महादेव्याः आविर्भाव-रूपान्तर-विहारवर्णनम्
Manifestation, Forms, and Divine Play of the Mahādevī
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे उत्तरभागे हयग्रीवागस्त्यसंवादे ललितोपाख्याने अगस्त्ययात्राजनार्दनाविर्भावो नाम पञ्चमो ऽध्यायः अथोपवेश्य चैवैनमासने परमाद्भुते / हयाननमुपागत्यागस्त्यो वाक्यं समब्रवीत्
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe uttarabhāge hayagrīvāgastyasaṃvāde lalitopākhyāne agastyayātrājanārdanāvirbhāvo nāma pañcamo 'dhyāyaḥ athopaveśya caivainamāsane paramādbhute / hayānanamupāgatyāgastyo vākyaṃ samabravīt
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्ड महापुराण के उत्तरभाग में हयग्रीव–अगस्त्य संवाद, ललितोपाख्यान में ‘अगस्त्ययात्रा तथा जनार्दन का आविर्भाव’ नामक पाँचवाँ अध्याय। तब उसे परम अद्भुत आसन पर बैठाकर, हयानन (हयग्रीव) के पास जाकर अगस्त्य ने वचन कहा।