वणिक्पथं द्विजक्षत्रवैश्यशूद्रांस् तथैव च दानं च विविधाकारं दीनान्धकृपणादिषु //
यहाँ श्लोक 24 निर्दिष्ट है; इसकी व्याख्या शास्त्रीय परंपरा में पूर्वापर संबंध से करनी चाहिए।