
Mudrā-vidhāna (Lalitopākhyāna): Āvāhanī–Saṃkṣobhiṇī–Ākarṣiṇī and allied Mudrās
यह अध्याय ललितोपाख्यान के उत्तरभाग में हयग्रीव–अगस्त्य संवाद में आता है। अगस्त्य श्रीदेवी को प्रसन्न करने वाली मुद्राओं की विधि पूछते हैं। हयग्रीव आह्वानी महामुद्रा (त्रिखण्डा), फिर संक्षोभिणी और उसी का भेद विद्राविणी, तथा ‘त्रैलोक्य को आकर्षित करने’ में समर्थ आकर्षिणी का क्रम से वर्णन करते हैं। आगे उन्मादिनी, महाङ्कुशा (सर्वकार्यसाधक), खेचरी (परम उत्कृष्ट, केवल ज्ञान से योगिनियों को प्रिय), और बीज-मुद्रा जो शीघ्र सभी सिद्धियाँ प्रवर्तित करती है—इनका विधान बताया गया है। अध्याय वंशकथा नहीं, बल्कि शाक्त-तांत्रिक विधि के रूप में सटीक हस्त-चेष्टाओं का उपदेश देता है।
Verse 1
इति श्रीब्रह्माण्डमहापुराणे उत्तरभागे हयग्रीवागस्त्यसंवादे ललितोपाख्याने एकचत्वारिंशो ऽध्यायः अगस्त्य उवाच मुद्राविरचनारीतिमश्वानन निवेदय / याभिर्विरचिताभिस्तु श्रीदेवी संप्रसीदति
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्डमहापुराण के उत्तरभाग में, हयग्रीव–अगस्त्य संवाद के ललितोपाख्यान में इकतालीसवाँ अध्याय। अगस्त्य बोले— हे अश्वानन! मुद्राओं की रचना-विधि बताइए, जिनके करने से श्रीदेवी प्रसन्न होती हैं।
Verse 2
हयग्रीव उवाच आवाहनी महामुद्रा त्रिखण्डेति प्रकीर्तिता / परिवृत्य करौ स्पष्टमङ्गुष्ठौ कारयेत्समौ
हयग्रीव बोले— ‘आवाहनी’ नाम की महामुद्रा ‘त्रिखण्डा’ भी कहलाती है। दोनों हाथों को मोड़कर, दोनों अँगूठों को स्पष्ट रूप से समान कर ले।
Verse 3
अनामान्तर्गते कृत्वा तर्जन्यौ कुटिलाकृती / कनिष्ठिके नियुञ्जीत निजस्थाने तपोधन / संक्षोभिण्याख्यामुद्रां तु कथयाम्यधुना श्रुणु
हे तपोधन! तर्जनी दोनों को अनामिका के भीतर रखकर टेढ़ा-सा बनाए; और कनिष्ठा को अपने स्थान पर ही लगाए। अब ‘संक्षोभिणी’ नामक मुद्रा कहता हूँ— सुनो।
Verse 4
मध्यमे मध्यगे कृत्वा कनिष्ठाङ्गुष्टरोधिते / तर्जन्यो दण्डवत्कृत्वा मध्यमोपर्यनामिके
मध्यमा को बीच में रखकर, कनिष्ठा को अँगूठे से रोकते हुए; तर्जनी को दण्ड के समान सीधा करके, उसे मध्यमा के ऊपर अनामिका पर रखे।
Verse 5
एतस्या एव मुद्राया मध्यमे सरले यदि / क्रियते विन्ध्यदर्पारे मुद्रा विद्राविणी तथा
इसी मुद्रा के मध्य में जब सरल भाव से विन्ध्य-दर्प-हरण हेतु किया जाए, तब वह ‘विद्राविणी’ मुद्रा कहलाती है।
Verse 6
मध्यमातर्जनीभ्यां तु कनिष्ठानामिके समे / अङ्कुशाकाररूपाभ्यां मध्यगे कलशोद्भव / इयमाकर्षिणी मुद्रा त्रैलोक्याकर्षणे क्षमा
हे कलशोद्भव! मध्यमा और तर्जनी से, तथा कनिष्ठा और अनामिका को समान रखकर, दोनों को अंकुशाकार बनाओ; यह ‘आकर्षिणी’ मुद्रा त्रैलोक्य को आकर्षित करने में समर्थ है।
Verse 7
पुटाकारौ करौ कृत्वा तर्जन्यावङ्कुशाकृती / परिवर्तक्रमेणैव मध्यमे तदधोगते
दोनों हाथों को पुटाकार बनाकर, दोनों तर्जनियों को अंकुशाकार करो; और परिवर्तन-क्रम से मध्यमा को उसके नीचे स्थित करो।
Verse 8
क्रमेणानेन देवर्षे मध्यमामध्यगे ऽनुजे / अनामिके तु सरले तद्बहिस्तर्जनीद्वयम्
हे देवर्षि! इसी क्रम से मध्यमा के मध्य में कनिष्ठा को रखो; अनामिका को सरल रखो और उसके बाहर दोनों तर्जनियाँ स्थित हों।
Verse 9
दण्डाकारौ ततोंऽगुष्ठौ मध्यमावर्तदेशगौ / मुद्रैषोन्मादिनी नाम्ना ख्याता वातापितापन
फिर दोनों अँगूठों को दण्डाकार करके मध्यमा के वर्त-स्थान पर रखो; यह ‘उन्मादिनी’ नाम की मुद्रा प्रसिद्ध है, जो वात आदि को तपाने वाली है।
Verse 10
अस्यास्त्वनामिकायुग्ममधः कृत्वाङ्कुशाकृति / तर्जन्यावपि तेनैव क्रमेण विनियोजयेत्
इसमें अनामिका की जोड़ी को नीचे करके अंकुश-आकृति बनावे; और उसी क्रम से तर्जनी को भी यथाविधि नियोजित करे।
Verse 11
इयं महाङ्कुशा मुद्रा सर्वकार्यार्थसाधिका
यह महाङ्कुशा मुद्रा समस्त कार्यों और अभिलषित अर्थों को सिद्ध करने वाली है।
Verse 13
सव्यं दक्षिणादेशे तु दक्षिणं सव्यदेशतः / बाहू कृत्वा तु देवर्षे हस्तौ सम्परिवर्त्य च ४२।१२ / कनिष्ठानामिके युक्ते क्रमेणानेन तापस / तर्जनीभ्यां समाक्रान्ते सर्वोर्ध्वमपि मध्यमे
हे देवर्षि! बाएँ को दाहिने स्थान में और दाहिने को बाएँ स्थान में रखकर, भुजाएँ बनाकर दोनों हाथों को परस्पर उलट दे। हे तपस्विन्! इस क्रम से कनिष्ठा और अनामिका को जोड़कर, तर्जनियों से आक्रान्त कर दे; और मध्यमा को भी ऊपर की ओर उठा दे।
Verse 14
लोपामुद्रापतेङ्गुष्ठौ कारयेत्सकलावपि / इयं तु खेचरी नाम मुद्रा सर्वोत्तमोत्तमा / एतद्विज्ञानमात्रेण योगिनीनां प्रियो भवेत्
हे लोपामुद्रापति! दोनों अङ्गुष्ठों को भी पूर्णतः यथाविधि करावे। यह ‘खेचरी’ नामक मुद्रा सर्वश्रेष्ठों में भी परम श्रेष्ठ है। इसके विज्ञान-मात्र से ही साधक योगिनियों का प्रिय हो जाता है।
Verse 15
परिवर्त्य करौ स्पृष्टावर्धचन्द्रसमाकृती / तर्जन्यङ्गुष्ठयुगलं युगपद्योजयेत्ततः
दोनों हाथों को उलटकर स्पर्श कराए, जिससे अर्धचन्द्र-सी आकृति बने; तत्पश्चात तर्जनी और अङ्गुष्ठ की जोड़ी को एक साथ योजित करे।
Verse 16
अधः कनिष्ठावष्टब्धमध्यमे विनियोजयेत् / अथैते कुटिले युक्त्वा सर्वाधस्तादनामिके / बीजमुद्रेयमाचिरात्सर्वसिद्धप्रवर्तिनी
नीचे की ओर कनिष्ठिका को स्थिर करके उसे मध्यमा में नियोजित करे। फिर इन कुटिल अंगुलियों को जोड़कर सबसे नीचे अनामिका को स्थापित करे। यह बीज-मुद्रा शीघ्र ही समस्त सिद्धियों को प्रवर्तित करने वाली है।
Verse 17
मध्याग्रे कुटिलाकारे तर्जन्युपरि संस्थिते / अनामिकामध्यगते तथैव हि कनिष्टिके
मध्यमा के अग्रभाग को कुटिलाकार करके तर्जनी के ऊपर स्थित करे। अनामिका के मध्य में भी उसी प्रकार कनिष्ठिका को रखे।
Verse 18
सर्वा एकत्र संयोज्य चाङ्गुष्ठपरिपीडिताः / एषा तु प्रथमा मुद्रा योनिमुद्रेति संज्ञिता
सब अंगुलियों को एकत्र जोड़कर अंगूठे से दबाए। यही प्रथम मुद्रा ‘योनिमुद्रा’ नाम से प्रसिद्ध है।
Verse 19
एता मुद्रास्तु देवर्षे श्रीदेव्याः प्रीतिहेतवः / पूजाकाले प्रयोक्तव्या यथानुक्रमयोगतः
हे देवर्षि! ये मुद्राएँ श्रीदेवी की प्रसन्नता का कारण हैं। पूजा के समय क्रम के अनुसार इनका प्रयोग करना चाहिए।
None directly; this chapter is not a vamśa catalog. It is a Lalitopākhyāna ritual-technical unit focused on mudrā-vidhāna transmitted through the Hayagrīva → Agastya teaching line.
Key mudrās include Āvāhanī (Mahāmudrā/Trikhaṇḍā) for invocation-oriented practice, Saṃkṣobhiṇī and its variant Vidrāviṇī for ‘agitating/dispersing’ effects, Ākarṣiṇī explicitly for attraction (trailokyākarṣaṇa), Mahāṅkuśā as broadly ‘all-purpose’ for accomplishing aims, Khecarī as a highly praised yoginī-favored seal, and a Bīja-mudrā said to quickly set siddhis in motion.
It operationalizes devotion to Śrī Devī through embodied liturgy: mudrās serve as standardized “ritual interfaces” that authorize, focus, and sequence sādhana, presenting Shākta power not only as narrative theology but as repeatable practice transmitted by recognized speakers.