Pratisarga-pravartana (How Re-Creation Proceeds) / पुनःसर्ग-प्रवर्तन
एवं तानभिमानेन प्रपत्स्यति पुनस्तदा / यदा प्रवर्त्तितव्यं तु क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर् द्वयोः
evaṃ tānabhimānena prapatsyati punastadā / yadā pravarttitavyaṃ tu kṣetrakṣetrajñayor dvayoḥ
इस प्रकार वह उन्हें अहंभाव से फिर उसी समय प्राप्त करता है, जब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ—इन दोनों का प्रवर्तन होना होता है।