
An exposition on the fruits of charity and on entry into a body (Garbhotpatti, Piṇḍa-śarīra, and Antya-kāla-kriyā)
प्रेतकल्प में कर्म और जीव के संक्रमण की चर्चा आगे बढ़ती है। गरुड़ विष्णु से पूछते हैं कि देहधारण कैसे होता है और शरीर के घटक कैसे बनते हैं। विष्णु गर्भाधान से भ्रूण-विकास तक क्रमवार वर्णन करते हैं; शुक्र-शोणित के अनुपात से लिंग-भेद और गर्भाधान के समय माता-पिता के संकल्प से स्वभाव-भेद बताते हैं। फिर योग-शरीर-विज्ञान में नाड़ियाँ, दस वायु, इन्द्रियाँ और पंचभूत-गुण, तथा शरीर के माप-मान का निरूपण कर यह प्रतिपादित करते हैं कि सुख-दुःख और भाग्य अपने ही कर्म से उत्पन्न होते हैं। इसके बाद निकट-मृत्यु वाले के लिए स्नान-शुद्धि, शय्या/विधि-व्यवस्था, शरीर की दिशा, स्वर्ण/शालग्राम/तुलसी का विन्यास, मंत्र-जप और दान आदि का उपदेश देकर बताते हैं कि इसका फल विष्णु-स्मरण से ज्ञान की प्राप्ति है। अंत में पिण्ड-ब्रह्माण्ड-साम्य (लोक, द्वीप, सागर, ग्रहों का देह में प्रतिरूप) समझाकर कर्माधीन मृत्यु-पुनर्जन्म की अनिवार्यता दोहराते हैं।
Verse 1
दानफ लान्यदेहप्रवेशादिनिरूपणं नामै कत्रिंशो ऽध्यायः तार्क्ष्य उवाच / कथमुत्पद्यते जन्तुर्भूतग्रामे चतुर्विधे / त्वचा रक्तं तथा मांसं मेदो मज्जास्थि जीवितम्
यह ‘दान के फल तथा अन्य देह-प्रवेश आदि का निरूपण’ नामक एकतीसवाँ अध्याय है। तार्क्ष्य (गरुड) बोले—चार प्रकार के भूतसमूह में जीव कैसे उत्पन्न होता है? त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और प्राण कैसे बनते हैं?
Verse 2
पादौ पाणी तथा गुह्यं जिह्वा-केश-नखाः शिरः / सन्धिमार्गाश्च बहुशो रेखा नैकविधास्तथा
पाँव और हाथ, गुप्तेन्द्रिय, जिह्वा, केश, नख और शिर—तथा संधियों के अनेक मार्ग और अनेक प्रकार की रेखाएँ भी होती हैं।
Verse 3
कामः क्रोधो भयं लज्जा मनो हर्षः सुखासुखम् / चित्रितं छिद्रितञ्चापि नानाजालेन वेष्टितम्
काम, क्रोध, भय, लज्जा, मन, हर्ष तथा सुख-दुःख के द्वन्द्व—यह अन्तःकरण मानो रंगा हुआ, छिद्रों से भरा हुआ, और नाना जालों में लिपटा-बँधा हुआ है।
Verse 4
इन्द्रजालमिदं मन्ये संसारे ऽसारसागरे / कर्ता को ऽत्र हृषीकेश संसारे दुः खसंकुले
मैं इस संसार को इन्द्रजाल-सा मायामय, सार-रहित सागर मानता हूँ। हे हृषीकेश! दुःख से भरे इस जगत में वास्तव में कर्ता कौन है?
Verse 5
श्रीविष्णुरुवाच / कथयामि परं गोप्यं कोशस्यास्य विनिर्णयम् / यस्य विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रज्यते
श्रीविष्णु बोले—मैं इस कोश का परम गोप्य निर्णय बताता हूँ; जिसके केवल ज्ञान से ही सर्वज्ञता जाग उठती है।
Verse 6
साधु पृष्टं त्वया लोके सदयं जीवकारणम् / वैनतेय शृणुष्व त्वमेकाग्रकृतमानसः
तुमने करुणा-भाव से इस लोक में जीवों के कारण के विषय में उत्तम प्रश्न किया है। हे वैनतेय! एकाग्र चित्त होकर सुनो।
Verse 7
ऋतुकाले च नारीणां वर्ज्यं दिनचतुष्टयम् / यतस्तस्मिन् ब्रह्महत्यां पुरा वृत्रसमुत्थिताम्
स्त्रियों के ऋतुकाल में चार दिन वर्ज्य माने गए हैं; क्योंकि उस समय, कहते हैं, प्राचीन वृत्र-समुत्थ ब्रह्महत्या (का दोष) उपस्थित रहता है।
Verse 8
ब्रह्मा शक्रात् समुत्तार्य चतुर्थांशेन दत्तवान् / तावन्नालोक्यते वक्त्रं पापं यावद्वपुः स्थितम्
ब्रह्मा ने शक्र (इन्द्र) से उसे छुड़ाकर केवल चौथाई अंश ही प्रदान किया। जब तक पापमय देह-स्थिति बनी रही, तब तक उसका मुख दर्शन में नहीं आया।
Verse 9
प्रथमे ऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी / तृतीये रजकी ज्ञेया चतुर्थे ऽहनि शुध्यति
पहले दिन वह चाण्डाली मानी जाती है, दूसरे दिन ब्राह्मण-हत्या की दोषिणी; तीसरे दिन वह रजकी (धोबिन) कही जाती है, और चौथे दिन शुद्ध हो जाती है।
Verse 10
सप्ताहात् पितृदेवानां भवेद्योग्या कृतार्चने / सप्ताहमध्ये यो गर्भस्तत्संम्भूतिर्मलिम्लुचा
सात दिन के बाद पितृदेवताओं के लिए किया गया अर्चन/पिण्ड-दान योग्य और फलदायी होता है। पर यदि उन सात दिनों के भीतर गर्भ ठहर जाए, तो वह संतान ‘मलिम्लुच’—अशुद्ध/अमंगल—कही जाती है।
Verse 11
निषकसमये पित्रोर्यादृक् चित्तविकल्पना / तादृग्गर्भसमुत्पत्तिर्जायते नात्र संशयः
गर्भाधान के समय माता-पिता के मन में जैसी भावना और संकल्प होता है, वैसा ही स्वभाव वाला गर्भ उत्पन्न होता है—इसमें कोई संशय नहीं।
Verse 12
युग्मासु पुत्त्रा जायन्ते स्त्रियो ऽयुग्मासु रात्रिषु / पूर्वसप्तममुत्सृज्य तस्माद्युग्मासु संविशेत्
सम रात्रियों में पुत्र की, और विषम रात्रियों में कन्या की गर्भधारणा कही गई है। इसलिए प्रथम सात रात्रियाँ छोड़कर सम रात्रियों में संगमन करना चाहिए।
Verse 13
षोडशर्तुर्निशाः स्त्रीणां सामान्यात् समुदाहृतः / या चतुर्दशमी रात्रिर्गर्भस्तिष्ठति तत्र चेत्
स्त्रियों का सामान्यतः सोलह रात्रियों का ऋतु-काल कहा गया है। यदि चौदहवीं रात्रि में गर्भ ठहर जाए, तो शास्त्रानुसार उसका विशेष फल बताया गया है।
Verse 14
गुणभाग्यनिधिः पुत्रस्तत्र जायेत धार्मिकः / सा निशा तत्र सामान्यैर्न लभ्येत खगाधिप
वहाँ गुण और सौभाग्य का निधि, धर्मपरायण पुत्र जन्म लेता है। हे खगाधिप! ऐसी शुभ रात्रि साधारण जनों को सहज नहीं मिलती।
Verse 15
प्रायशः सम्भवत्यत्र गर्भस्त्वष्टाहमध्यतः / पञ्चमे ऽहनि नारीणां कार्यं माधुर्यभोजनम्
प्रायः इस विषय में गर्भ आठ दिनों की अवधि के मध्य में ठहरता है। और पाँचवें दिन स्त्रियों को मधुर, पुष्टिकारक भोजन करने की सलाह दी गई है।
Verse 16
कटुक्षारञ्च तीक्ष्णञ्च त्याज्यमुष्णञ्च दूरतः / तत्क्षेत्रमोषधीपात्रं बीजञ्चाप्यमृतायितम्
कटु, क्षार और अत्यन्त तीक्ष्ण पदार्थ त्यागने चाहिए, और गरम भोजन से भी दूर रहना चाहिए। तब शरीर-क्षेत्र औषधि का पात्र बनता है और बीज भी मानो अमृत-तुल्य हो जाता है।
Verse 17
तस्मिन्नुप्त्वा नरः स्वामी सम्यक् फलमवाप्नुयात् / तस्याश्चैवातपो वर्ज्य शीतलं केवलं चरेत्
उस (उचित) क्षेत्र में बीज बोकर गृहस्थ पुरुष यथोचित फल प्राप्त करता है। और तब उष्णता/ताप से बचकर केवल शीतल आचार का पालन करना चाहिए।
Verse 18
ताम्बूलपुष्पश्रीखण्डैः संयुक्तः शुचिवस्त्रभृत् / धर्ममादाय मनसि सुतल्पं संविशेत् पुमान्
ताम्बूल, पुष्प और सुगंधित चन्दन से अलंकृत, शुद्ध वस्त्र धारण किया हुआ पुरुष मन में धर्म को धारण करके उत्तम शय्या पर शान्ति से लेटे।
Verse 19
निषेकसमये यादृङ्नरचित्तविकल्पना / तादृक्स्वभावसम्भूतिर्जन्तुर्विशति कुक्षिगः
गर्भाधान के समय पुरुष के चित्त में जैसी कल्पना और जैसी प्रवृत्ति उठती है, उसी के अनुरूप स्वभाव वाला जीव गर्भ में प्रवेश करता है।
Verse 20
शुक्रसोणितसंयोगे पिण्डोत्पत्तिः प्रजायते / वर्धते जठरे जन्तुस्तारापतिरिवाम्बरे
शुक्र और रज (रक्त) के संयोग से पिण्डाकार गर्भ उत्पन्न होता है; और जीव गर्भ में वैसे ही बढ़ता है जैसे आकाश में तारापति (चन्द्रमा) बढ़ता है।
Verse 21
चैतन्यं बीजरूपं हि शुक्रे नित्यं व्यवस्थितम् / कामश्चित्तञ्च शुक्रञ्च यदा ह्येकत्वमाप्नुयुः
चैतन्य बीज-रूप से सदा शुक्र में स्थित रहता है; और जब कामना, चित्त और शुक्र एकत्व को प्राप्त होते हैं, तब गर्भाधान की प्रवृत्ति चल पड़ती है।
Verse 22
तदा द्रावमवाप्नोति योषागर्भाशये नरः / रक्ताधिक्ये भवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेत् पुमान्
तब स्त्री के गर्भाशय में जीव द्रव-रूप अवस्था को प्राप्त होता है। रक्त की अधिकता से कन्या होती है और शुक्र की अधिकता से पुत्र होता है।
Verse 23
शुक्रसोणितयो साम्ये गर्भाः षण्डत्वमाप्नुयुः / अहोरात्रेण कलिलं बुद्वदं पञ्चभिदिनैः
जब शुक्र और शोणित समान मात्रा में हों, तब गर्भ षण्डत्व (नपुंसक-भाव) को प्राप्त होता है। एक अहोरात्र में वह कलिल-रूप होता है और पाँच दिनों में बुद्बुद-सा बन जाता है।
Verse 24
चतुर्दशे भवेन्मांसं मिश्रधातुसमन्वितम् / घनं मांसञ्च विंशाहे गर्भस्थो वर्धते क्रमात्
चौदहवें दिन मिश्रित धातुओं से युक्त मांस उत्पन्न होता है। बीसवें दिन वही मांस घन और सघन हो जाता है; इस प्रकार गर्भस्थ शिशु क्रमशः बढ़ता है।
Verse 25
पञ्चविंशतिमे चाह्नि बलं पुष्टिश्च जायते / तथा मासे तु सम्पूर्णे पञ्चतत्त्वं निधारयेत्
पच्चीसवें दिन बल और पुष्टि उत्पन्न होते हैं। और जब एक मास पूर्ण हो जाता है, तब पंचतत्त्वों की रचना दृढ़ रूप से स्थापित हो जाती है।
Verse 26
मासद्वये तु सञ्जाते त्वचा मेदश्च जायते / मज्जास्थीनि त्रिभिर्मासैः केशाङ्गुल्यश्चतुर्थके
दो मास पूर्ण होने पर त्वचा और मेद उत्पन्न होते हैं। तीन मास में मज्जा और अस्थियाँ बनती हैं, और चौथे मास में केश तथा अंगुलियाँ (हाथ-पैर की) प्रकट होती हैं।
Verse 27
कर्णौ च नासिके वक्षो जायेरन् मासि पञ्चमे / कण्ठरन्ध्रोदरं षष्ठे गुह्यादिर्मासि सप्तमे
पाँचवें मास में कर्ण, नासिका और वक्ष उत्पन्न होते हैं। छठे मास में कण्ठ-रन्ध्र और उदर बनते हैं; और सातवें मास में गुह्य आदि (अन्य अवयव) प्रकट होते हैं।
Verse 28
अङ्गप्रत्यङ्गसम्पूर्णो गर्भो मासैरथाष्टभिः / अष्टमे चलते जीवो धात्रीगर्भे पुनः पुनः / नवमेमासि सम्प्राप्ते गर्भस्थौजौ दृढं भवेत्
आठ मास पूरे होने पर गर्भ अंग‑प्रत्यंगों सहित पूर्ण रूप से बन जाता है। आठवें मास में जीव बार‑बार माता के गर्भ में हिलता‑डुलता है। नवम मास आने पर गर्भस्थ ओज और प्राणबल दृढ़ हो जाते हैं।
Verse 29
चिकित्सा जायते तस्य गर्भवासपरिक्षये / नारी वाथ नरो वाथ नपुंस्त्वं वाभिजायते
गर्भवास की अवधि समाप्त होने पर उसमें रक्षा‑उपाय और चिकित्सा की प्रवृत्ति जागती है। तब वह जन्म लेता है—कभी स्त्री रूप में, कभी पुरुष रूप में, या नपुंसक भाव से।
Verse 30
शक्तित्रयं विशालाक्षं षाट्कौशिकसमायुतम् / पञ्चेन्द्रियसमोपेतं दशनाडीविभूषितम्
वह देह त्रिविध शक्ति से युक्त, व्यापक दृष्टि वाला, षट्‑कोशों से संयुक्त, पाँच इन्द्रियों से संपन्न और दस नाड़ियों से विभूषित होता है।
Verse 31
दशप्राणगुणोपेतं यो जानाति स योगवित् / मज्जास्थिशुक्रमांसानि रोम रक्तं बलं तथा
जो देह को दस प्राणों के गुणों से युक्त जानता है, वही योग का ज्ञाता है। वह मज्जा, अस्थि, शुक्र, मांस, रोम, रक्त और बल—इन सबको यथार्थ रूप से समझता है।
Verse 32
षाट्कौशिकमिदं पिण्डं स्याज्जन्तोः पाञ्चभौतिकम् / नवमे दशमे मासि जायते पाञ्चभौतिकः
यह जीव का पिण्ड ‘षट्‑कोश’ वाला और पंचमहाभूतों से बना कहा गया है। नवम या दशम मास में पंचभौतिक जीव जन्म लेता है।
Verse 33
सूतिवातैः समाकृष्टः पीडया विह्वलीकृतः / पुष्टो नाड्याः सुषुम्णाया योषिद्गर्भस्थितस्त्वरन्
प्रसव-वायुओं से खिंचा हुआ, पीड़ा से व्याकुल, और सुषुम्णा नाड़ी से पोषित वह जीव स्त्री के गर्भ में स्थित होकर शीघ्रता से विचरता है।
Verse 34
क्षितिर्वारि हविर्भोक्ता पवनाकाशमेव च / एभिर्भूतैः पीडितस्तु निबद्धः स्नायुबन्धनैः
पृथ्वी, जल, अग्नि (हविर्भोक्ता), वायु और आकाश—इन भूतों से वह जीव पीड़ित होता है; स्नायु-बंधन की रस्सियों से कसकर बंधा हुआ वह संकुचित रहता है।
Verse 35
मूलभूता इमे प्रोक्ताः सप्त नाड्यन्तरे स्थिताः / त्वचास्थिनाड्यो रोमाणि मांसञ्चैवात्र पञ्चमम्
ये सात मूल-तत्त्व नाड़ियों के जाल में स्थित कहे गए हैं—त्वचा, अस्थि, नाड़ियाँ, रोम, और यहाँ पाँचवाँ मांस।
Verse 36
एते पञ्च गुणाः प्रोक्ता मया भूमेः खगेश्वर / यथा पञ्च गुणाश्चापस्तथा तच्छृणु काश्यप
हे खगेश्वर! मैंने पृथ्वी के पाँच गुण कहे। अब उसी प्रकार, हे काश्यप, जल के पाँच गुण भी सुनो।
Verse 37
लाला मूत्रं तथा शुक्रं मज्जार रक्तञ्च पञ्चमम् / आपः पञ्चगुणाः प्रोक्ता ज्ञातव्यास्ते प्रयत्नतः
लार, मूत्र, शुक्र, मज्जा और पाँचवाँ रक्त—ये ‘आपः’ के पाँच गुण कहे गए हैं; इन्हें प्रयत्नपूर्वक जानना चाहिए।
Verse 38
क्षुधा तृषा तथा निद्रा आलस्यं कान्तिरेव च / तेजः पञ्चगुणं प्रोक्तं तार्क्ष्य सर्वत्रयोगिभिः
क्षुधा, तृषा, निद्रा, आलस्य और कांति—ये पाँच ‘तेज’ के पंचगुण कहे गए हैं, हे तार्क्ष्य (गरुड़), ऐसा सर्वत्र योगियों ने कहा है।
Verse 39
रागद्वेषौ तथा लज्जा भयं मोहस्तथैव च / इत्येतत् कथितं तार्क्ष्य वायुजं गुणपञ्चकम्
राग और द्वेष, तथा लज्जा, भय और मोह—हे तार्क्ष्य (गरुड़), ये वायु से उत्पन्न गुणों का पंचक कहा गया है।
Verse 40
आकुञ्चनं धावनञ्च लङ्घनञ्च प्रसारणम् / निरोधः पञ्चमः प्रोक्तो वायोः पञ्च गुणाः स्मृताः
आकुंचन, धावन, लंघन और प्रसारण—निरोध पाँचवाँ कहा गया है; ये वायु के पाँच गुण स्मरण किए गए हैं।
Verse 41
घोषश्चिन्ता च गाम्भीर्यं श्रवणं सत्यसंक्रमः / आकाशस्य गुणाः पञ्च ज्ञात व्यास्तार्क्ष्य यत्नतः
घोष, चिन्ता, गाम्भीर्य, श्रवण-शक्ति और सत्य-संक्रमण—ये आकाश के पाँच गुण हैं; हे तार्क्ष्य (गरुड़), इन्हें यत्नपूर्वक जानना चाहिए।
Verse 42
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासा बुद्धीन्द्रियाणि च / पाणी पादौ गुदं प्राक् च गुह्यं कर्मेन्द्रियाणि च
कान, त्वचा, दोनों नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये बुद्धि-इन्द्रियाँ (ज्ञानेंद्रियाँ) हैं; और हाथ, पाँव, गुदा, मूत्रमार्ग (अग्र-छिद्र) तथा गुप्तेन्द्रिय—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं।
Verse 43
इडाच पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका / गान्धारी गजजिह्वा च पूषा चैव यसा तथा
इड़ा और पिंगला, तथा तीसरी सुषुम्णा; इसी प्रकार गान्धारी, गजजिह्वा, पूषा और यशा (नामक नाड़ियाँ) भी हैं।
Verse 44
अलम्वुशा कुहूश्चैव शङ्खिनी दशमी स्मृता / पिण्ड मध्ये स्थिता ह्येताः प्रधाना दश नाडयः
अलम्बुशा, कुहू और शंखिनी—जो दसवीं कही गई है—ये दस प्रधान नाड़ियाँ पिण्ड (शरीर) के भीतर स्थित हैं।
Verse 45
प्राणापानौ समानश्च उदानो व्यान एव च / नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः
प्राण और अपान, समान, उदान और व्यान; तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनञ्जय—ये (दस) वायु जीव में प्रवृत्त रहते हैं।
Verse 46
इत्येते वायवः प्रोक्ता दश देहेषु सुस्थिताः / केवलं भुक्तमन्नञ्च पुष्टिदं सर्वदेहिनाम्
इस प्रकार ये दस वायु कहे गए हैं, जो देहों में भलीभाँति स्थित हैं। और जो अन्न वास्तव में खाया जाता है, वही सब देहधारियों को पुष्टि देने वाला होता है।
Verse 47
नयते प्राणदो वायुः शरीरे सर्वसन्धिषु / आहारो भुक्तमात्रस्तु वायुना क्रियते द्विधा
प्राण देने वाला वायु शरीर के सब संधियों (जोड़ों) में प्रवाहित होता है। और जो आहार मात्र खाया गया है, वह वायु द्वारा दो रूपों में किया जाता है।
Verse 48
स प्रविश्य गुहे सम्यक् पृथगन्नं पृथग्जलम् / ऊर्ध्वमग्नेर्जलं कृत्वा तदन्नञ्च जलोपरि
वह विधिपूर्वक गुहा (यज्ञ-परिसर) में प्रवेश कर अन्न को अलग और जल को अलग रखे। अग्नि के ऊपर जल रखकर फिर उस जल के ऊपर अन्न स्थापित करे॥
Verse 49
अग्नेश्चाधः स्वयं प्राणस्तमग्निञ्च धमेच्छनैः / वायुना धम्यमानो ऽग्निः पृथक्किट्टं पृथग्रसम्
जठराग्नि के नीचे स्वयं प्राण धीरे-धीरे उस अग्नि को फूँकता है। वायु से फूँकी हुई वह अग्नि मल-भाग को अलग और रस-भाग को अलग कर देती है॥
Verse 50
मलैर्द्वादशभिः किट्टं भिन्नं देहात् पृथग्भवेत् / कर्णाक्षिनासिका जिह्वा दन्तनाभिवपुर्गुदम्
बारह प्रकार के मल से किट्ट (अशुद्ध अवशेष) देह से अलग हो जाता है। ये भिन्न-भिन्न हैं—कान, आँखें, नाक, जीभ, दाँत, नाभि, त्वचा/शरीर और गुदा॥
Verse 51
नखा मलाश्रया ह्येते विण्मूत्रञ्चेत्यनन्तकम् / शुक्रशोणितसंयोगादेतत् षाट्कौशिकं स्मृतम्
नाखून भी मल के आश्रय हैं; और विष्ठा तथा मूत्र का प्रवाह अनन्त है। शुक्र और शोणित के संयोग से यह देह उत्पन्न होती है—इसे षाट्कौशिक सिद्धान्त कहा गया है॥
Verse 52
रोम्णां कोट्यस्तथा तिस्रो ऽप्यर्धकोटि समन्विताः / द्वात्रिंशद्दशनाः प्रोक्ताः सामान्याद्विनतासुत
हे विनता-सुत! सामान्य रूप से कहा गया है कि रोम तीन कोटि और आधी कोटि सहित होते हैं, और दाँत बत्तीस बताए गए हैं॥
Verse 53
सप्त लक्षाणि केशाः स्युर्नखाः प्रोक्तास्तु विंशतिः / मांसं पलसहस्रैकं सामान्याद्देहसंस्थितम्
कहा गया है कि केश सात लाख होते हैं और नाखून बीस बताए गए हैं। सामान्य देह में मांस का परिमाण एक हजार एक पल माना गया है।
Verse 54
रक्तं पलशतं तार्क्ष्यं बुद्धमेव पुरातनैः / पलानि दश मेदश्च त्वचा चैव तु तत्समा
हे तार्क्ष्य (गरुड़), प्राचीनों ने रक्त का परिमाण सौ पल कहा है। मेद दस पल और त्वचा भी उतनी ही (मेद के समान) बताई गई है।
Verse 55
पलद्वादशकं मज्जा महारक्तं पलत्रयम् / शुक्रं द्विकुडवं ज्ञेयं शोणितं कुडवं स्मृतम्
मज्जा का परिमाण बारह पल कहा गया है; महारक्त (प्राणरक्त) तीन पल। शुक्र दो कुडव जानना चाहिए और शोणित एक कुडव स्मृत है।
Verse 56
श्लेष्माणश्च षडूर्ध्वञ्च विण्मूत्रं तत्प्रमाणतः / अस्थ्नां हि ह्यधिकं प्रोक्तं षष्ट्युत्तरशतत्रयात्
श्लेष्मा तथा ऊपर स्थित छह द्रव्य, और मल-मूत्र—इनका परिमाण भी उसी प्रकार कहा गया है। पर अस्थियों की संख्या तीन सौ साठ से अधिक बताई गई है।
Verse 57
एवं पिण्डः समाख्यातो वैभवं सम्प्रचक्ष्महे / सुखं दुः खं भयं क्षेमं कर्मणैव हि प्राप्यते
इस प्रकार पिण्ड (देह-समष्टि) का वर्णन किया गया; अब उसके फलस्वरूप अवस्थाएँ कहते हैं। सुख-दुःख, भय-क्षेम—ये सब निश्चय ही अपने कर्म से ही प्राप्त होते हैं।
Verse 58
अधोमुखं चोर्ध्वपादं गर्भाद्वायुः प्रकर्षति / तले तु करयोर्न्यस्य वर्धते जानुपार्श्वयोः
गर्भ के भीतर वायु भ्रूण को अधोमुख और ऊर्ध्वपाद अवस्था में दबाती है; वह दोनों हथेलियाँ तलवों पर रखकर, घुटनों को पार्श्वों की ओर समेटे हुए बढ़ता है।
Verse 59
अङ्गुष्ठौ चोपरि न्यस्तौ जान्वारेथ कराङ्गुली / जानुपृष्ठे तथा नेत्रे जानुमध्ये च नासिका
दोनों अँगूठे ऊपर रखे जाते हैं और हाथों की उँगलियाँ घुटनों पर टिकती हैं; नेत्र घुटनों की पीठ (उभार) की ओर रहते हैं और नासिका घुटनों के मध्य की ओर स्थित होती है।
Verse 60
एवं वृद्धिं क्रमाद्याति जन्तुः स्त्रीगर्भसंस्थितः / काठिन्यमस्थीन्यायान्ति भुक्तपीतेन जीवति
इस प्रकार स्त्री के गर्भ में स्थित जीव क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होता है; उसकी अस्थियाँ कठोर होती जाती हैं, और वह माता के खाए-पिए से जीवन धारण करता है।
Verse 61
नाडी वाप्यायनी नाम नाभ्यां तत्र निबध्यते / स्त्रीणां तथान्त्रसुषिरे स निबद्धः प्रजायते
वाप्यायनी नाम की एक नाड़ी है, जो वहाँ नाभि से बँधी रहती है; स्त्रियों में भी वह आँतों के खोखले भाग में बँधकर, उसी बंधन से गर्भ का प्रादुर्भाव होता है।
Verse 62
क्रामन्ति भुक्तपीतानि स्त्रीणां गर्भोदरे तथा / तैराप्यायितदेहो ऽसौ जन्तुर्वृद्धिमुपैति च
उसी प्रकार स्त्रियों के गर्भोदर में उनके भुक्त-पीत पदार्थ पहुँचते हैं; उनसे पोषित देह वाला वह जीव भी वृद्धि और विस्तार को प्राप्त होता है।
Verse 63
स्मृत्यस्तत्र प्रयान्त्यस्य बह्व्यः संसारभूतयः / ततो निर्वेदमायाति पीड्यमान इतस्ततः
वहाँ उसके ऊपर संसार से जुड़ी अनेक स्मृतियाँ वेग से उमड़ पड़ती हैं। तब चारों ओर से पीड़ित होकर वह जीव संसार के प्रति गहरा निर्वेद और वैराग्य प्राप्त करता है।
Verse 64
पुनर्नैवं करिष्यामि भुक्तमात्र इहोदरात् / तथातथा यतिष्यामि गर्भं नाप्नोम्यहं यथा
“अब फिर मैं ऐसा नहीं करूँगा—यहाँ केवल पेट भरने के लिए ही जीना नहीं। मैं हर प्रकार से प्रयत्न करूँगा, ताकि मुझे फिर गर्भ में प्रवेश न करना पड़े।”
Verse 65
यानि पूर्वानुभूतानि देवभूतात्मजानि वै
जो-जो अनुभव पहले भोगे गए थे—देवों, भूतों तथा अपने ही आत्मज (मानस) संस्कारों से उत्पन्न—
Verse 66
ततः कालक्रमाज्जन्तुः परिवर्त्यत्वधोमुखः / नवमे दशमे वापि मासि संजायते ततः
फिर समय के क्रम से वह जीव करवट बदलकर अधोमुख (सिर नीचे) हो जाता है; और उसके बाद नवें या दसवें महीने में जन्म लेता है।
Verse 67
निष्क्रम्यमाणो वातेन प्राजापत्येन पीड्यते / निष्क्रमते च विलपंस्तदा दुःखनिपीडितः
जन्म के समय निकलता हुआ वह जीव प्राजापत्य वायु से पीड़ित होता है; और बाहर आते हुए वह विलाप करता है, उस समय दुःख से कुचला हुआ।
Verse 68
निष्क्रामंश्चोदरान्मूर्छामसह्यां प्रतिपद्यते / प्राप्नोति चेतनां चासौ वायुस्पर्शसुखान्वितः
माता के गर्भ से बाहर निकलते ही जीव असह्य मूर्छा में पड़ जाता है। फिर वह चेतना पाकर नव वायु के स्पर्श से उत्पन्न सुख का अनुभव करता है॥
Verse 69
ततस्तं वैष्णवी माया समास्कन्दति मोहिनी / तया विमोहितात्मासौ ज्ञानभ्रंशमवाप्नुते
तब मोहिनी वैष्णवी माया उसे आ घेरती है। उसके द्वारा मोहित होकर वह आत्मा सत्य-ज्ञान और विवेक का ह्रास प्राप्त करती है॥
Verse 70
भ्रष्टज्ञानं बालभावे ततो जन्तुः प्रपद्यते / ततः कौमारकावस्थां यौवनं वृद्धतामपि
ज्ञान के ढँक जाने पर जीव पहले बाल्यभाव को प्राप्त होता है। फिर क्रमशः कौमार, यौवन और वृद्धावस्था में भी प्रवेश करता है॥
Verse 71
पुनश्च तद्वन्मरणं जन्म प्राप्नोति मानवः / ततः संसारचक्रे ऽस्मिन् भ्राम्यते घटयन्त्रवत्
और फिर उसी प्रकार मनुष्य मृत्यु और जन्म को प्राप्त होता है। तब इस संसार-चक्र में वह घट-यंत्र की भाँति निरंतर घूमता रहता है॥
Verse 72
कदाचित्स्वर्गमाप्नोति कदाचिन्निरयं नरः / स्वर्गं च निरयं चैव स्वकर्मफलमश्नुते
कभी मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है और कभी नरक को। अपने ही कर्मों के फल से वह स्वर्ग और नरक—दोनों का भोग करता है॥
Verse 73
कदाचिद्भुक्तकर्मा च भुवं स्वल्पेन गच्छति / स्वर्लोके नरके चैव भुक्तप्राये द्विजोत्तमाः
कभी-कभी पूर्वकर्मों का फल भोगकर जीव थोड़े ही समय में पृथ्वी-लोक से गुजर जाता है; और उसी प्रकार स्वर्ग तथा नरक से भी, हे द्विजोत्तमों, जब कर्म प्रायः क्षीण हो चुका होता है।
Verse 74
नरकेषु महद्दुःखमेतद्यत्स्वर्गवासिनः / दृश्यते नात्र मोदन्ते पात्यमानास्तु नारकैः
नरकों में यह महान दुःख है कि स्वर्गवासी भी वहाँ दिखाई देते हैं। वहाँ वे आनंद नहीं करते; बल्कि गिराए जाकर नरकीय जनों के समान हो जाते हैं।
Verse 75
स्वर्गे ऽपि दुः खमतुलं यदारोहणकालतः / प्रभृत्यहं पतिष्यामीत्येतन्मनसि वर्तते
स्वर्ग में भी अतुल दुःख है; क्योंकि वहाँ चढ़ते ही मन में यह भाव उठता है—‘अब मैं यहाँ से अवश्य गिरूँगा।’
Verse 76
नार कांश्चैव सम्प्रेक्ष्य महद्दुः खमवाप्यते / एवं गतिमहं गन्तेत्यहर्निशमनिर्वृतः
नरकीय दशा वाले मनुष्यों को देखकर महान दुःख होता है। ‘मुझे भी ऐसी ही गति को जाना पड़ेगा’—ऐसा सोचकर वह दिन-रात अशांत रहता है।
Verse 77
गर्भवासे महद्दुः खं जायमानस्य योनिजम् / जातस्य बालभावे ऽपि वृद्धत्वे दुःखमेव च
गर्भवास में महान दुःख है; और जन्म के समय योनि से उत्पन्न पीड़ा अत्यंत तीव्र होती है। जन्म के बाद बाल्यावस्था में भी दुःख है, और वृद्धावस्था में भी केवल दुःख ही है।
Verse 78
कामेर्ष्याक्रोधसम्बन्धाद्यौवने ऽपि च दुः सहम् / दुःस्वप्नं या वृद्धता च मरणे दुः खमुत्कटम्
काम, ईर्ष्या और क्रोध के बंधन से युवावस्था में भी दुःख असह्य होता है। दुःस्वप्न आते हैं, बुढ़ापा आता है, और मृत्यु के समय पीड़ा अत्यन्त तीव्र हो जाती है।
Verse 79
कृष्यमाणश्च याम्यैः स नरके ऽपि च यात्यधः / पुनश्च गर्भाज्जन्म स्यान्मरणं दुष्करं तथा
यमदूतों द्वारा घसीटा जाकर वह नरक में भी अधोगति को प्राप्त होता है। फिर उसे गर्भ से पुनर्जन्म लेना पड़ता है, और वैसे ही मृत्यु भी दुर्धर्ष हो जाती है।
Verse 80
एवं संसारचक्रे ऽस्मिज्जन्तवो घटयन्त्रवत् / भ्राम्यन्ते प्राक्तनैर्बधैर्बद्धा विध्यन्ति चासकृत्
इस प्रकार इस संसार-चक्र में जीव जल-चक्र (घटयन्त्र) के समान घूमते रहते हैं। पूर्वकर्मों के बंधनों से बँधे हुए वे बार-बार आघात (दुःख-फल) पाते हैं।
Verse 81
नास्ति पक्षिन्सुखं किञ्चित्क्षेत्रे दुः खशताकुले / विनतासुत मोक्षाय यतितव्यं ततो नरैः
हे पक्षिन् (गरुड)! सैकड़ों दुःखों से व्याकुल इस क्षेत्र (संसार) में किंचित् भी सुख नहीं है। इसलिए, हे विनता-सुत! मनुष्यों को मोक्ष के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
Verse 82
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा गर्भस्य संस्थितिः / कथयामि क्रमप्रश्रं पृष्टं वा वर्तते स्पृहा
गर्भ की स्थिति जैसे होती है, यह सब मैंने तुम्हें कह दिया। अब जो-जो तुम क्रम से पूछोगे, अथवा जैसा प्रश्न और जिज्ञासा उठेगी, मैं उसी क्रम से बताऊँगा।
Verse 83
गरुड उवाच / मध्ये कृतमहाप्रश्रद्वयस्याप्तं मयोत्तरम् / प्रश्रस्यापि तृतीयस्य उत्तरं च विधीयताम्
गरुड़ बोले—हमारे संवाद के मध्य में ही मुझे तुमसे दो महान प्रश्नों का उत्तर पहले ही प्राप्त हो गया। अब तीसरे प्रश्न का उत्तर भी विधिपूर्वक कहा जाए।
Verse 84
श्रीकृष्ण उवाच / म्रियमाणस्य किं कृत्यमिति त्वं पृष्टवानसि / शृणु तत्रोत्तरं तूक्तं कथयामि समासतः
श्रीकृष्ण बोले—तुमने पूछा है, ‘जो प्राण त्यागने को हो, उसके लिए क्या करना चाहिए?’ सुनो, उसका उत्तर मैं संक्षेप में कहता हूँ।
Verse 85
आसन्नमरणं ज्ञात्वा पुरुषं स्नापयेत्ततः / गोमूत्रगोमयसुमृत्तीर्थोदककुशोदकैः
मृत्यु निकट जानकर उस पुरुष को स्नान कराए—गोमूत्र, गोमय-जल, शुद्ध मृत्तिका, तीर्थ-जल तथा कुशा-युक्त जल से।
Verse 86
वाससी परिधार्याथ धौते तु शुचि नी शुभे / दर्भाण्यादौ समास्तीर्य दक्षिणाग्रान्विकीर्य च
फिर धुले हुए, पवित्र और शुभ दो वस्त्र धारण कराकर, पहले दर्भ बिछाए और उनके अग्रभाग दक्षिण की ओर करके फैला दे।
Verse 87
तिलान् गोमयलिप्तायां भूमौ तत्र निवेशयेत्
गोमय से लिपी हुई भूमि पर वहाँ तिल स्थापित करे।
Verse 88
प्रागुदक्शिरसं वापि मुखे स्वर्णं विनिः क्षेपेत् / शालग्रामशिला तत्र तुलसी च खगेश्वर
हे खगेश्वर गरुड़! मरणासन्न पुरुष को पूर्व या उत्तर की ओर सिर करके लिटाकर उसके मुख में स्वर्ण रखे; और वहीं शालग्राम-शिला तथा तुलसी भी रखे।
Verse 89
विधेया सन्निधौ सर्पिर्दीपं प्रज्वालयेत्पुनः / नमो भगवते वासुदेवायेति जपस्तथा
विधि के अनुसार (कर्म के) सन्निधि में फिर घृत-दीप प्रज्वलित करे; और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस मंत्र का जप भी करे।
Verse 90
आदौ तु प्रणवं कृत्वा पूजादाने ततः स्मृते / समभ्यर्च्य हृषीकेशं पुष्पधूपादिभिस्ततः
पहले प्रणव ‘ॐ’ का उच्चारण करे। फिर स्मृति-विधि के अनुसार पूजन और दान में, हृषीकेश (विष्णु) का सम्यक् अर्चन करे और तत्पश्चात पुष्प, धूप आदि से उनकी पूजा करे।
Verse 91
प्रणिपातैः स्तवैः पुण्यैर्ध्या नयोगेन पूजयेत् / दत्त्वा दानं च विप्रेभ्यो दीनानाथेभ्य एव च
प्रणाम, पवित्र स्तोत्रों और ध्यान-योग के द्वारा (भगवान् की) पूजा करे; और दान भी दे—विद्वान् ब्राह्मणों को तथा दीन-हीनों और अनाथों को भी।
Verse 92
पुत्त्रे मित्रे कलत्रे च क्षेत्रधान्यधनादिषु / निवर्तयेन्ममत्वं च विष्णोः पादौ हृदि स्मरन्
हृदय में भगवान् विष्णु के चरणों का स्मरण करते हुए, पुत्र, मित्र, पत्नी तथा खेत, धान्य, धन आदि में ‘मेरा’—यह ममता त्याग दे।
Verse 93
उच्चैः पुरुषसूक्तं च यदि श्रेष्ठापदस्तदा / पुत्त्राद्याः प्रपठेयुस्ते म्रियमाणे निजे जने
यदि मरणासन्न व्यक्ति पवित्र वचन बोलने में समर्थ हो, तो पुरुषसूक्त का उच्च स्वर से पाठ किया जाए। अपने जन के प्राणांत समय पुत्र आदि परिजन उसके लिए उसका पाठ करें।
Verse 94
एतत्ते सर्वमाख्यातं कृत्यं मृत्यावुपस्थिते / फलमप्यस्य कृत्स्नस्य समासात्ते वदाम्यहम्
मृत्यु समीप आने पर क्या कर्तव्य है—यह सब मैंने तुम्हें पूर्णतः बता दिया। अब इन समस्त कर्मों का संपूर्ण फल मैं संक्षेप में कहता हूँ।
Verse 95
स्नानेन शुचिताप्राप्तिरपावित्र्यहृतिस्ततः / ततो विष्णोः स्मृतिस्तस्य ज्ञानात्सर्वफलप्रदा
स्नान से शुद्धि प्राप्त होती है और अपवित्रता दूर होती है। उससे विष्णु-स्मरण उत्पन्न होता है; और उस स्मरण से सत्य ज्ञान होता है, जो समस्त आध्यात्मिक फल देने वाला है।
Verse 96
दर्भतूली नयेत्स्वर्गमातुरं तु न संशयः / तिलैर्दर्भैश्च निः क्षिप्तैः स्नानं क्रतुमयं भवेत्
कुश-तृण की शय्या (दर्भतूली) रोगी/मरणासन्न को निःसंदेह स्वर्ग ले जाती है। और तिल तथा कुश डालकर किया गया स्नान यज्ञ के तुल्य हो जाता है।
Verse 97
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च श्रीर्हुताशस्तथैव च / मण्डले चोपतिष्ठन्ति तस्मात्कुर्वीत मण्डलम्
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, श्री (लक्ष्मी) तथा हुताश (अग्नि)—ये सब मण्डल में उपस्थित होते हैं; इसलिए मण्डल की स्थापना करनी चाहिए।
Verse 98
प्रागुदग्वा कृतेनेह शिरसा लोकमुत्तमम् / व्रजते यदि पापस्याल्पत्वं पुंसो भवेत्खग
हे खग (गरुड़)! यहाँ यदि मनुष्य को सिर पूर्व या उत्तर की ओर करके लिटाया जाए, तो वह उत्तम लोक को प्राप्त होता है; इससे उसके पाप अत्यल्प हो जाते हैं।
Verse 99
पञ्चरत्ने मुखे मुक्ते जिवे ज्ञानं प्ररोहति / तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग
हे खग! प्राण-त्याग के समय मुख में पाँच रत्न रख देने से जीव में ज्ञान अंकुरित होता है—तुलसी, ब्राह्मण, गौ, भगवान विष्णु और एकादशी।
Verse 100
पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम् / विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः
संसार-समुद्र में डूबते मनुष्यों के लिए पार लगाने के पाँच साधन हैं—भगवान विष्णु की भक्ति, एकादशी-व्रत, गीता-पाठ, तुलसी-पूजन और ब्राह्मणों तथा गौओं की सेवा।
Verse 101
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी भक्तिदायिनी / नमो भगवते वासुदेवायेति जपन्नरः
इस असार और दुर्गम संसार में छह पदों वाला मंत्र भक्ति देने वाला है—जो मनुष्य “नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करता है।
Verse 102
ओङ्कारपूर्वं सायुज्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः / पूजयापि च मल्लोकप्राप्तिराराद्दिवं व्रजेत्
ॐकार से आरम्भ करके (मंत्र-जप करने वाला) सायुज्य को प्राप्त करता है—इसमें संशय नहीं। और पूजन से भी वह मेरे लोक को पाता है तथा शीघ्र ही स्वर्ग को जाता है।
Verse 103
बन्धाभावे ममत्वेतु ज्ञानं पुरुषसूक्ततः / यस्ययस्याधिकत्वं तु साधनेष्वेषु काश्यप
जब बंधन नहीं रहता, तब ‘मेरा-पन’ भी मिट जाता है; तब पुरुषोत्तम के उपदेश से सच्चा ज्ञान प्रकट होता है। हे काश्यप, इन साधनों में जिस-जिसके लिए जो अधिक प्रधान हो, वही उसके लिए मुख्य सहायक बनता है।
Verse 104
तत्तत्फलस्याप्याधिक्यं भवतीत्यवधारय / दातव्यानि यथाशक्त्या प्रीतो ऽसौ सर्वदा भवेत्
निश्चय जानो कि उन-उन कर्मों का फल और भी बढ़ जाता है। इसलिए अपनी शक्ति के अनुसार दान देना चाहिए; ऐसा करने से वह (भगवान/प्राप्तकर्ता) सदा प्रसन्न रहता है।
Verse 105
एतत्ते सर्वमाख्यातं स्नानादिषु फलं मया / ब्रह्माण्डे ये गुणाः सन्ति शरीरे ते व्यवस्थिताः
मैंने तुम्हें स्नान आदि अनुष्ठानों का फल पूर्ण रूप से बता दिया। ब्रह्माण्ड में जो गुण हैं, वे ही शरीर में भी यथास्थान व्यवस्थित हैं।
Verse 106
पातालभूधरा लोकास्तथान्ये द्वीपसागराः / आदित्यादिग्रहाः सर्वे पिण्डमध्ये व्यवस्थिताः
पाताल, धराधर पर्वत, लोक तथा अन्य द्वीप-सागर, और सूर्य आदि समस्त ग्रह—ये सब पिण्ड (शरीर) के भीतर व्यवस्थित माने गए हैं।
Verse 107
पादाधस्तु तलं ज्ञेयं पादोर्ध्वं वितलं तथा / जानुभ्यां सुतलं विद्धि सक्थिदेशे महातलम्
पैरों के नीचे ‘तल’ जानो और पैरों के ऊपर ‘वितल’ है। घुटनों में ‘सुतल’ समझो और जाँघों के प्रदेश में ‘महातल’ है।
Verse 108
तथा तलातलञ्चोरौ गुह्यदेशे रसातलम् / पातालं कटिसंस्थन्तु पादादौ लक्षयेद्बुधः
इसी प्रकार बुद्धिमान् जन समझे कि तलातल जंघाओं में है, रसातल गुह्य (जनन) प्रदेश में है और पाताल कटि-प्रदेश में स्थित है; इस प्रकार देह के अधोभाग में इन अधोलोकों का निरूपण करे।
Verse 109
भूर्लोकं नाभिमध्ये तु भुवर्लोकं तदूर्ध्वतः / स्वर्गलोकं हृदये विद्यात् कण्ठदेशे महस्तथा
भूर्लोक नाभि-मध्य में जानो, उसके ऊपर भुवर्लोक है। हृदय में स्वर्गलोक को समझो और कण्ठ-प्रदेश में महर्लोक को भी।
Verse 110
जनलोकं वक्त्रदेशे तपोलोकं ललाटके / सत्यलोकं महारन्ध्रे भुवनानि चतुर्दश
जनलोक मुख-प्रदेश में है, तपोलोक ललाट में; और सत्यलोक महा-रन्ध्र (ब्रह्मरन्ध्र) में जानो। इस प्रकार चौदह भुवन देह में व्यवस्थित हैं।
Verse 111
त्रिकोणे संस्थितो मेरुरधः कोणे च मन्दरः / दक्षिणे चेव कैलासो वामभागे हिमाचलः
त्रिकोण में मेरु स्थित है, अधः-कोण में मन्दर। दक्षिण में कैलास है और वामभाग में हिमाचल स्थित है।
Verse 112
निषधश्चोर्ध्वभागे च दक्षिणे गन्धमादनः / मलयो (रमणो) वामरेखायां सप्तैते कुलपर्वताः
निषध ऊर्ध्वभाग में है और दक्षिण में गन्धमादन। वाम-रेखा पर मलय (रमण) स्थित है। ये सात कुलपर्वत कहे गए हैं।
Verse 113
अस्थिस्थाने स्थितो जम्बूः शाको मज्जासु संस्थितः / कुशद्वीपः स्थितो मांसे क्रौञ्चद्वीपः शिरास्थितः
अस्थियों के स्थान में जम्बूद्वीप स्थित है, मज्जा में शाकद्वीप प्रतिष्ठित है। मांस में कुशद्वीप और शिराओं (नाड़ियों) में क्रौञ्चद्वीप स्थित है॥
Verse 114
त्वचायां शाल्मलिद्वापो प्लक्षः रोम्णां च सञ्चये / नखस्थः पुष्करद्वीपः सागरास्तदनन्तरम्
त्वचा में शाल्मलीद्वीप (सदृश) है, और रोमों के संचय में प्लक्षद्वीप। नखों में पुष्करद्वीप है, और इनके तुरंत बाद चारों ओर सागर स्थित हैं॥
Verse 115
क्षारोदश्च तथा मूत्रे क्षारे क्षीरोदसागरः / सुरोदधिश्च श्लेष्मस्थः मज्जायां घृतसागरः
मूत्र में क्षारोद-सागर है, और क्षार (पित्त) में क्षीरोद-सागर। श्लेष्म में सुरोदधि है, तथा मज्जा में घृत-सागर स्थित है॥
Verse 116
रसोदधिं रसे विद्याच्छोणिते दधिसगरम् / स्वादुलं लम्बिकास्थाने गर्भोदं शुक्रसंस्थितम्
रस में रसोदधि को जानना चाहिए, और शोणित (रक्त) में दधि-सागर। लम्बिका-स्थान में मधुर तत्त्व है, और शुक्र में गर्भोदक स्थित है॥
Verse 117
नादचक्रे स्थितः सूर्यो बिन्दुचक्रे च चन्द्रमाः / लोचनस्थः कुजो ज्ञेयो हृदये च बुधः स्मृतः
नाद-चक्र में सूर्य स्थित है, और बिन्दु-चक्र में चन्द्रमा। नेत्रों में कुज (मंगल) को जानना चाहिए, और हृदय में बुध स्मरण किया गया है॥
Verse 118
विष्णुस्थाने गुरुं विद्याच्छ्रुक्रे शुक्रो व्यवस्थितः / नाभिस्थाने स्थितो मन्दो मुखे राहुः स्थितः सदा
विष्णु-स्थान में गुरु को जानो; शुक्र वीर्य में स्थित है। नाभि-प्रदेश में मन्द (शनि) रहता है और मुख में राहु सदा स्थित रहता है।
Verse 119
पायु (द) स्थाने स्थितः केतुः शरीरे ग्रहमण्डलम् / विभक्तञ्च समाख्यातमापादतलमस्तकम्
पायु-स्थान में केतु स्थित है। इस प्रकार शरीर में ग्रह-मण्डल का विभाग पाद-तल से लेकर मस्तक तक कहा गया है।
Verse 120
उत्पन्ना ये हि संसारे म्रियन्ते ते न संशयः / बुभुक्षा च तृषा रौद्रा दाहोद्भूता च मूर्छना
जो इस संसार में उत्पन्न होते हैं वे निःसंदेह मरते हैं। साथ ही भयंकर भूख, दाहयुक्त तृष्णा और तपन से उत्पन्न मूर्छा भी होती है।
Verse 121
यत्र पीडास्त्विमा रौद्रास्ता वै वृश्चिकदंशजाः / विनाशः पूर्णकाले च जायते सर्वदेहिनाम्
वहाँ ये भयंकर पीड़ाएँ वास्तव में बिच्छुओं के डंक से उत्पन्न होती हैं; और समय की पूर्णता पर सब देहधारियों का विनाश (मृत्यु) होता है।
Verse 122
अग्रे अग्रे हि धावन्ति यमलोकगतस्यवै / तप्तवालुकमध्येन प्रज्वलद्वह्निमध्यतः
यमलोक को गए हुए वे प्राणी आगे-आगे ही दौड़ते रहते हैं—तप्त बालू के बीच से और प्रज्वलित अग्नि के मध्य से।
Verse 123
केशग्राहैः समाक्रान्ता नीयन्ते यमकिङ्करैः / पापिष्ठास्त्वधमास्तार्क्ष्य दयाधर्मविविर्जिताः
केश पकड़कर यम के किंकर उन्हें घसीटते हुए ले जाते हैं। हे तार्क्ष्य (गरुड़), ये परम पापी और अधम—दया और धर्म से रहित हैं।
Verse 124
यमलोके वसन्त्येते कुट्यां जन्म न विद्यते / एवं सञ्जायते तार्क्ष्य मर्त्ये जन्तुः स्वकर्मभिः
ये प्राणी यमलोक में वास करते हैं; वहाँ (नव) जन्म नहीं होता। इस प्रकार, हे तार्क्ष्य, जीव अपने ही कर्मों से मर्त्यलोक में फिर जन्म लेता है।
Verse 125
उत्पन्ना ये हि संसारे म्रियन्ते ते न संशयः / आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च
जो इस संसार में उत्पन्न होते हैं, वे निश्चय ही मरते हैं—इसमें संदेह नहीं। आयु, कर्म (फल), धन और विद्या—सबका भी अंत अवश्य होता है।
Verse 126
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः / कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते
ये पाँचों ही गर्भस्थ देही के लिए उत्पन्न होते हैं। जीव कर्म से जन्म लेता है और कर्म से ही (अंततः) लय को प्राप्त होता है।
Verse 127
सुखं दुः खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते / अधोमुखं चोर्ध्वपादं गर्भाद्वायुः प्रकर्षति
सुख-दुःख, भय और क्षेम—ये सब मनुष्य अपने कर्म से ही प्राप्त करता है। और गर्भ से प्राणवायु भ्रूण को मुख नीचे और पाँव ऊपर करके बलपूर्वक खींचती है।
Verse 128
जन्मतो वैष्णवी माया संमोहयति सत्वरम् / स्वकर्मकृतसम्बन्धो जन्तुर्जन्म प्रपद्यते
जन्म से ही वैष्णवी माया जीव को शीघ्र मोहित कर देती है। अपने ही कर्मों से बने बंधनों के कारण प्राणी फिर जन्म को प्राप्त होता है।
Verse 129
सुकृतादुत्तमो भोगभोग्यवान् सुकुले भवेत् / यथायथा दुष्कृतं तत् कुले हीने प्रजायते
सुकृत से मनुष्य श्रेष्ठ होता है, भोग और भोग्य से युक्त होकर उत्तम कुल में जन्म लेता है। और जितना दुष्कृत होता है, उतना ही हीन कुल में जन्म होता है।
Verse 130
दरिद्रो व्याधितो मूर्खः पापकृद्दुः खभाजनम् / अतः परं किमर्थं ते कथयामि खगेश्वर
वह दरिद्र, रोगी, मूर्ख, पाप करने वाला और दुःख का पात्र बनता है। इससे आगे मैं तुम्हें क्या कहूँ, हे खगेश्वर?
The chapter prescribes purificatory bathing (with gomūtra, gomaya-water, purified earth, tīrtha-water, and kuśa-infused water), placing the person on darbha with tips facing south, orienting the head east or north, placing gold and also śālagrāma and tulasī at the mouth, lighting a ghee lamp, chanting “oṁ namo bhagavate vāsudevāya,” worshiping Viṣṇu, giving charity, and withdrawing mamakāra (mine-ness) from family and possessions while fixing the heart on Viṣṇu’s feet.
It states that whatever bhāva and saṅkalpa arise in father and mother at the moment of conception, a fetus of corresponding nature manifests. This is framed as a lawful correspondence between mind, seed (śukra), and the entering jīva under karma—so psychological intention is treated as a causal condition shaping embodiment.
The chapter describes the embodied mass (piṇḍa) as constituted from the five great elements and as ‘six-layered,’ alongside its sensory faculties, nāḍīs, and vāyus. In this context, the phrasing functions to emphasize that embodiment is a composite sheath-structure—an organized covering through which the jīva experiences karma—rather than an ultimate self.