Mantrarāja-sādhana Prakāra & Tripurā/Lalitā–Kāmākṣī Tattva
Lalitopākhyāna Context
इति श्रीब्रह्माण्डमहापुराणे उत्तरभागे हयग्रीवागस्त्यसंवादे ललितोपाख्याने मन्त्रराजसाधनप्रकारकथनन्नामाष्टत्रिंशो ऽध्यायः अगस्त्य उवाच अनाद्यनन्तमव्यक्तं व्यक्तानामादिकारणम् / आनन्दबोधैकरसं तन्महन्मन्महे महः
iti śrībrahmāṇḍamahāpurāṇe uttarabhāge hayagrīvāgastyasaṃvāde lalitopākhyāne mantrarājasādhanaprakārakathanannāmāṣṭatriṃśo 'dhyāyaḥ agastya uvāca anādyanantamavyaktaṃ vyaktānāmādikāraṇam / ānandabodhaikarasaṃ tanmahanmanmahe mahaḥ
इस प्रकार श्रीब्रह्माण्डमहापुराण के उत्तरभाग में हयग्रीव–अगस्त्य संवाद के ललितोपाख्यान में ‘मन्त्रराज-साधन की विधि’ नामक अड़तीसवाँ अध्याय। अगस्त्य बोले— जो अनादि, अनन्त, अव्यक्त है, वही समस्त व्यक्त जगत् का आदि-कारण है; आनन्द और बोध के एकरस उस परम तेजस्वी महत् को हम नमस्कार करते हैं।