प्रत्याहारवर्णनम्
Pratyāhāra—Cosmic Withdrawal / Dissolution Sequence
यथेह लोके स्वप्ने तं नीयमानमितस्ततः / रञ्जनं तद्विधेयस्य ते तान्यो न च विद्यते
yatheha loke svapne taṃ nīyamānamitastataḥ / rañjanaṃ tadvidheyasya te tānyo na ca vidyate
जैसे इस लोक में स्वप्न के भीतर वह इधर-उधर ले जाया जाता है, वैसे ही कर्माधीन के लिए वही भोग-रंजन है; उसके सिवा और कुछ नहीं।