ज्ञातस् त्वद्वाक्यसद्भावो यत् कार्यं तद् विधीयताम् गृहीतचिह्न एवाहम् आगमिष्यामि ते पुरम् //
दशम श्लोक—धर्म का आचरण लोक-हितकारी और पाप-क्षय करने वाला है।