
अध्याय 34 में शिव (रुद्र/शंकर) और प्रजापति दक्ष के वैर का कारण-वृत्तांत आता है। ब्रह्मा बताते हैं कि शिव ने दक्ष के भव्य यज्ञ में विघ्न किया, जिससे देवगण भयभीत हुए और शिव की स्वतंत्र, सर्वव्यापी शक्ति प्रकट हुई। फिर दक्ष के घर पुत्रियों की सभा में शिवपत्नी सती बिना बुलाए आती हैं और सबके सामने अपमानित होती हैं। सती प्रतिवाद कर पुनर्जन्म का संकल्प लेती हैं और योगाग्नि से आत्मदाह करती हैं; इससे शिव का प्रचंड क्रोध भड़कता है और दक्ष-रुद्र के बीच परस्पर शापों का क्रम चलता है। आगे मन्वंतर-परिवर्तन के अनुसार दक्ष मनुष्यों में पुनर्जन्म लेते हैं और सती हिमवान् व मेना की पुत्री उमा बनती हैं। कश्यप के उपदेश से हिमवान् श्रेष्ठ संतान की कामना करते हैं और संतान से पितरों के उद्धार का दृष्टांत सुनकर उमा तथा उनकी बहनों (अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला) के कठोर तप का वर्णन होता है। ब्रह्मा हस्तक्षेप कर शिव को उमा का नियत वर बताते हैं और अंत में शिव के दिव्य नामों का स्मरण होता है।
{"opening_hook":"Brahmā resumes the etiological memory of Dakṣa’s earlier yajña—already once shattered by Rudra—so that the reader enters a world where even the devas tremble and seek refuge at Kailāsa, establishing Śiva’s non-derivative sovereignty.","rising_action":"Dakṣa convenes his daughters in a domestic-cum-ritual assembly; Satī arrives without invitation, meets public slight and the deliberate omission of Śiva from honor, and turns the scene into a debate on dharma: paternal authority versus marital allegiance and the inviolability of Rudra’s status.","climax_moment":"Satī, unable to bear the insult to Tryambaka, vows rebirth and performs agneyī dhāraṇā—yogic ignition—entering fire by her own will; the act becomes both protest and metaphysical transition, immediately summoning Śiva’s wrath and the logic of curse-and-countercurse that binds ritual history to cosmic time.","resolution":"The narrative is re-stitched through manvantara logic: Dakṣa’s rebirth among humans and Satī’s rebirth as Umā, daughter of Himavān and Menā; Kaśyapa’s counsel on progeny as ancestor-liberation motivates Himavān’s tapas; Umā and her sisters’ austerities culminate in Brahmā’s intervention, confirming Śarva/Maheśvara as Umā’s destined husband and closing with Śiva’s transcendent epithets and immeasurable forms.","key_verse":"“By the fire of yoga she abandoned that body, vowing again to be born for Śaṅkara; thus the Lord’s power is not bound by sacrifice, nor by the gods’ ordinances.” (Memorable teaching of the chapter; phrased as a faithful sense-translation rather than a fixed critical-edition citation.)"}
{"primary_theme":"Rudra’s sovereignty over sacrifice and the Satī→Umā rebirth arc (yajña-bhaṅga, yogic self-immolation, tapas, and destined union).","secondary_themes":["Ritual without reverence: critique of yajña-pride and social honor-politics in sacred assemblies","Curse as cosmological mechanism: imprecation linking ethics, ritual history, and manvantara cycles","Progeny as ancestor-liberation: Kaśyapa’s counsel to Himavān and the dharmic value of offspring","Tapas as world-ordering force: ascetic heat compelling divine adjudication"],"brahma_purana_doctrine":"The chapter advances a Purāṇic Śaiva doctrine compatible with the Adi-Purāṇa frame: Rudra is an independent cosmic authority whose recognition is prerequisite for sacrificial legitimacy, while cyclical time (manvantara) integrates rupture into continuity through rebirth and re-ordination.","adi_purana_significance":"As ‘First Purāṇa’ style narrative theology, it supplies an origin-explanation (etiology) for a major pan-Purāṇic myth while explicitly mapping it onto manvantara succession—showing how primordial conflicts become templates for later cosmic and social order."}
{"opening_rasa":"अद्भुत (adbhuta)","climax_rasa":"रौद्र (raudra)","closing_rasa":"शान्त (shanta)","rasa_transitions":["adbhuta → भयानक (bhayanaka) → वीर (vira) → करुण (karuna) → रौद्र (raudra) → अद्भुत (adbhuta) → शान्त (shanta)"],"devotional_peaks":["Satī’s uncompromising defense of Tryambaka’s honor as a form of bhakti grounded in dharma","The agneyī dhāraṇā moment: yogic surrender that turns grief into vow and metaphysical passage","Umā’s tapas ‘heating the worlds,’ culminating in Brahmā’s authoritative confirmation of Śiva as her goal"]}
{"tirthas_covered":["कैलास (Kailāsa)","एकाम्रक (Ekāmraka)","वाराणसी (Vārāṇasī)"],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":"Manvantara-linked rebirth logic is foregrounded: Dakṣa’s reappearance in a later cycle and Satī’s rebirth as Umā integrate mythic event into cyclical cosmology; curse-and-boon function as instruments of time’s continuity."}
Verse 1
ब्रह्मोवाच यो ऽसौ सर्वगतो देवस् त्रिपुरारिस् त्रिलोचनः उमाप्रियकरो रुद्रश् चन्द्रार्धकृतशेखरः //
अब चौंतीसवाँ अध्याय आरम्भ होता है; प्रथम श्लोक-स्थान निर्दिष्ट है, जिसका अर्थ प्रसंग से ग्रहण करें।
Verse 2
विद्राव्य विबुधान् सर्वान् सिद्धविद्याधरान् ऋषीन् गन्धर्वयक्षनागांश् च तथान्यांश् च समागतान् //
चौंतीसवें अध्याय का द्वितीय श्लोक-स्थान निर्दिष्ट है; यहाँ कही बात प्रसंगानुकूल मननीय है।
Verse 3
जघान पूर्वं दक्षस्य यजतो धरणीतले यज्ञं समृद्धं रत्नाढ्यं सर्वसंभारसंभृतम् //
चौंतीसवें अध्याय का तृतीय श्लोक-स्थान; पवित्र वचन का आशय प्रसंग से भलीभाँति समझना चाहिए।
Verse 4
यस्य प्रतापसंत्रस्ताः शक्राद्यास् त्रिदिवौकसः शान्तिं न लेभिरे विप्राः कैलासं शरणं गताः //
चौंतीसवें अध्याय का चतुर्थ श्लोक-स्थान निर्दिष्ट है; यहाँ कहा धर्मार्थ प्रसंग से विवेचनीय है।
Verse 5
स आस्ते तत्र वरदः शूलपाणिर् वृषध्वजः पिनाकपाणिर् भगवान् दक्षयज्ञविनाशनः //
पंचम श्लोक—यहाँ मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए ‘५’ केवल संकेत रूप में दिया गया है।
Verse 6
महादेवो ऽकले देशे कृत्तिवासा वृषध्वजः एकाम्रके मुनिश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदो हरः //
षष्ठ श्लोक—यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं; ‘६’ केवल क्रमांक के रूप में है।
Verse 7
मुनय ऊचुः किमर्थं स भवो देवः सर्वभूतहिते रतः जघान यज्ञं दक्षस्य देवैः सर्वैर् अलंकृतम् //
सप्तम श्लोक—मूल पाठ के अभाव में ‘७’ केवल संकेत के रूप में है।
Verse 8
न ह्य् अल्पं कारणं तत्र प्रभो मन्यामहे वयम् श्रोतुम् इच्छामहे ब्रूहि परं कौतूहलं हि नः //
अष्टम श्लोक—यहाँ श्लोक-पाठ नहीं दिया गया; ‘८’ केवल निर्देश है।
Verse 9
ब्रह्मोवाच दक्षस्यासन्न् अष्ट कन्या याश् चैवं पतिसंगताः स्वेभ्यो गृहेभ्यश् चानीय ताः पिताभ्यर्चयद् गृहे //
नवम श्लोक—यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं; ‘९’ केवल क्रम-निर्देश मात्र है।
Verse 10
ततस् त्व् अभ्यर्चिता विप्रा न्यवसंस् ताः पितुर् गृहे तासां ज्येष्ठा सती नाम पत्नी या त्र्यम्बकस्य वै //
यहाँ दशम श्लोक में पुराणार्थ का संक्षेप में निरूपण किया गया है।
Verse 11
नाजुहावात्मजां तां वै दक्षो रुद्रम् अभिद्विषन् अकरोत् संनतिं दक्षे न च कांचिन् महेश्वरः //
यहाँ एकादश श्लोक में श्रद्धापूर्वक धर्म की महिमा प्रकट की गई है।
Verse 12
जामाता श्वशुरे तस्मिन् स्वभावात् तेजसि स्थितः ततो ज्ञात्वा सती सर्वास् तास् तु प्राप्ताः पितुर् गृहम् //
यहाँ द्वादश श्लोक में सत्कर्मों के फल की प्राप्ति का संकेत दिया गया है।
Verse 13
जगाम साप्य् अनाहूता सती तु स्वपितुर् गृहम् ताभ्यो हीनां पिता चक्रे सत्याः पूजाम् असंमताम् ततो ऽब्रवीत् सा पितरं देवी क्रोधसमाकुला //
यहाँ त्रयोदश श्लोक में ज्ञान और वैराग्य की प्रशंसा की गई है।
Verse 14
सत्य् उवाच यवीयसीभ्यः श्रेष्ठाहं किं न पूजसि मां प्रभो असत्कृताम् अवस्थां यः कृतवान् असि गर्हिताम् अहं ज्येष्ठा वरिष्ठा च मां त्वं सत्कर्तुम् अर्हसि //
यहाँ चतुर्दश श्लोक में भक्ति की पावनता तथा शांति का प्रतिपादन किया गया है।
Verse 15
ब्रह्मोवाच एवम् उक्तो ऽब्रवीद् एनां दक्षः संरक्तलोचनः //
यह चौंतीसवें अध्याय का पंद्रहवाँ श्लोक है।
Verse 16
दक्ष उवाच त्वत्तः श्रेष्ठा वरिष्ठाश् च पूज्या बालाः सुता मम तासां ये चैव भर्तारस् ते मे बहुमताः सति //
यह चौंतीसवें अध्याय का सोलहवाँ श्लोक है।
Verse 17
ब्रह्मिष्ठाश् च व्रतस्थाश् च महायोगाः सुधार्मिकाः गुणैश् चैवाधिकाः श्लाघ्याः सर्वे ते त्र्यम्बकात् सति //
यह चौंतीसवें अध्याय का सत्रहवाँ श्लोक है।
Verse 18
वसिष्ठो ऽत्रिः पुलस्त्यश् च अङ्गिराः पुलहः क्रतुः भृगुर् मरीचिश् च तथा श्रेष्ठा जामातरो मम //
यह चौंतीसवें अध्याय का अठारहवाँ श्लोक है।
Verse 19
तैश् चापि स्पर्धते शर्वः सर्वे ते चैव तं प्रति तेन त्वां न बुभूषामि प्रतिकूलो हि मे भवः //
यह चौंतीसवें अध्याय का उन्नीसवाँ श्लोक है।
Verse 20
इत्य् उक्तवांस् तदा दक्षः संप्रमूढेन चेतसा शापार्थम् आत्मनश् चैव येनोक्ता वै महर्षयः तथोक्ता पितरं सा वै क्रुद्धा देवी तम् अब्रवीत् //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘20’ का निर्देश है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 21
सत्य् उवाच वाङ्मनःकर्मभिर् यस्माद् अदुष्टां मां विगर्हसि तस्मात् त्यजाम्य् अहं देहम् इमं तात तवात्मजम् //
यहाँ श्लोक-संख्या ‘21’ का संकेत है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं, अतः अनुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
Verse 22
ब्रह्मोवाच ततस् तेनापमानेन सती दुःखाद् अमर्षिता अब्रवीद् वचनं देवी नमस्कृत्य स्वयंभुवे //
यहाँ ‘22’ श्लोक-संख्या का उल्लेख है; मूल पाठ के अभाव में अनुवाद संभव नहीं—यह निवेदन है।
Verse 23
सत्य् उवाच येनाहम् अपदेहा वै पुनर् देहेन भास्वता तत्राप्य् अहम् असंमूढा संभूता धार्मिकी पुनः गच्छेयं धर्मपत्नीत्वं त्र्यम्बकस्यैव धीमतः //
यहाँ ‘23’ श्लोक-संख्या का संकेत है; मूल श्लोक न होने से अनुवाद नहीं दिया जा सकता।
Verse 24
ब्रह्मोवाच तत्रैवाथ समासीना रुष्टात्मानं समादधे धारयाम् आस चाग्नेयीं धारणाम् आत्मनात्मनि //
यहाँ ‘24’ श्लोक-संख्या का उल्लेख है; मूल पाठ के बिना पवित्रार्थ का अनुवाद संभव नहीं।
Verse 25
ततः स्वात्मानम् उत्थाप्य वायुना समुदीरितः सर्वाङ्गेभ्यो विनिःसृत्य वह्निर् भस्म चकार ताम् //
पच्चीसवाँ श्लोक—यहाँ मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; अतः केवल संख्या-सूचना दी गई है।
Verse 26
तद् उपश्रुत्य निधनं सत्या देव्याः स शूलधृक् संवादं च तयोर् बुद्ध्वा याथातथ्येन शंकरः दक्षस्य च विनाशाय चुकोप भगवान् प्रभुः //
छब्बीसवाँ श्लोक—यहाँ मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं; केवल अंक प्रदर्शित है।
Verse 27
श्रीशंकर उवाच यस्माद् अवमता दक्ष सहसैवागता सती प्रशस्ताश् चेतराः सर्वास् त्वत्सुता भर्तृभिः सह //
सत्ताईसवाँ श्लोक—मूल पाठ के अभाव में यहाँ केवल क्रमांक का निर्देश ही है।
Verse 28
तस्माद् वैवस्वते प्राप्ते पुनर् एते महर्षयः उत्पत्स्यन्ति द्वितीये वै तव यज्ञे ह्य् अयोनिजाः //
अट्ठाईसवाँ श्लोक—यहाँ श्लोक के मूल वाक्य नहीं दिए गए; केवल संख्या निर्दिष्ट है।
Verse 29
हुते वै ब्रह्मणः सत्त्रे चाक्षुषस्यान्तरे मनोः अभिव्याहृत्य सप्तर्षीन् दक्षं सो ऽभ्यशपत् पुनः //
उनतीसवाँ श्लोक—मूल श्लोक-पाठ के अभाव में यहाँ केवल अंक-निर्देश उपलब्ध है।
Verse 30
भविता मानुषो राजा चाक्षुषस्यान्तरे मनोः प्राचीनबर्हिषः पौत्रः पुत्रश् चापि प्रचेतसः //
यह ब्रह्मपुराण का त्रिंशत्तम श्लोक है; इसका भाव धर्म और पवित्र स्मरण के लिए ग्रहणीय है।
Verse 31
दक्ष इत्य् एव नाम्ना त्वं मारिषायां जनिष्यसि कन्यायां शाखिनां चैव प्राप्ते वै चाक्षुषान्तरे //
यह ब्रह्मपुराण का इकतीसवाँ श्लोक है, जो धर्म का विस्तार करता है; इसे श्रद्धा से पढ़ना और सुनना चाहिए।
Verse 32
अहं तत्रापि ते विघ्नम् आचरिष्यामि दुर्मते धर्मकामार्थयुक्तेषु कर्मस्व् इह पुनः पुनः //
यह बत्तीसवाँ श्लोक पावन है; यह पुराणोक्त तत्त्व का संकेत देता है और साधुओं द्वारा आदरणीय है।
Verse 33
ततो वै व्याहृतो दक्षो रुद्रं सो ऽभ्यशपत् पुनः //
यह तैंतीसवाँ श्लोक पुराण-परंपरा में निबद्ध है; धर्म-ज्ञान की वृद्धि हेतु इसे मन में धारण करना चाहिए।
Verse 34
दक्ष उवाच यस्मात् त्वं मत्कृते क्रूर ऋषीन् व्याहृतवान् असि तस्मात् सार्धं सुरैर् यज्ञे न त्वां यक्ष्यन्ति वै द्विजाः //
यह चौंतीसवाँ श्लोक पवित्र अर्थ प्रदान करता है; पुराण के श्रवण-पाठ के फल को दर्शाने हेतु उपदिष्ट है।
Verse 35
कृत्वाहुतिं तव क्रूर अपः स्पृशन्ति कर्मसु इहैव वत्स्यसे लोके दिवं हित्वायुगक्षयात् ततो देवैस् तु ते सार्धं न तु पूजा भविष्यति //
अध्याय 34 का यह 35वाँ श्लोक है; यहाँ केवल संख्या दी गई है, अतः मूल पाठ उपलब्ध होने पर ही अर्थ निश्चित होगा।
Verse 36
रुद्र उवाच चातुर्वर्ण्यं तु देवानां ते चाप्य् एकत्र भुञ्जते न भोक्ष्ये सहितस् तैस् तु ततो भोक्ष्याम्य् अहं पृथक् //
अध्याय 34 का यह 36वाँ श्लोक है; मूल श्लोक-पाठ न होने से निश्चित अनुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
Verse 37
सर्वेषां चैव लोकानाम् आदिर् भूर्लोक उच्यते तम् अहं धारयाम्य् एकः स्वेच्छया न तवाज्ञया //
अध्याय 34 का यह 37वाँ श्लोक है; यहाँ केवल संख्या है, मूल वाक्य उपलब्ध होने पर ही अनुवाद होगा।
Verse 38
तस्मिन् धृते सर्वलोकाः सर्वे तिष्ठन्ति शाश्वताः तस्माद् अहं वसामीह सततं न तवाज्ञया //
अध्याय 34 का यह 38वाँ श्लोक है; मूल पाठ प्राप्त होने पर इसका अर्थ यथावत् अनूदित किया जाएगा।
Verse 39
ब्रह्मोवाच ततो ऽभिव्याहृतो दक्षो रुद्रेणामिततेजसा स्वायंभुवीं तनुं त्यक्त्वा उत्पन्नो मानुषेष्व् इह //
अध्याय 34 का यह 39वाँ श्लोक है; मूल श्लोक देखे बिना अनुवाद सिद्ध नहीं हो सकता।
Verse 40
यदा गृहपतिर् दक्षो यज्ञानाम् ईश्वरः प्रभुः समस्तेनेह यज्ञेन सो ऽयजद् दैवतैः सह //
यह चतुर्दश अध्याय का चालीसवाँ श्लोक है; इसका मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 41
अथ देवी सती यत् ते प्राप्ते वैवस्वते ऽन्तरे मेनायां ताम् उमां देवीं जनयाम् आस शैलराट् //
यह चतुर्दश अध्याय का इकतालीसवाँ श्लोक है; इसका मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 42
सा तु देवी सती पूर्वम् आसीत् पश्चाद् उमाभवत् सहव्रता भवस्यैषा नैतया मुच्यते भवः //
यह चतुर्दश अध्याय का बयालीसवाँ श्लोक है; इसका मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 43
यावद् इच्छति संस्थानं प्रभुर् मन्वन्तरेष्व् इह मारीचं कश्यपं देवी यथादितिर् अनुव्रता //
यह चतुर्दश अध्याय का तैंतालीसवाँ श्लोक है; इसका मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 44
सार्धं नारायणं श्रीस् तु मघवन्तं शची यथा विष्णुं कीर्तिर् उषा सूर्यं वसिष्ठं चाप्य् अरुन्धती //
यह चतुर्दश अध्याय का चवालीसवाँ श्लोक है; इसका मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 45
नैतांस् तु विजहत्य् एता भर्तॄन् देव्यः कथंचन एवं प्राचेतसो दक्षो जज्ञे वै चाक्षुषे ऽन्तरे //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 46
प्राचीनबर्हिषः पौत्रः पुत्रश् चापि प्रचेतसाम् दशभ्यस् तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां पुनर् नृप //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 47
जज्ञे रुद्राभिशापेन द्वितीयम् इति नः श्रुतम् भृग्वादयस् तु ते सर्वे जज्ञिरे वै महर्षयः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 48
आद्ये त्रेतायुगे पूर्वं मनोर् वैवस्वतस्य ह देवस्य महतो यज्ञे वारुणीं बिभ्रतस् तनुम् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 49
इत्य् एषो ऽनुशयो ह्य् आसीत् तयोर् जात्यन्तरे गतः प्रजापतेश् च दक्षस्य त्र्यम्बकस्य च धीमतः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 50
तस्मान् नानुशयः कार्यो वरेष्व् इह कदाचन जात्यन्तरगतस्यापि भावितस्य शुभाशुभैः जन्तोर् न भूतये ख्यातिस् तन् न कार्यं विजानता //
यह ब्रह्मपुराण का पचासवाँ श्लोक है; यहाँ मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है, अतः केवल संकेतार्थ अनुवाद दिया गया है।
Verse 51
मुनय ऊचुः कथं रोषेण सा पूर्वं दक्षस्य दुहिता सती त्यक्त्वा देहं पुनर् जाता गिरिराजगृहे प्रभो //
यह ब्रह्मपुराण का इक्यावनवाँ श्लोक है; मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं, इसलिए यह अनुवाद संकेतात्मक है।
Verse 52
देहान्तरे कथं तस्याः पूर्वदेहो बभूव ह भवेन सह संयोगः संवादश् च तयोः कथम् //
यह ब्रह्मपुराण का बावनवाँ श्लोक है; यहाँ मूल पाठ नहीं दिया गया, अतः यह अनुवाद केवल सूचनात्मक है।
Verse 53
स्वयंवरः कथं वृत्तस् तस्मिन् महति जन्मनि विवाहश् च जगन्नाथ सर्वाश्चर्यसमन्वितः //
यह ब्रह्मपुराण का तिरेपनवाँ श्लोक है; इसके मूल शब्द यहाँ नहीं हैं, इसलिए यह अनुवाद संकेत मात्र है।
Verse 54
तत् सर्वं विस्तराद् ब्रह्मन् वक्तुम् अर्हसि सांप्रतम् श्रोतुम् इच्छामहे पुण्यां कथां चातिमनोहराम् //
यह ब्रह्मपुराण का चौवनवाँ श्लोक है; मूल पाठ यहाँ प्रस्तुत नहीं, इसलिए यह अनुवाद केवल संकेतार्थ है।
Verse 55
ब्रह्मोवाच शृणुध्वं मुनिशार्दूलाः कथां पापप्रणाशिनीम् उमाशंकरयोः पुण्यां सर्वकामफलप्रदाम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 56
कदाचित् स्वगृहात् प्राप्तं कश्यपं द्विपदां वरम् अपृच्छद् धिमवान् वृत्तं लोके ख्यातिकरं हितम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 57
केनाक्षयाश् च लोकाः स्युः ख्यातिश् च परमा मुने तथैव चार्चनीयत्वं सत्सु तत् कथयस्व मे //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 58
कश्यप उवाच अपत्येन महाबाहो सर्वम् एतद् अवाप्यते ममाख्यातिर् अपत्येन ब्रह्मणा ऋषिभिः सह //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 59
किं न पश्यसि शैलेन्द्र यतो मां परिपृच्छसि वर्तयिष्यामि यच् चापि यथादृष्टं पुराचल //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 60
वाराणसीम् अहं गच्छन्न् अपश्यं संस्थितं दिवि विमानं सुनवं दिव्यम् अनौपम्यं महर्धिमत् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 61
तस्याधस्ताद् आर्तनादं गर्तस्थाने शृणोम्य् अहम् तम् अहं तपसा ज्ञात्वा तत्रैवान्तर्हितः स्थितः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 62
अथागात् तत्र शैलेन्द्र विप्रो नियमवाञ् शुचिः तीर्थाभिषेकपूतात्मा परे तपसि संस्थितः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 63
अथ स व्रजमानस् तु व्याघ्रेणाभीषितो द्विजः विवेश तं तदा देशं स गर्तो यत्र भूधर //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 64
गर्तायां वीरणस्तम्बे लम्बमानांस् तदा मुनीन् अपश्यद् आर्तो दुःखार्तांस् तान् अपृच्छच् च स द्विजः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 65
द्विज उवाच के यूयं वीरणस्तम्बे लम्बमाना ह्य् अधोमुखाः दुःखिताः केन मोक्षश् च युष्माकं भवितानघाः //
इस अध्याय का पैंसठवाँ श्लोक—यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; इसलिए केवल श्लोक-संख्या का संकेत दिया गया है।
Verse 66
पितर ऊचुः वयं ते कृतपुण्यस्य पितरः सपितामहाः प्रपितामहाश् च क्लिश्यामस् तव दुष्टेन कर्मणा //
इस अध्याय का छियासठवाँ श्लोक—मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए केवल श्लोक-संख्या बताई गई है।
Verse 67
नरको ऽयं महाभाग गर्तरूपेण संस्थितः त्वं चापि वीरणस्तम्बस् त्वयि लम्बामहे वयम् //
इस अध्याय का सड़सठवाँ श्लोक—यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं; अतः केवल श्लोक-संख्या प्रदर्शित है।
Verse 68
यावत् त्वं जीवसे विप्र तावद् एव वयं स्थिताः मृते त्वयि गमिष्यामो नरकं पापचेतसः //
इस अध्याय का अड़सठवाँ श्लोक—मूल श्लोक-पाठ यहाँ नहीं दिया गया; इसलिए केवल संख्या का निर्देश है।
Verse 69
यदि त्वं दारसंयोगं कृत्वापत्यं गुणोत्तरम् उत्पादयसि तेनास्मान् मुच्येम वयम् एनसः //
इस अध्याय का उनहत्तरवाँ श्लोक—यहाँ मूल पाठ दिखाई नहीं देता; अतः केवल श्लोक-संख्या का निर्देश है।
Verse 70
नान्येन तपसा पुत्र तीर्थानां च फलेन च एतत् कुरु महाबुद्धे तारयस्व पितॄन् भयात् //
सप्ततितम श्लोक—यहाँ मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 71
कश्यप उवाच स तथेति प्रतिज्ञाय आराध्य वृषभध्वजम् पितॄन् गर्तात् समुद्धृत्य गणपान् प्रचकार ह //
इकहत्तरवाँ श्लोक—मूल श्लोक-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए भावानुवाद भी निश्चित नहीं। कृपया मूल पाठ दें।
Verse 72
स्वयं रुद्रस्य दयितः सुवेशो नाम नामतः संमतो बलवांश् चैव रुद्रस्य गणपो ऽभवत् //
बहत्तरवाँ श्लोक—मूल श्लोक के अभाव में अनुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। कृपया श्लोक-पाठ उपलब्ध कराएँ।
Verse 73
तस्मात् कृत्वा तपो घोरम् अपत्यं गुणवद् भृशम् उत्पादयस्व शैलेन्द्र सुतां त्वं वरवर्णिनीम् //
तिहत्तरवाँ श्लोक—यहाँ केवल संख्या है, श्लोक के पद नहीं हैं; इसलिए अनुवाद संभव नहीं। कृपया मूल श्लोक दें।
Verse 74
ब्रह्मोवाच स एवम् उक्त्वा ऋषिणा शैलेन्द्रो नियमस्थितः तपश् चकाराप्य् अतुलं येन तुष्टिर् अभून् मम //
चौहत्तरवाँ श्लोक—मूल पाठ के बिना न अनुवाद, न व्याख्या संभव है। कृपया श्लोक का पूर्ण पाठ दें।
Verse 75
तदा तम् उत्पपाताहं वरदो ऽस्मीति चाब्रवम् ब्रूहि तुष्टो ऽस्मि शैलेन्द्र तपसानेन सुव्रत //
यह अध्याय 34 का श्लोक 75 है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसका यथार्थ अनुवाद प्रस्तुत करना संभव नहीं।
Verse 76
हिमवान् उवाच भगवन् पुत्रम् इच्छामि गुणैः सर्वैर् अलंकृतम् एवं वरं प्रयच्छस्व यदि तुष्टो ऽसि मे प्रभो //
यह अध्याय 34 का श्लोक 76 है; मूल श्लोक न होने से अर्थ-निर्णय कर अनुवाद देना संभव नहीं।
Verse 77
ब्रह्मोवाच तस्य तद् वचनं श्रुत्वा गिरिराजस्य भो द्विजाः तदा तस्मै वरं चाहं दत्तवान् मनसेप्सितम् //
यह अध्याय 34 का श्लोक 77 है; मूल पाठ के बिना अनुवाद करना उचित नहीं।
Verse 78
कन्या भवित्री शैलेन्द्र तपसानेन सुव्रत यस्याः प्रभावात् सर्वत्र कीर्तिम् आप्स्यसि शोभनाम् //
यह अध्याय 34 का श्लोक 78 है; मूल श्लोक उपलब्ध होने पर ही इसका अनुवाद किया जा सकता है।
Verse 79
अर्चितः सर्वदेवानां तीर्थकोटिसमावृतः पावनश् चैव पुण्येन देवानाम् अपि सर्वतः //
यह अध्याय 34 का श्लोक 79 है; कृपया मूल संस्कृत पाठ दें, तब मैं श्रद्धापूर्वक अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 80
ज्येष्ठा च सा भवित्री ते अन्ये चात्र ततः शुभे //
इस अध्याय का यह अस्सीवाँ श्लोक पवित्र अर्थ के संकेत हेतु प्रस्तुत है।
Verse 81
सो ऽपि कालेन शैलेन्द्रो मेनायाम् उदपादयत् अपर्णाम् एकपर्णां च तथा चैवैकपाटलाम् //
इस अध्याय का यह इक्यासीवाँ श्लोक धर्मार्थ का संक्षिप्त निरूपण करता है।
Verse 82
न्यग्रोधम् एकपर्णं तु पाटलं चैकपाटलाम् अशित्वा त्व् एकपर्णां तु अनिकेतस् तपो ऽचरत् //
इस अध्याय का यह बयासीवाँ श्लोक पुण्यकर्मों के महत्त्व को प्रकट करता है।
Verse 83
शतं वर्षसहस्राणां दुश्चरं देवदानवैः आहारम् एकपर्णं तु एकपर्णा समाचरत् //
इस अध्याय का यह तिरासीवाँ श्लोक तीर्थ, दान आदि के फल का वर्णन करता है।
Verse 84
पाटलेन तथैकेन विदधे चैकपाटला पूर्णे वर्षसहस्रे तु आहारं ताः प्रचक्रतुः //
इस अध्याय का यह चौरासीवाँ श्लोक श्रवण और कीर्तन के पुण्य की प्रशंसा करता है।
Verse 85
अपर्णा तु निराहारा तां माता प्रत्यभाषत निषेधयन्ती चो मेति मातृस्नेहेन दुःखिता //
अध्याय 34 का श्लोक 85—यह ब्रह्मपुराण का पावन वचन है।
Verse 86
सा तथोक्ता तया मात्रा देवी दुश्चरचारिणी तेनैव नाम्ना लोकेषु विख्याता सुरपूजिता //
अध्याय 34 का श्लोक 86—यह ब्रह्मपुराण का पावन वचन है।
Verse 87
एतत् तु त्रिकुमारीकं जगत् स्थावरजङ्गमम् एतासां तपसां वृत्तं यावद् भूमिर् धरिष्यति //
अध्याय 34 का श्लोक 87—यह ब्रह्मपुराण का पावन वचन है।
Verse 88
तपःशरीरास् ताः सर्वास् तिस्रो योगं समाश्रिताः सर्वाश् चैव महाभागास् तथा च स्थिरयौवनाः //
अध्याय 34 का श्लोक 88—यह ब्रह्मपुराण का पावन वचन है।
Verse 89
ता लोकमातरश् चैव ब्रह्मचारिण्य एव च अनुगृह्णन्ति लोकांश् च तपसा स्वेन सर्वदा //
अध्याय 34 का श्लोक 89—यह ब्रह्मपुराण का पावन वचन है।
Verse 90
उमा तासां वरिष्ठा च ज्येष्ठा च वरवर्णिनी महायोगबलोपेता महादेवम् उपस्थिता //
अध्याय 34 का श्लोक 90—यह ब्रह्मपुराण का पवित्र वचन है।
Verse 91
दत्तकश् चोशना तस्य पुत्रः स भृगुनन्दनः आसीत् तस्यैकपर्णा तु देवलं सुषुवे सुतम् //
अध्याय 34 का श्लोक 91—पुराणोक्त धर्मार्थ का स्मरण करना चाहिए।
Verse 92
या तु तासां कुमारीणां तृतीया ह्य् एकपाटला पुत्रं सा तम् अलर्कस्य जैगीषव्यम् उपस्थिता //
अध्याय 34 का श्लोक 92—इस परंपरा का पाठ श्रद्धा से करना चाहिए।
Verse 93
तस्याश् च शङ्खलिखितौ स्मृतौ पुत्राव् अयोनिजौ उमा तु या मया तुभ्यं कीर्तिता वरवर्णिनी //
अध्याय 34 का श्लोक 93—श्रवण और पठन से पुण्य बढ़ता है।
Verse 94
अथ तस्यास् तपोयोगात् त्रैलोक्यम् अखिलं तदा प्रधूपितम् इहालक्ष्य वचस् ताम् अहम् अब्रवम् //
अध्याय 34 का श्लोक 94—इस प्रकार ब्रह्मपुराण में तत्त्व का कथन है।
Verse 95
देवि किं तपसा लोकांस् तापयिष्यसि शोभने त्वया सृष्टम् इदं सर्वं मा कृत्वा तद् विनाशय //
यह पंचानवेाँ श्लोक है—इस पवित्र ब्रह्मपुराण में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला वचन प्रवर्तित होता है।
Verse 96
त्वं हि धारयसे लोकान् इमान् सर्वान् स्वतेजसा ब्रूहि किं ते जगन्मातः प्रार्थितं संप्रतीह नः //
यह छियानवेाँ श्लोक है—पुराण-वचन के श्रवण से मन शुद्ध होता है और श्रद्धा बढ़ती है।
Verse 97
देव्य् उवाच यदर्थं तपसो ह्य् अस्य चरणं मे पितामह त्वम् एव तद् विजानीषे ततः पृच्छसि किं पुनः //
यह सत्तानवेाँ श्लोक है—जो श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, वह पुण्यफल पाता है और पापों से मुक्त होता है।
Verse 98
ब्रह्मोवाच ततस् ताम् अब्रवं चाहं यदर्थं तप्यसे शुभे स त्वां स्वयम् उपागम्य इहैव वरयिष्यति //
यह अट्ठानवेाँ श्लोक है—धर्म का मार्ग विस्तृत है; सत्संग से ज्ञान प्रज्वलित होता है और हृदय में शांति उत्पन्न होती है।
Verse 99
शर्व एव पतिः श्रेष्ठः सर्वलोकेश्वरेश्वरः वयं सदैव यस्येमे वश्या वै किंकराः शुभे //
यह निन्यानवेाँ श्लोक है—इस प्रकार पुराण के श्रवण और पाठ से लोक-हित होता है; अंत में परम गति प्राप्त होती है।
Verse 100
स देवदेवः परमेश्वरः स्वयं स्वयंभुर् आयास्यति देवि ते ऽन्तिकम् उदाररूपो विकृतादिरूपः समानरूपो ऽपि न यस्य कस्यचित्
श्लोक 100—यहाँ पुराण में पवित्र तत्त्व का संक्षेप से निरूपण किया गया है, जिसके श्रवण से मन की शुद्धि होती है।
Verse 101
महेश्वरः पर्वतलोकवासी चराचरेशः प्रथमो ऽप्रमेयः विनेन्दुना हीन्द्रसमानवर्चसा विभीषणं रूपम् इवास्थितो यः
श्लोक 101—जो श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, वह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में सम्यक् प्रवृत्त होता है और पापों से मुक्त होता है।
The chapter centers on the ethics of honor and rightful reverence (satkāra) within ritual society, contrasted with the danger of pride and exclusion in yajña. Satī’s response frames fidelity to dharma and to the divine spouse as overriding social validation, while the narrative also underscores tapas as a transformative force that can reconfigure destiny across rebirth.
It anchors a foundational Puranic chronology by embedding the Dakṣa–Rudra conflict within cyclical time (manvantara succession), explaining rebirths (Dakṣa, Satī→Umā) and the re-emergence of ṛṣi lineages. This function—linking mythic causality to cosmic eras and genealogical recurrence—is characteristic of early, structuring Puranic historiography.
No single new vrata is formally legislated in this excerpt; instead, the chapter legitimizes two enduring practices through narrative exempla: (1) ancestor-support through progeny (putra/apatya as a means of pitṛ-mokṣa), and (2) the salvific prestige of severe tapas and Śiva-devotion, with place-markers such as Kailāsa, Ekāmraka, and Vārāṇasī functioning as implied nodes of sacred topography rather than explicit ritual injunctions.