ललिताप्रादुर्भाव-स्तुति
Lalita’s Cosmic Praise and Body–Cosmos Correspondences
अनादिमध्यान्तमपाञ्चभौतिकं ह्यवाङ्मनोगम्यमतर्क्यवैभवम् / अरूपमद्वन्द्वमदृष्टगोचरं प्रभावमग्र्यं कथमंब वर्णये
anādimadhyāntamapāñcabhautikaṃ hyavāṅmanogamyamatarkyavaibhavam / arūpamadvandvamadṛṣṭagocaraṃ prabhāvamagryaṃ kathamaṃba varṇaye
हे अम्बे! जिसका न आदि है, न मध्य, न अंत; जो पंचभूतों से परे है; जो वाणी और मन से भी अगम्य, और तर्क से अचिन्त्य वैभव वाली है—रूपरहित, द्वन्द्वरहित, दृष्टि के गोचर से परे उस परम प्रभाव का मैं कैसे वर्णन करूँ?