
The Conclusion
‘उपसंहार’ नामक यह अंतिम भाग (अध्याय 1–4) ब्रह्माण्डपुराण का समापन-संग्रह है। इसमें पहले कहे गए ब्रह्माण्ड-तत्त्व, काल-गणना, युग-धर्म और आचार-नीति का सार एकत्र करके श्रोता के सामने अंतिम निष्कर्ष के रूप में रखा जाता है। यहाँ दृष्टि ‘संहार’ की ओर मुड़ती है—प्रलय, लोकों का लय और फिर नये सृष्टि-चक्र का संकेत। पुराण यह बोध कराता है कि जगत् का प्रवाह चक्रीय है; सृष्टि, स्थिति और लय महाकाल के विधान में निरन्तर घटित होते रहते हैं। युग-परिवर्तन के साथ धर्म के रूप बदलते हैं, पर धर्म की धारा टूटती नहीं। संक्षिप्त भविष्य-सूचक संकेतों द्वारा आने वाले युगों के लक्षण और शासकों के चिह्न बताए जाते हैं, जिससे इतिहास को एक दिव्य चक्र के रूप में समझने की दृष्टि मिलती है। अंत में पुराण-श्रवण और स्मरण की मोक्षदायिनी महिमा प्रतिपादित होती है। पतन और पुनर्नवता के बीच मनुष्य को धर्म में स्थिर रखने, विवेक जगाने और भगवान् की ओर उन्मुख करने का यह उपसंहार विशेष साधन बताया गया है।