दूत उवाच त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम मात्मनः वासुदेवात्मकं मूढ मुक्त्वा सर्वम् अशेषतः //
यह षष्ठ श्लोक है—धर्म का मूल श्रुति और स्मृति आदि हैं; उनका सार पुराणों में विस्तार से निरूपित होता है।