Pratisarga-pravartana (How Re-Creation Proceeds) / पुनःसर्ग-प्रवर्तन
विकारेष्वविसृष्टेषु ह्यव्यक्ते चात्मनि स्थिते / अप्रवृत्ते ब्रह्मणा तु सहसा योज्यगैस्तदा
vikāreṣvavisṛṣṭeṣu hyavyakte cātmani sthite / apravṛtte brahmaṇā tu sahasā yojyagaistadā
जब विकार अभी सृजित न हुए हों, अव्यक्त आत्मतत्त्व में स्थिति हो, और ब्रह्मा की प्रवृत्ति न हुई हो—तब उन योज्य तत्त्वों से सहसा (सृष्टि) कैसे चले?