माद्गीः सुधासारधारा / पृषतमपि यदीयं वर्णरूपं निपीय श्रुतिपुटचुलुकेन प्राप्नुयादात्मनैक्यम्
हे इन्द्रियों को जीतने वालों! इस कृष्णवर्ण मुनिश्रेष्ठ का भजन करो; क्योंकि इन्हीं से अमृत-धारा-सी वाणी प्रकट हुई है। इनके वचन का एक बूँद भी कानों की अंजलि से पी लिया जाए तो आत्म-एकत्व की प्राप्ति हो सकती है।
Verse 128
व्यास उवाच / वैष्णवीं वाक्सुधां पीत्वा ऋषयस्तुष्टिमाययुः
व्यास ने कहा—वैष्णव वाणी-रूपी अमृत को पीकर ऋषियों ने परम तृप्ति पाई।
Verse 129
प्रशशंसुस्तथान्योन्यं सूतं सर्वार्थदर्शिनम् / प्रहर्षमतुलं प्रापुर्मुनयः शौनकादयः
तब परस्पर प्रशंसा करते हुए शौनक आदि मुनियों ने सर्वार्थदर्शी सूत की स्तुति की और अतुल हर्ष को प्राप्त हुए।
Verse 130
स मुनिरपि निशम्य शौनकेन्द्रो बहुतरमानयति स्म चात्मनि स्वम्
यह सुनकर वह मुनि भी—मुनियों में श्रेष्ठ शौनक—उस बात को अपने हृदय में गहराई से धारण कर भीतर ही भीतर मनन करने लगे।
Verse 131
अपूजयंस्ते मुनयस्तदानीमुदाखाग्भिर्मुहुरेव सूतम् / धन्यो ऽसि सूत त्वमिहेत्युदैरयन्व्यसर्जयंस्तं च निवर्तिते ऽध्वरे
तब उन मुनियों ने उदार वचनों से बार-बार सूत का सम्मान किया और बोले, “हे सूत, तुम धन्य हो, यहाँ निश्चय ही!” फिर यज्ञ समाप्त होने पर उन्होंने आदरपूर्वक उन्हें विदा किया।
Verse 132
पुराणं गारुडं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् // शृण्वतां कामनापूरं श्रोतव्यं सर्वदैव हि
गारुड़ पुराण पुण्यदायक, पवित्र और पापों का नाश करने वाला है। इसे सुनने वालों की कामनाएँ पूर्ण होती हैं; इसलिए इसे सदा अवश्य सुनना चाहिए।
Verse 133
श्रुत्वा दानानि देयानि वाचकायाखिलानि च / पूर्वोक्तशयनादीनि नान्यथा सफलं भवेत्
इसे सुनने के बाद वाचक को समस्त नियत दान देने चाहिए; और पूर्वोक्त शयन-नियम आदि व्रतों का पालन करना चाहिए, अन्यथा फल सिद्ध नहीं होता।
Verse 134
पुराणं पूजयेत्पूर्वं वाचकं तदनन्तरम् / वस्त्रालङ्कारगोदानैर्दक्षिणाभिश्च सादरम्
पहले पुराण का पूजन करना चाहिए, फिर उसके बाद वाचक का। श्रद्धापूर्वक वस्त्र, आभूषण, गोदान तथा दक्षिणा आदि अर्पित करनी चाहिए।
Verse 135
अन्नदानैर्हेमदानैर्भमिदानैश्च भूरिभिः / पूजयेद्वाचकं भक्त्या बहुपुण्यफलाप्तये
अन्नदान, सुवर्णदान और प्रचुर भूमिदान से भक्तिभावपूर्वक वाचक का पूजन करे, जिससे महान् पुण्यफल की प्राप्ति हो।
Verse 136
यश्चेदं शृणुयान्मर्त्यो यथापि परिकीर्तयेत् / विहाय यातनां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत्
जो मनुष्य इसे सुनता है और इसी प्रकार इसका कीर्तन करता है, वह घोर यातनाओं को त्यागकर, पापों से शुद्ध होकर स्वर्ग को प्राप्त होता है।
It explains that due to beginningless avidyā and karma, the jīva appears differentiated through bodily upādhis and repeatedly takes birth; the imperishable subtle/liṅga body continues across births and persists until liberation, when true knowledge dissolves bondage.
It honors scripture as a means of instruction but warns that mere recitation, debate, and accumulation of texts without realization do not end delusion—likening it to discussing a lamp without removing darkness; discernment and direct knowledge are required.
It recommends cutting attachment with non-attachment, sitting in purity and seclusion, practicing praṇava (A-U-M), controlling breath and mind, restraining senses, and contemplating identity with Brahman while remembering the Lord; departing with ‘Om’ and remembrance leads to the supreme destination.