Pratisarga-pravartana (How Re-Creation Proceeds) / पुनःसर्ग-प्रवर्तन
नैमिषे सत्रमा साद्य मुनिभ्यो मुनिसत्तम / तत्प्रसादं च संसिद्धं भूतोत्पत्तिलयान्वितम्
naimiṣe satramā sādya munibhyo munisattama / tatprasādaṃ ca saṃsiddhaṃ bhūtotpattilayānvitam
हे मुनिश्रेष्ठ! नैमिषारण्य में सत्र का आश्रय लेकर मुनियों से वह प्रसाद प्राप्त हुआ, जो भूतों की उत्पत्ति और लय सहित सिद्ध है।