भण्डासुरवधोत्तरकृत्य-देवस्तुति
Aftermath of Bhaṇḍāsura’s Slaying and the Gods’ Hymn to Lalitā
नानाविधेषु स्थानेषु रतिं प्राप महेश्वरः / अथ तस्यां ससर्जोग्रं वीर्यं सा सोढुमक्षमा
nānāvidheṣu sthāneṣu ratiṃ prāpa maheśvaraḥ / atha tasyāṃ sasarjograṃ vīryaṃ sā soḍhumakṣamā
नाना स्थानों में महेश्वर ने रति का सुख पाया। तब उन्होंने उसमें अपना उग्र वीर्य सृजित किया, जिसे वह धारण करने में असमर्थ हुई।