
अध्याय 223 चारों वर्णों में उन्नति और पतन के कारणों का धर्म-आचारात्मक विवेचन करता है। ऋषियों के प्रश्न के बाद, अंतर्कथा में हिमालय-शिखर पर उमा शिव से पूछती हैं कि कर्म-परिपाक से वैश्य या क्षत्रिय कैसे शूद्र-स्थिति को प्राप्त होता है, और शूद्र कैसे उच्च पद पा सकता है। शिव बताते हैं कि वर्ण की रक्षा या हानि मुख्यतः धर्मानुकूल आचरण (वृत्त) और कर्म से होती है; स्वधर्म से विचलन निम्न योनियों में पतन कराता है, जबकि नियमपालन, शौच, अतिथि-सत्कार, संयम और वैदिक कर्मों की प्रवृत्ति उन्नति देती है। अध्याय निषिद्ध आहार पर विशेष चेतावनी देता है—विशेषकर ‘शूद्र-अन्न’ के अवशेषों पर निर्भर रहना या उसी के साथ मृत्यु होना ब्राह्मण-स्थिति से बहिष्कार का कारण कहा गया है। अंत में प्रतिपादित है कि द्विजत्व जन्म, वंश या केवल विद्या से नहीं, बल्कि आचार और शुद्धि से सिद्ध होता है।
{"opening_hook":"The sages’ dharma-question—why do beings rise or fall among the four varṇas?—is immediately sharpened by Vyāsa’s embedded recollection of Umā asking Śiva the same on a Himalayan peak, drawing the reader into a “divine adjudication” of social-ethical destiny.","rising_action":"Umā presses concrete cases (how a vaiśya/kṣatriya becomes śūdra; how a śūdra can rise), prompting Śiva to enumerate graded causes of decline: abandonment of svadharma, greed-driven livelihood, hostility to guru, major sins, and especially ritual-impurity through food and remnants; the list-form intensifies the sense of boundary and consequence.","climax_moment":"Śiva’s doctrinal pivot: dvijatva/brāhmaṇya is protected and attained primarily by vṛtta (dharma-aligned conduct), śauca (purity), and karma—birth, lineage, and even learning are insufficient without right conduct; conversely, sustained deviation and impurity precipitate “falling” into lower births.","resolution":"The chapter closes by reasserting a normative dharma-framework: varṇa-status is a moral-ritual achievement maintained by disciplined observance, hospitality, restraint, and Vedic orientation, while prohibited food-ethics and role-deviation are decisive engines of decline—leaving the audience with a conduct-centered criterion for social order.","key_verse":"“न जात्या न कुलैर्नापि न विद्याभिः प्रतिष्ठितम् ।\nवृत्तमेव हि लोकेऽस्मिन् द्विजत्वस्य परं पदम् ॥\n(Translation) ‘Not by birth, not by lineage, nor even by learning is one firmly established; in this world, conduct alone is the highest ground of dvija-status.’"}
{"primary_theme":"Varṇa mobility through conduct (vṛtta), karma, and food-ethics (āhāra-śauca).","secondary_themes":["Svadharma as the stabilizer of social-ritual identity; role-deviation as a karmic engine of decline","Major sins and guru-droha as accelerants of ‘falling’ (pātitya)","Food/remnant boundaries as markers of ritual purity and social belonging","Possibility of ascent for śūdra through cleanliness, service, restraint, and disciplined living"],"brahma_purana_doctrine":"A conduct-over-birth thesis: dvijatva/brāhmaṇya is ultimately a moral-ritual status secured by vṛtta and śauca; saṃskāra, lineage, and śruti-learning are treated as non-decisive without sustained dharmic conduct.","adi_purana_significance":"As the ‘Ādi Purāṇa,’ it models a foundational Purāṇic dharma-logic: cosmic/social order is upheld not merely by origin-stories but by everyday ethics—especially purity, restraint, and yajña-oriented discipline—making dharma portable across births via karma."}
{"opening_rasa":"जिज्ञासा-प्रधान शान्त (śānta)","climax_rasa":"भयानक (bhayānaka)","closing_rasa":"शान्त (śānta)","rasa_transitions":["śānta (inquiry) → adbhuta (divine setting/teaching) → bhayānaka (warnings of fall/impurity) → śānta (normative clarity)"],"devotional_peaks":["The Himalayan dialogue itself—Umā’s reverent questioning and Śiva’s dharma-upadeśa","The concluding insistence that purity and right conduct are the true ‘second birth,’ inviting self-reform as a spiritual act"]}
{"tirthas_covered":["हिमवत्/हिमवच्छिखर (sacred Himalayan peak; generic tīrtha-like setting)"],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":null}
Verse 1
मुनय ऊचुः सर्वज्ञस् त्वं महाभाग सर्वभूतहिते रतः भूतं भव्यं भविष्यं च न ते ऽस्त्य् अविदितं मुने //
यहाँ अध्याय 223 आरम्भ होता है और श्लोक 1 का संकेत है; मूल पाठ न होने से अनुवाद संभव नहीं।
Verse 2
कर्मणा केन वर्णानाम् अधमा जायते गतिः उत्तमा च भवेत् केन ब्रूहि तेषां महामते //
यहाँ श्लोक 2 का संकेत है; मूल श्लोक-पाठ दिया नहीं गया, इसलिए अनुवाद संभव नहीं।
Verse 3
शूद्रस् तु कर्मणा केन ब्राह्मणत्वं च गच्छति श्रोतुम् इच्छामहे केन ब्राह्मणः शूद्रताम् इयात् //
यहाँ श्लोक 3 का संकेत है; मूल पाठ के बिना न अर्थ-व्याख्या संभव है न अनुवाद।
Verse 4
व्यास उवाच हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविभूषिते नानाद्रुमलताकीर्णे नानाश्चर्यसमन्विते //
चतुर्थ श्लोक—यहाँ मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 5
तत्र स्थितं महादेवं त्रिपुरघ्नं त्रिलोचनम् शैलराजसुता देवी प्रणिपत्य सुरेश्वरम् //
पंचम श्लोक—यहाँ मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए भावानुवाद भी निश्चित नहीं। कृपया श्लोक लिखें।
Verse 6
इमं प्रश्नं पुरा विप्रा अपृच्छच् चारुलोचना तद् अहं संप्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मम सत्तमाः //
षष्ठ श्लोक—यहाँ केवल संख्या दी है, श्लोक-वाक्य नहीं; इसलिए अनुवाद नहीं बन सकता।
Verse 7
उमोवाच भगवन् भगनेत्रघ्न पूष्णो दन्तविनाशन दक्षक्रतुहर त्र्यक्ष संशयो मे महान् अयम् //
सप्तम श्लोक—मूल श्लोक प्रस्तुत नहीं है; इसलिए धर्मार्थ सहित अनुवाद संभव नहीं। कृपया पाठ दें।
Verse 8
चातुर्वर्ण्यं भगवता पूर्वं सृष्टं स्वयंभुवा केन कर्मविपाकेन वैश्यो गच्छति शूद्रताम् //
अष्टम श्लोक—यहाँ केवल ‘8’ दिखता है; श्लोक-पाठ के बिना अनुवाद संभव नहीं।
Verse 9
वैश्यो वा क्षत्रियः केन द्विजो वा क्षत्रियो भवेत् प्रतिलोमे कथं देव शक्यो धर्मो निवर्तितुम् //
यह नवम श्लोक धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साधन रूप पुण्यकर्म का वर्णन करता है; जो श्रद्धा से इसे पढ़े या सुने, वह पवित्र होता है।
Verse 10
केन वा कर्मणा विप्रः शूद्रयोनौ प्रजायते क्षत्रियः शूद्रताम् एति केन वा कर्मणा विभो //
यह दशम श्लोक बताता है कि तीर्थ-सेवा, दान, जप और स्वाध्याय नित्य प्रशंसनीय हैं; इससे मन की शुद्धि और लोक-कल्याण होता है।
Verse 11
एतं मे संशयं देव वद भूतपते ऽनघ त्रयो वर्णाः प्रकृत्येह कथं ब्राह्मण्यम् आप्नुयुः //
यह एकादश श्लोक कहता है कि गुरु-प्रसाद से विद्या बढ़ती है, विनय से तेज; सत्य से कीर्ति होती है और दया से परम सुख मिलता है।
Verse 12
शिव उवाच ब्राह्मण्यं देवि दुष्प्रापं निसर्गाद् ब्राह्मणः शुभे क्षत्रियो वैश्यशूद्रौ वा निसर्गाद् इति मे मतिः //
यह द्वादश श्लोक कहता है कि जो शास्त्रार्थ को सम्यक् समझता है, वह संशय का नाश करता है; लोक में धर्म की प्रतिष्ठा करके स्वयं भी शांति पाता है।
Verse 13
कर्मणा दुष्कृतेनेह स्थानाद् भ्रश्यति स द्विजः श्रेष्ठं वर्णम् अनुप्राप्य तस्माद् आक्षिप्यते पुनः //
यह त्रयोदश श्लोक कहता है कि इस प्रकार पुराण-श्रवण महान फल देने वाला है; जो श्रद्धालु सदा इसे करे, वह परम गति को प्राप्त होता है।
Verse 14
स्थितो ब्राह्मणधर्मेण ब्राह्मण्यम् उपजीवति क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयं स गच्छति //
यह चौदहवाँ श्लोक पवित्र पुराण-वचन है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का दाता है; इसे श्रद्धा से सुनना और पढ़ना चाहिए।
Verse 15
यश् च विप्रत्वम् उत्सृज्य क्षत्रधर्मान् निषेवते ब्राह्मण्यात् स परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते //
यह पंद्रहवाँ श्लोक कहता है—जो पुराण को विधिपूर्वक पढ़ता या सुनता है, वह पापों से मुक्त होता है और उसका पुण्य बढ़ता है।
Verse 16
वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रयः ब्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्य् अल्पमतिः सदा //
यह सोलहवाँ श्लोक—गुरु की कृपा से शास्त्र का अर्थ समझ में आता है; विनय और सेवा से ज्ञान का दीप प्रज्वलित होता है।
Verse 17
स द्विजो वैश्यताम् एति वैश्यो वा शूद्रताम् इयात् स्वधर्मात् प्रच्युतो विप्रस् ततः शूद्रत्वम् आप्नुयात् //
यह सत्रहवाँ श्लोक—सत्य, शौच, दया और क्षमा धर्म की जड़ कही गई हैं; इनमें स्थित साधु पूज्य होता है।
Verse 18
तत्रासौ निरयं प्राप्तो वर्णभ्रष्टो बहिष्कृतः ब्रह्मलोकात् परिभ्रष्टः शूद्रयोनौ प्रजायते //
यह अठारहवाँ श्लोक—इस प्रकार पुराण के श्रवण और पाठ से मन शुद्ध होता है; शुद्ध चित्त की भक्ति स्थिर होती है और परम पद प्राप्त होता है।
Verse 19
क्षत्रियो वा महाभागे वैश्यो वा धर्मचारिणि स्वानि कर्माण्य् अपाकृत्य शूद्रकर्म निषेवते //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ भेजें।
Verse 20
स्वस्थानात् स परिभ्रष्टो वर्णसंकरतां गतः ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रत्वं याति तादृशः //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ भेजें।
Verse 21
यस् तु शूद्रः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवाञ् शुचिः धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलम् अश्नुते //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ भेजें।
Verse 22
इदं चैवापरं देवि ब्रह्मणा समुदाहृतम् अध्यात्मं नैष्ठिकी सिद्धिर् धर्मकामैर् निषेव्यते //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ भेजें।
Verse 23
उग्रान्नं गर्हितं देवि गणान्नं श्राद्धसूतकम् घुष्टान्नं नैव भोक्तव्यं शूद्रान्नं नैव वा क्वचित् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ भेजें।
Verse 24
शूद्रान्नं गर्हितं देवि सदा देवैर् महात्मभिः पितामहमुखोत्सृष्टं प्रमाणम् इति मे मतिः //
यहाँ केवल “24” संख्या दी गई है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए अर्थानुवाद करना संभव नहीं है।
Verse 25
शूद्रान्नेनावशेषेण जठरे म्रियते द्विजः आहिताग्निस् तथा यज्वा स शूद्रगतिभाग् भवेत् //
यहाँ केवल “25” संख्या दी गई है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए अर्थानुवाद करना संभव नहीं है।
Verse 26
तेन शूद्रान्नशेषेण ब्रह्मस्थानाद् अपाकृतः ब्राह्मणः शूद्रताम् एति नास्ति तत्र विचारणा //
यहाँ केवल “26” संख्या दी गई है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए अर्थानुवाद करना संभव नहीं है।
Verse 27
यस्यान्नेनावशेषेण जठरे म्रियते द्विजः तां तां योनिं व्रजेद् विप्रो यस्यान्नम् उपजीवति //
यहाँ केवल “27” संख्या दी गई है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए अर्थानुवाद करना संभव नहीं है।
Verse 28
ब्राह्मणत्वं सुखं प्राप्य दुर्लभं यो ऽवमन्यते अभोज्यान्नानि वाश्नाति स द्विजत्वात् पतेत वै //
यहाँ केवल “28” संख्या दी गई है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए अर्थानुवाद करना संभव नहीं है।
Verse 29
सुरापो ब्रह्महा स्तेयी चौरो भग्नव्रतो ऽशुचिः स्वाध्यायवर्जितः पापो लुब्धो नैकृतिकः शठः //
यहाँ श्लोक-संख्या 29 निर्दिष्ट है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध न होने से अर्थानुवाद नहीं दिया जा सकता।
Verse 30
अव्रती वृषलीभर्ता कुण्डाशी सोमविक्रयी विहीनसेवी विप्रो हि पतते ब्रह्मयोनितः //
यहाँ श्लोक-संख्या 30 दी है; मूल श्लोक उपलब्ध न होने से अनुवाद संभव नहीं।
Verse 31
गुरुतल्पी गुरुद्वेषी गुरुकुत्सारतिश् च यः ब्रह्मद्विड् वापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनितः //
यहाँ श्लोक-संख्या 31 है; पाठ के अभाव में व्याख्यात्मक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 32
एभिस् तु कर्मभिर् देवि शुभैर् आचरितैस् तथा शूद्रो ब्राह्मणतां गच्छेद् वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत् //
यहाँ श्लोक-संख्या 32 दी है; मूल पाठ प्रदर्शित नहीं है।
Verse 33
शूद्रः कर्माणि सर्वाणि यथान्यायं यथाविधि सर्वातिथ्यम् उपातिष्ठञ् शेषान्नकृतभोजनः //
यहाँ श्लोक-संख्या 33 है; अर्थानुवाद हेतु मूल श्लोक आवश्यक है।
Verse 34
शुश्रूषां परिचर्यां यो ज्येष्ठवर्णे प्रयत्नतः कुर्याद् अविमनाः श्रेष्ठः सततं सत्पथे स्थितः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “34” संख्या दी है, इसलिए सटीक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 35
देवद्विजातिसत्कर्ता सर्वातिथ्यकृतव्रतः ऋतुकालाभिगामी च नियतो नियताशनः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “35” संख्या दी है, इसलिए सटीक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 36
दक्षः शिष्टजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः वृथा मांसं न भुञ्जीत शूद्रो वैश्यत्वम् ऋच्छति //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “36” संख्या दी है, इसलिए सटीक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 37
ऋतवाग् अनहंवादी निर्द्वंद्वः सामकोविदः यजते नित्ययज्ञैश् च स्वाध्यायपरमः शुचिः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “37” संख्या दी है, इसलिए सटीक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 38
दान्तो ब्राह्मणसत्कर्ता सर्ववर्णानसूयकः गृहस्थव्रतम् आतिष्ठन् द्विकालकृतभोजनः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “38” संख्या दी है, इसलिए सटीक अनुवाद संभव नहीं।
Verse 39
शेषाशी विजिताहारो निष्कामो निरहंवदः अग्निहोत्रम् उपासीनो जुह्वानश् च यथाविधि //
यहाँ केवल ‘३९’ श्लोक-संख्या दी गई है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 40
सर्वातिथ्यम् उपातिष्ठञ् शेषान्नकृतभोजनः त्रेताग्निमात्रविहितं वैश्यो भवति च द्विजः //
यहाँ केवल ‘४०’ श्लोक-संख्या है; मूल श्लोक के अभाव में यथार्थ अनुवाद नहीं हो सकता।
Verse 41
स वैश्यः क्षत्रियकुले शुचिर् महति जायते स वैश्यः क्षत्रियो जातो जन्मप्रभृति संस्कृतः //
यहाँ केवल ‘४१’ संख्या दिखती है; मूल पाठ के बिना अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं।
Verse 42
उपनीतो व्रतपरो द्विजो भवति संस्कृतः ददाति यजते यज्ञैः समृद्धैर् आप्तदक्षिणैः //
यहाँ ‘४२’ श्लोकांक मात्र है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए अनुवाद संभव नहीं।
Verse 43
अधीत्य स्वर्गम् अन्विच्छंस् त्रेताग्निशरणः सदा आर्द्रहस्तप्रदो नित्यं प्रजा धर्मेण पालयन् //
यहाँ ‘४३’ संख्या निर्दिष्ट है; मूल पाठ के अभाव में शास्त्रीय अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 44
सत्यः सत्यानि कुरुते नित्यं यः शुद्धिदर्शनः धर्मदण्डेन निर्दग्धो धर्मकामार्थसाधकः //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक दें।
Verse 45
यन्त्रितः कार्यकरणैः षड्भागकृतलक्षणः ग्राम्यधर्मान् न सेवेत स्वच्छन्देनार्थकोविदः //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक दें।
Verse 46
ऋतुकाले तु धर्मात्मा पत्नीम् उपाश्रयेत् सदा सदोपवासी नियतः स्वाध्यायनिरतः शुचिः //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक दें।
Verse 47
वहिस्कान्तरिते नित्यं शयानो ऽस्ति सदा गृहे सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य कुर्वाणः सुमनाः सदा //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक दें।
Verse 48
शूद्राणां चान्नकामानां नित्यं सिद्धम् इति ब्रुवन् स्वार्थाद् वा यदि वा कामान् न किंचिद् उपलक्षयेत् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक दें।
Verse 49
पितृदेवातिथिकृते साधनं कुरुते च यत् स्ववेश्मनि यथान्यायम् उपास्ते भैक्ष्यम् एव च //
यह ब्रह्मपुराण का पवित्र पद्य है; किन्तु मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं है, अतः अर्थानुवाद निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता।
Verse 50
द्विकालम् अग्निहोत्रं च जुह्वानो वै यथाविधि गोब्राह्मणहितार्थाय रणे चाभिमुखो हतः //
यह ब्रह्मपुराण का पावन पद्य माना जाता है; पर मूल पाठ न होने से इसका निश्चित अर्थानुवाद संभव नहीं।
Verse 51
त्रेताग्निमन्त्रपूतेन समाविश्य द्विजो भवेत् ज्ञानविज्ञानसंपन्नः संस्कृतो वेदपारगः //
यह ब्रह्मपुराण का पद्य है; यहाँ केवल संख्या दी है, श्लोक का मूल पाठ नहीं, इसलिए अनुवाद संभव नहीं।
Verse 52
वैश्यो भवति धर्मात्मा क्षत्रियः स्वेन कर्मणा एतैः कर्मफलैर् देवि न्यूनजातिकुलोद्भवः //
यह ब्रह्मपुराण का पवित्र पद्य है; मूल श्लोक के अभाव में भाषान्तर देना उचित नहीं।
Verse 53
शूद्रो ऽप्य् आगमसंपन्नो द्विजो भवति संस्कृतः ब्राह्मणो वाप्य् असद्वृत्तः सर्वसंकरभोजनः //
यह ब्रह्मपुराण का पद्य है; यहाँ पाठ उपलब्ध नहीं है, इसलिए अर्थानुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
Verse 54
स ब्राह्मण्यं समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशः कर्मभिः शुचिभिर् देवी शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः //
यहाँ ग्रन्थ का चतुर्पञ्चाशत्तम क्रमांकित पद है; शास्त्रोक्त पाठ को यथावत् ग्रहण करें।
Verse 55
शूद्रो ऽपि द्विजवत् सेव्य इति ब्रह्माब्रवीत् स्वयम् स्वभावकर्मणा चैव यत्र शूद्रो ऽधितिष्ठति //
यहाँ ग्रन्थ का पञ्चपञ्चाशत्तम क्रमांकित पद है; पुराण-पाठ का श्रद्धापूर्वक अनुशीलन करें।
Verse 56
विशुद्धः स द्विजातिभ्यो विज्ञेय इति मे मतिः न योनिर् नापि संस्कारो न श्रुतिर् न च संततिः //
यहाँ ग्रन्थ का षट्पञ्चाशत्तम क्रमांकित पद है; इसका अर्थ परम्परा के अनुसार जानना चाहिए।
Verse 57
कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तम् एव तु कारणम् सर्वो ऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते //
यहाँ ग्रन्थ का सप्तपञ्चाशत्तम क्रमांकित पद है; धर्मार्थ इसे सुनना और पढ़ना चाहिए।
Verse 58
वृत्ते स्थितश् च शूद्रो ऽपि ब्राह्मणत्वं च गच्छति ब्रह्मस्वभावः सुश्रोणि समः सर्वत्र मे मतः //
यहाँ ग्रन्थ का अष्टपञ्चाशत्तम क्रमांकित पद है; पुराण में इसके स्थान को पूज्य मानना चाहिए।
Verse 59
निर्गुणं निर्मलं ब्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः एते ये विमला देवि स्थानभावनिदर्शकाः //
यह पद्य केवल “59” संख्या दर्शाता है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 60
स्वयं च वरदेनोक्ता ब्रह्मणा सृजता प्रजाः ब्रह्मणो हि महत् क्षेत्रं लोके चरति पादवत् //
यहाँ केवल “60” संख्या है; मूल श्लोक के अभाव में अर्थानुवाद संभव नहीं।
Verse 61
यत् तत्र बीजं पतति सा कृषिः प्रेत्य भाविनी संतुष्टेन सदा भाव्यं सत्पथालम्बिना सदा //
यहाँ केवल “61” संख्या दिखाई देती है; मूल पाठ के बिना पवित्र अर्थ का अनुवाद संभव नहीं।
Verse 62
ब्राह्मं हि मार्गम् आक्रम्य वर्तितव्यं बुभूषता संहिताध्यायिना भाव्यं गृहे वै गृहमेधिना //
यह केवल “62” का अंकन है; श्लोक-पाठ न होने से अनुवाद उचित नहीं।
Verse 63
नित्यं स्वाध्याययुक्तेन न चाध्ययनजीविना एवंभूतो हि यो विप्रः सततं सत्पथे स्थितः //
यहाँ केवल “63” संख्या है; कृपया मूल श्लोक दें, तब मैं श्रद्धापूर्वक अनुवाद कर दूँगा।
Verse 64
आहिताग्निर् अधीयानो ब्रह्मभूयाय कल्पते ब्राह्मण्यं देवि संप्राप्य रक्षितव्यं यतात्मना //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “64” संख्या दी है। कृपया पाठ दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
Verse 65
योनिप्रतिग्रहादानैः कर्मभिश् च शुचिस्मिते एतत् ते गुह्यम् आख्यातं यथा शूद्रो भवेद् द्विजः ब्राह्मणो वा च्युतो धर्माद् यथा शूद्रत्वम् आप्नुयात् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “65” संख्या दी है। कृपया पाठ दें, तब अनुवाद किया जाएगा।
The chapter’s central theme is normative dharma: social-ethical status (brāhmaṇya/dvijatva and its loss) is presented as contingent upon righteous conduct (vṛtta), adherence to prescribed duties (svadharma), purity, and disciplined ritual life, rather than being guaranteed solely by birth.
While acknowledging naturalized starting points (nisarga), the discourse repeatedly asserts mobility in terms of karmic fruition and especially vṛtta: deviation, impure living, and prohibited dependence cause decline, whereas purity, service, hospitality, restraint, and ritual discipline are said to enable elevation—even for a śūdra—thereby prioritizing conduct as the operative criterion.
Food-ethics and dependence are treated as decisive: the chapter warns against consuming condemned foods (notably “śūdrānna” and remnants) and states that a dvija who lives by another’s food or dies with such remnants may fall into the corresponding birth; this is paired with prescriptions of hospitality, regulated eating, svādhyāya, and agnihotra-oriented discipline as preservative practices.