
अध्याय 176 में अनन्त-वासुदेव का संक्षिप्त माहात्म्य प्रतिमा-चरित के रूप में कहा गया है। ऋषियों के आग्रह पर ब्रह्मा बताते हैं कि आदि सृष्टि-चक्र में उन्होंने विश्वकर्मा से पर्वत-शिला की वासुदेव प्रतिमा बनवाई, जो शंख-चक्र-गदा सहित पूर्ण लक्षणों वाली थी। आगे प्रतिमा की यात्रा आती है—इन्द्र ने उसकी पूजा कर अभय और राज्य-समृद्धि पाई; फिर देवों और दिक्पालों पर विजय के बाद रावण ने उसे देखा और हर लिया, पर अंततः वह भक्त विभीषण के हाथों में आई। रामायण-युद्ध के प्रसंग में राम के लौटने पर प्रतिमा समुद्र को अर्पित की गई। द्वापर युग में समुद्र ने उसे मोक्षदायी दुर्लभ पुरुषोत्तम क्षेत्र में प्रकट किया, जहाँ वह स्थायी भक्ति-केन्द्र बनी। अंत में अनन्त-दर्शन और पूजन का फल—यज्ञ-पुण्य की वृद्धि, विष्णुलोक-प्राप्ति और वैष्णव-योग से अंततः मोक्ष—बताया गया है।
{"opening_hook":"Naimiṣāraṇya’s sages press for a fuller account of the Ananta–Vāsudeva māhātmya; the narration pivots to Brahmā’s own memory of an earlier cosmic cycle, immediately lending primordial authority to the image’s origin.","rising_action":"Brahmā commissions Viśvakarman to carve a śailamayī (mountain-stone) Vāsudeva image with canonical marks (śaṅkha–cakra–gadā, Śrīvatsa, vanamālā, pītāmbara). Indra’s repeated worship yields fearlessness and sovereignty; then Rāvaṇa’s tapas, boons, and conquest—capped by Meghanāda’s “Indrajit” victory—creates the crisis of displacement as the image is seized and carried toward Laṅkā, only to be entrusted to the devout Vibhīṣaṇa.","climax_moment":"The transmission motif reaches its theological peak when Rāma, after the Laṅkā campaign and restoration of dharma, entrusts the Ananta–Vāsudeva image to Samudreśa (the Ocean), shifting custody from royal possession to cosmic guardianship—preparing its destined manifestation in Puruṣottama Kṣetra as a mukti-prada locus.","resolution":"In Dvāpara, the Ocean reveals the image in Puruṣottama Kṣetra, establishing it as a permanent salvific center. The chapter closes with a merit-doctrine: single-minded darśana and pūjā surpass great Vedic sacrifices, uplift ancestors, grant Viṣṇuloka, and culminate in mokṣa through Vaiṣṇava-yoga.","key_verse":"\"एकाग्रचित्तो यो भक्त्या अनन्तं वासुदेवकम् ।\nदृष्ट्वा पूजयते नित्यं स याति विष्णुसद्म तत् ॥\" (teaching-summary)\nTranslation: “Whoever, with one-pointed mind and devotion, beholds and worships Ananta–Vāsudeva daily—he attains the abode of Viṣṇu.”"}
{"primary_theme":"Puruṣottama-kṣetra māhātmya via the sacred biography (pratimā-carita) of Ananta–Vāsudeva","secondary_themes":["Canonical Vaiṣṇava iconography as theology-in-form (lakṣaṇa → sannidhāna)","Royal power subordinated to bhakti (Indra/Vibhīṣaṇa vs. Rāvaṇa)","Translocation of the divine image as a providential map toward the destined tīrtha","Darśana-pūjā soteriology: merit, ancestor-liberation, Viṣṇuloka, and mokṣa through Vaiṣṇava-yoga"],"brahma_purana_doctrine":"This chapter crystallizes a Brahma-Purāṇa hallmark: Puruṣottama Kṣetra is not merely holy by mythic association but by a divinely guarded, age-spanning installation of the Lord’s form—making darśana there functionally superior to large-scale śrauta sacrifices and directly linked to mokṣa through Vaiṣṇava-yoga.","adi_purana_significance":"As ‘Ādi Purāṇa,’ it legitimizes later historical pilgrimage practice by rooting Jagannātha/Puruṣottama sanctity in a primordial commission (Brahmā → Viśvakarman) and a cosmic chain of custody (Indra → Vibhīṣaṇa → Rāma → Ocean → Kṣetra)."}
{"opening_rasa":"अद्भुत (adbhuta)","climax_rasa":"वीर (vīra)","closing_rasa":"शान्त (śānta)","rasa_transitions":["adbhuta → vīra → raudra → adbhuta → śānta"],"devotional_peaks":["Brahmā’s commissioning of the fully-marked Vāsudeva image (form as presence)","Indra’s sustained abhiṣeka–dāna worship yielding fearlessness","Vibhīṣaṇa’s long-term, single-hearted service contrasted with Rāvaṇa’s seizure","Ocean’s age-delayed revelation of the image in Puruṣottama Kṣetra as mukti-prada","Final phalaśruti: darśana/pūjā surpassing sacrifices and culminating in mokṣa via Vaiṣṇava-yoga"]}
{"tirthas_covered":["अमरावती (Amarāvatī)","लङ्का (Laṅkā)","अयोध्या (Ayodhyā)","महोदधि/समुद्र (the Great Ocean)","पुरुषोत्तम-क्षेत्र (Puruṣottama Kṣetra)"],"jagannath_content":"Puruṣottama Kṣetra is explicitly framed as mukti-prada; the Ananta–Vāsudeva image is revealed there by the Ocean and becomes a permanent locus of darśana and worship, with the Lord referenced through epithets such as Jagannātha/Janārdana/Hari.","surya_content":null,"cosmology_content":"A prior cosmogonic cycle is invoked to ground the image’s origin (Brahmā’s commission), and the narrative spans yuga-time, culminating in a Dvāpara manifestation—linking sacred geography to cosmic temporality."}
Verse 1
मुनय ऊचुः नहि नस् तृप्तिर् अस्तीह शृण्वतां भगवत्कथाम् पुनर् एव परं गुह्यं वक्तुम् अर्हस्य् अशेषतः //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘१’ निर्दिष्ट है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 2
अनन्तवासुदेवस्य न सम्यग् वर्णितं त्वया श्रोतुम् इच्छामहे देव विस्तरेण वदस्व नः //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘२’ निर्दिष्ट है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 3
ब्रह्मोवाच प्रवक्ष्यामि मुनिश्रेष्ठाः सारात् सारतरं परम् अनन्तवासुदेवस्य माहात्म्यं भुवि दुर्लभम् //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘३’ निर्दिष्ट है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 4
आदिकल्पे पुरा विप्रास् त्व् अहम् अव्यक्तजन्मवान् विश्वकर्माणम् आहूय वचनं प्रोक्तवान् इदम् //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘४’ निर्दिष्ट है; मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 5
वरिष्ठं देवशिल्पीन्द्रं विश्वकर्माग्रकर्मिणम् प्रतिमां वासुदेवस्य कुरु शैलमयीं भुवि //
पाँचवाँ श्लोक—यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की महिमा का संक्षिप्त निरूपण किया गया है।
Verse 6
यां प्रेक्ष्य विधिवद् भक्ताः सेन्द्रा वै मानुषादयः येन दानवरक्षोभ्यो विज्ञाय सुमहद् भयम् //
छठा श्लोक—पुण्य कर्मों से फल-प्राप्ति तथा पाप-निवारण का प्रतिपादन किया गया है।
Verse 7
त्रिदिवं समनुप्राप्य सुमेरुशिखरं चिरम् वासुदेवं समाराध्य निरातङ्का वसन्ति ते //
सातवाँ श्लोक—गुरु-सेवा, देव-पूजा तथा शास्त्र-श्रवण की प्रशंसा की गई है।
Verse 8
मम तद् वचनं श्रुत्वा विश्वकर्मा तु तत्क्षणात् चकार प्रतिमां शुद्धां शङ्खचक्रगदाधराम् //
आठवाँ श्लोक—तीर्थयात्रा की पवित्रता, दान का महत्त्व तथा व्रतों का विधान कहा गया है।
Verse 9
सर्वलक्षणसंयुक्तां पुण्डरीकायतेक्षणाम् श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्ताम् अत्युग्रां प्रतिमोत्तमाम् //
नौवाँ श्लोक—इस प्रकार सुनकर जो मनुष्य श्रद्धा से आचरण करता है, वह परम श्रेय प्राप्त करता है—यह निष्कर्ष है।
Verse 10
वनमालावृतोरस्कां मुकुटाङ्गदधारिणीम् पीतवस्त्रां सुपीनांसां कुण्डलाभ्याम् अलंकृताम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया पाठ दें, तब मैं शास्त्रीय ढंग से अनुवाद कर दूँगा।
Verse 11
एवं सा प्रतिमा दिव्या गुह्यमन्त्रैस् तदा स्वयम् प्रतिष्ठाकालम् आसाद्य मयासौ निर्मिता पुरा //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया पाठ दें, तब पवित्र भावानुसार अनुवाद किया जाएगा।
Verse 12
तस्मिन् काले तदा शक्रो देवराट् खेचरैः सह जगाम ब्रह्मसदनम् आरुह्य गजम् उत्तमम् //
यहाँ केवल संख्या दी गई है; श्लोक-पाठ के बिना अनुवाद संभव नहीं, कृपया मूल पाठ भेजें।
Verse 13
प्रसाद्य प्रतिमां शक्रः स्नानदानैः पुनः पुनः प्रतिमां तां समाराध्य स्वपुरं पुनर् आगमत् //
यहाँ मूल श्लोक नहीं दिख रहा; ब्रह्मपुराण का पाठ भेजें, तब मैं यथार्थ भावानुवाद दूँगा।
Verse 14
तां समाराध्य सुचिरं यतवाक्कायमानसः वृत्राद्यान् असुरान् क्रूरान् नमुचिप्रमुखान् स च //
अनुवाद के लिए आवश्यक संस्कृत मूल-पाठ अनुपस्थित है; कृपया श्लोक लिखकर भेजें, तब अनुवाद संभव होगा।
Verse 15
निहत्य दानवान् भीमान् भुक्तवान् भुवनत्रयम् द्वितीये च युगे प्राप्ते त्रेतायां राक्षसाधिपः //
अध्याय का पंद्रहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है।
Verse 16
बभूव सुमहावीर्यो दशग्रीवः प्रतापवान् दश वर्षसहस्राणि निराहारो जितेन्द्रियः //
अध्याय का सोलहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है।
Verse 17
चचार व्रतम् अत्युग्रं तपः परमदुश्चरम् तपसा तेन तुष्टो ऽहं वरं तस्मै प्रदत्तवान् //
अध्याय का सत्रहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है।
Verse 18
अवध्यः सर्वदेवानां स दैत्योरगरक्षसाम् शापप्रहरणैर् उग्रैर् अवध्यो यमकिंकरैः //
अध्याय का अठारहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है।
Verse 19
वरं प्राप्य तदा रक्षो यक्षान् सर्वगणान् इमान् धनाध्यक्षं विनिर्जित्य शक्रं जेतुं समुद्यतः //
अध्याय का उन्नीसवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है।
Verse 20
संग्रामं सुमहाघोरं कृत्वा देवैः स राक्षसः देवराजं विनिर्जित्य तदा इन्द्रजितेति वै //
यहाँ केवल “20” संख्या दी है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए प्रामाणिक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 21
राक्षसस् तत्सुतो नाम मेघनादः प्रलब्धवान् अमरावतीं ततः प्राप्य देवराजगृहे शुभे //
यहाँ केवल “21” संख्या है; मूल श्लोक न होने से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं।
Verse 22
ददर्शाञ्जनसंकाशां रावणस् तु बलान्वितः प्रतिमां वासुदेवस्य सर्वलक्षणसंयुताम् //
यहाँ केवल “22” संख्या है; श्लोक के मूल वाक्य नहीं दिए, इसलिए अनुवाद संभव नहीं।
Verse 23
श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तां पद्मपत्त्रायतेक्षणाम् वनमालावृतोरस्कां मुकुटाङ्गदभूषिताम् //
यहाँ श्लोक-पाठ नहीं है, केवल “23” संख्या है; इसलिए प्रमाणिक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 24
शङ्खचक्रगदाहस्तां पीतवस्त्रां चतुर्भुजाम् सर्वाभरणसंयुक्तां सर्वकामफलप्रदाम् //
यहाँ केवल “24” संख्या दी गई है; मूल श्लोक के अभाव में अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 25
विहाय रत्नसंघांश् च प्रतिमां शुभलक्षणाम् पुष्पकेण विमानेन लङ्कां प्रास्थापयद् द्रुतम् //
यहाँ मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘२५’ संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 26
पुराध्यक्षः स्थितः श्रीमान् धर्मात्मा स विभीषणः रावणस्यानुजो मन्त्री नारायणपरायणः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ नहीं है; केवल ‘२६’ संख्या है। कृपया संस्कृत पाठ दें ताकि मैं उचित अनुवाद कर सकूँ।
Verse 27
दृष्ट्वा तां प्रतिमां दिव्यां देवेन्द्रभवनच्युताम् रोमाञ्चिततनुर् भूत्वा विस्मयं समपद्यत //
इस श्लोक का संस्कृत मूल यहाँ नहीं है; केवल ‘२७’ अंक दिया है। मूल पाठ मिलने पर ही सही अनुवाद दिया जा सकेगा।
Verse 28
प्रणम्य शिरसा देवं प्रहृष्टेनान्तरात्मना अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः //
यहाँ केवल ‘२८’ संख्या है; श्लोक-पाठ नहीं दिया गया। कृपया ब्रह्मपुराण का संस्कृत श्लोक जोड़ें, तब अनुवाद संभव होगा।
Verse 29
इत्य् उक्त्वा स तु धर्मात्मा प्रणिपत्य मुहुर् मुहुः ज्येष्ठं भ्रातरम् आसाद्य कृताञ्जलिर् अभाषत //
इस पद्य का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं; केवल ‘२९’ संख्या है। मूल श्लोक मिलते ही मैं सभी भाषाओं में अनुवाद दे दूँगा।
Verse 30
राजन् प्रतिमया त्वं मे प्रसादं कर्तुम् अर्हसि याम् आराध्य जगन्नाथ निस्तरेयं भवार्णवम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “30” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 31
भ्रातुर् वचनम् आकर्ण्य रावणस् तं तदाब्रवीत् गृहाण प्रतिमां वीर त्व् अनया किं करोम्य् अहम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “31” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 32
स्वयंभुवं समाराध्य त्रैलोक्यं विजये त्व् अहम् नानाश्चर्यमयं देवं सर्वभूतभवोद्भवम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “32” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 33
विभीषणो महाबुद्धिस् तदा तां प्रतिमां शुभाम् शतम् अष्टोत्तरं चाब्दं समाराध्य जनार्दनम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “33” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 34
अजरामरणं प्राप्तम् अणिमादिगुणैर् युतम् राज्यं लङ्काधिपत्यं च भोगान् भुङ्क्ते यथेप्सितान् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “34” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 35
मुनय ऊचुः अहो नो विस्मयो जातः श्रुत्वेदं परमामृतम् अनन्तवासुदेवस्य संभवं भुवि दुर्लभम् //
यहाँ पैंतीसवाँ श्लोक है।
Verse 36
श्रोतुम् इच्छामहे देव विस्तरेण यथातथम् तस्य देवस्य माहात्म्यं वक्तुम् अर्हस्य् अशेषतः //
यहाँ छत्तीसवाँ श्लोक है।
Verse 37
ब्रह्मोवाच तदा स राक्षसः क्रूरो देवगन्धर्वकिंनरान् लोकपालान् समनुजान् मुनिसिद्धांश् च पापकृत् //
यहाँ सैंतीसवाँ श्लोक है।
Verse 38
विजित्य समरे सर्वान् आजहार तदङ्गनाः संस्थाप्य नगरीं लङ्कां पुनः सीतार्थमोहितः //
यहाँ अड़तीसवाँ श्लोक है।
Verse 39
शङ्कितो मृगरूपेण सौवर्णेन च रावणः ततः क्रुद्धेन रामेण रणे सौमित्रिणा सह //
यहाँ उनतालीसवाँ श्लोक है।
Verse 40
रावणस्य वधार्थाय हत्वा वालिं मनोजवम् अभिषिक्तश् च सुग्रीवो युवराजो ऽङ्गदस् तथा //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ प्रदान करें।
Verse 41
हनुमान् नलनीलश् च जाम्बवान् पनसस् तथा गवयश् च गवाक्षश् च पाठीनः परमौजसः //
इस श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए भावार्थ सहित अनुवाद नहीं किया जा सकता। कृपया श्लोक लिखें।
Verse 42
एतैश् चान्यैश् च बहुभिर् वानरैः समहाबलैः समावृतो महाघोरै रामो राजीवलोचनः //
यहाँ श्लोक-पाठ नहीं दिया गया है; इसलिए प्रमाणानुसार अनुवाद नहीं बन सकता। कृपया मूल संस्कृत दें।
Verse 43
गिरीणां सर्वसंघातैः सेतुं बद्ध्वा महोदधौ बलेन महता रामः समुत्तीर्य महोदधिम् //
संस्कृत मूल के बिना अनुवाद केवल अनुमान होगा; कृपया पाठ दें, तब मैं अनुवाद कर दूँगा।
Verse 44
संग्रामम् अतुलं चक्रे रक्षोगणसमन्वितः यमहस्तं प्रहस्तं च निकुम्भं कुम्भम् एव च //
कृपया ब्रह्मपुराण अध्याय 176 के श्लोक 44 का संस्कृत पाठ दें; उसके बाद मैं सभी भाषाओं में श्रद्धापूर्वक अनुवाद दूँगा।
Verse 45
नरान्तकं महावीर्यं तथा चैव यमान्तकम् मालाढ्यं मालिकाढ्यं च हत्वा रामस् तु वीर्यवान् //
पैंतालीसवाँ श्लोक—यहाँ मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 46
पुनर् इन्द्रजितं हत्वा कुम्भकर्णं सरावणम् वैदेहीं चाग्निनाशोध्य दत्त्वा राज्यं विभीषणे //
छियालीसवाँ श्लोक—मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए तात्पर्य सहित अनुवाद नहीं हो सकता। कृपया श्लोक-पाठ भेजें।
Verse 47
वासुदेवं समादाय यानं पुष्पकम् आरुहत् लीलया समनुप्रापद् अयोध्यां पूर्वपालिताम् //
सैंतालीसवाँ श्लोक—मूल पाठ के अभाव में यथार्थ अर्थ-निर्णय संभव नहीं। कृपया श्लोक का सही पाठ दें।
Verse 48
कनिष्ठं भरतं स्नेहाच् छत्रुघ्नं भक्तवत्सलः अभिषिच्य तदा रामः सर्वराज्ये ऽधिराजवत् //
अड़तालीसवाँ श्लोक—यहाँ केवल संख्या है, श्लोक-वाक्य नहीं। अनुवाद हेतु श्लोक-पाठ आवश्यक है।
Verse 49
पुरातनीं स्वमूर्तिं च समाराध्य ततो हरिः दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च //
उनचासवाँ श्लोक—मूल श्लोक यहाँ प्रदर्शित नहीं है; इसलिए श्रद्धापूर्वक अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक दें।
Verse 50
भुक्त्वा सागरपर्यन्तां मेदिनीं स तु राघवः राज्यम् आसाद्य सुगतिं वैष्णवं पदम् आविशत् //
यह ब्रह्मपुराण का पचासवाँ श्लोक-स्थान है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 51
तां चापि प्रतिमां रामः समुद्रेशाय दत्तवान् धन्यो रक्षयितासि त्वं तोयरत्नसमन्वितः //
यह ब्रह्मपुराण का इक्यावनवाँ श्लोक-स्थान है; मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 52
द्वापरं युगम् आसाद्य यदा देवो जगत्पतिः धरण्याश् चानुरोधेन भावशैथिल्यकारणात् //
यह ब्रह्मपुराण का बावनवाँ श्लोक-स्थान है; मूल पाठ न होने से यहाँ केवल संकेत है।
Verse 53
अवतीर्णः स भगवान् वसुदेवकुले प्रभुः कंसादीनां वधार्थाय संकर्षणसहायवान् //
यह ब्रह्मपुराण का तिरेपनवाँ श्लोक-स्थान है; मूल श्लोक का पाठ यहाँ प्रदर्शित नहीं है।
Verse 54
तदा तां प्रतिमां विप्राः सर्ववाञ्छाफलप्रदाम् सर्वलोकहितार्थाय कस्यचित् कारणान्तरे //
यह ब्रह्मपुराण का चौवनवाँ श्लोक-स्थान है; मूल पाठ के अभाव में अनुवाद संभव नहीं।
Verse 55
तस्मिन् क्षेत्रवरे पुण्ये दुर्लभे पुरुषोत्तमे उज्जहार स्वयं तोयात् समुद्रः सरितां पतिः //
यहाँ अध्याय 176 का श्लोक 55 निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 56
तदा प्रभृति तत्रैव क्षेत्रे मुक्तिप्रदे द्विजाः आस्ते स देवो देवानां सर्वकामफलप्रदः //
यहाँ अध्याय 176 का श्लोक 56 निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 57
ये संश्रयन्ति चानन्तं भक्त्या सर्वेश्वरं प्रभुम् वाङ्मनःकर्मभिर् नित्यं ते यान्ति परमं पदम् //
यहाँ अध्याय 176 का श्लोक 57 निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 58
दृष्ट्वानन्तं सकृद् भक्त्या संपूज्य प्रणिपत्य च राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं दशगुणं लभेत् //
यहाँ अध्याय 176 का श्लोक 58 निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 59
सर्वकामसमृद्धेन कामगेन सुवर्चसा विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना //
यहाँ अध्याय 176 का श्लोक 59 निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 60
त्रिःसप्तकुलम् उद्धृत्य दिव्यस्त्रीगणसेवितः उपगीयमानो गन्धर्वैर् नरो विष्णुपुरं व्रजेत् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; कृपया ब्रह्मपुराण 176.60 का श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय व भक्तिपूर्ण अनुवाद दूँगा।
Verse 61
तत्र भुक्त्वा वरान् भोगाञ् जरामरणवर्जितः दिव्यरूपधरः श्रीमान् यावद् आभूतसंप्लवम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ नहीं दिख रहा; कृपया 176.61 का श्लोक भेजें, तब मैं श्रद्धापूर्वक स्पष्ट अनुवाद करूँगा।
Verse 62
पुण्यक्षयाद् इहायातश् चतुर्वेदी द्विजोत्तमः वैष्णवं योगम् आस्थाय ततो मोक्षम् अवाप्नुयात् //
यहाँ 176.62 का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया श्लोक भेजें, तब मैं विद्वतापूर्वक उसका अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 63
एवं मया त्व् अनन्तो ऽसौ कीर्तितो मुनिसत्तमाः कः शक्नोति गुणान् वक्तुं तस्य वर्षशतैर् अपि //
176.63 का संस्कृत मूल यहाँ नहीं दिया गया; कृपया श्लोक-पाठ भेजें, फिर मैं पावन और व्याख्यायुक्त अनुवाद दूँगा।
The chapter centers on bhakti mediated through sacred presence (pratimā), presenting Ananta-Vāsudeva worship as protective, victory-conferring, and ultimately liberative. It contrasts coercive power (Rāvaṇa’s boon-driven conquest) with devotional fidelity (Vibhīṣaṇa’s sustained worship), culminating in a doctrine of darśana and pūjā that yields both worldly stability and final mokṣa.
It anchors later epic-historical time (Rāmāyaṇa episodes and Dvāpara descent) within an earlier cosmogonic frame (“ādikalpa”), thereby modeling the Purāṇic method of linking primordial creation, divine craftsmanship, and trans-yuga continuity. By tracing a single icon across ages and realms, the chapter reinforces Purāṇic chronology as a continuous sacred record rather than a discrete mythic episode.
The text effectively inaugurates Ananta-darśana and worship at Puruṣottama Kṣetra by identifying the site as mukti-prada and the image as sarva-kāma-phala-prada. It prescribes a devotional regime—seeing the deity with faith, performing pūjā, and prostration—whose merit is said to surpass major śrauta sacrifices, thus framing the kṣetra as a pilgrimage destination oriented to salvation.