Adhyaya 32
Dashama SkandhaAdhyaya 3222 Verses

Adhyaya 32

Gopī-gīta Aftermath: Kṛṣṇa Returns and Explains Divine Non-Reciprocation (Rāsa-līlā Dialogue)

गोपियों के विरह-गीत के बाद श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए प्रकट हुए और उनके प्राण लौटा कर विरह-व्यथा हर ली। गोपियाँ किसी ने सेवा से, किसी ने आलिंगन से, किसी ने मान-रोष से, और किसी ने योग-समाधि-सी अंतर्मुखता से—अपने-अपने भाव प्रकट किए, पर भक्ति एकनिष्ठ रही। कृष्ण उन्हें चाँदनी में कालिन्दी-तट पर ले गए; सुगंधित पवन, कोमल रेत और शरद्-चन्द्रमा रस को बढ़ाते हैं। वे शक्तियों से घिरे परमात्मा की भाँति बीच में बैठे और पूजित हुए, फिर भी आहत गोपियों ने प्रेम-प्रतिदान का धर्म पूछा—कौन प्रत्युपकार करता है, कौन निष्काम प्रेम करता है, और कौन किसी से प्रेम नहीं करता। कृष्ण ने स्वार्थी मित्रता, स्वाभाविक करुणा, तथा आत्मतुष्ट/ईर्ष्यालु अप्रतिदान का भेद बताया और कहा कि उनका विलम्ब भक्ति को तीव्र करने हेतु था। अंत में उन्होंने गोपियों की निष्कलंक सेवा का ऋण न चुका सकने की बात कहकर आगे की रास-लीला में प्रेम को परम धर्म के रूप में स्थापित किया।

Shlokas

Verse 1

श्रीशुक उवाच इति गोप्य: प्रगायन्त्य: प्रलपन्त्यश्च चित्रधा । रुरुदु: सुस्वरं राजन् कृष्णदर्शनलालसा: ॥ १ ॥

श्रीशुकदेव बोले: हे राजन्, गोपियाँ अनेक मनोहर ढंग से गाकर और मन की बातें कहकर, श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा से ऊँचे स्वर में रो पड़ीं।

Verse 2

तासामाविरभूच्छौरि: स्मयमानमुखाम्बुज: । पीताम्बरधर: स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथ: ॥ २ ॥

तभी शौरि श्रीकृष्ण, मुस्कराते कमल-मुख सहित, गले में माला और पीताम्बर धारण किए, गोपियों के सामने प्रकट हुए—मानो कामदेव को भी मोहित करने वाले साक्षात्।

Verse 3

तं विलोक्यागतं प्रेष्ठं प्रीत्युत्फुल्लद‍ृशोऽबला: । उत्तस्थुर्युगपत् सर्वास्तन्व: प्राणमिवागतम् ॥ ३ ॥

अपने परमप्रिय कृष्ण को लौट आया देखकर, प्रेम से खिले नेत्रों वाली वे सब गोपियाँ एक साथ उठ खड़ी हुईं; मानो उनके शरीर में प्राण फिर से आ गए हों।

Verse 4

काचित् कराम्बुजं शौरेर्जगृहेऽञ्जलिना मुदा । काचिद् दधार तद्बाहुमंसे चन्दनभूषितम् ॥ ४ ॥

एक गोपी ने आनंद से शौरि के कर-कमल को अपनी जुड़ी हुई हथेलियों में ले लिया, और दूसरी ने चन्दन से सुशोभित उनका भुजदण्ड अपने कंधे पर रख लिया।

Verse 5

काचिदञ्जलिनागृह्णात्तन्वी ताम्बूलचर्वितम् । एका तदङ्‍‍‍‍‍घ्रिकमलं सन्तप्ता स्तनयोरधात् ॥ ५ ॥

एक दुबली गोपी ने श्रद्धापूर्वक अंजलि में उनका चबाया हुआ ताम्बूल लिया, और एक अन्य गोपी, काम-ताप से व्याकुल, उनके चरण-कमल अपने स्तनों पर रख बैठी।

Verse 6

एका भ्रुकुटिमाबध्य प्रेमसंरम्भविह्वला । घ्नन्तीवैक्षत् कटाक्षेपै: सन्दष्टदशनच्छदा ॥ ६ ॥

एक गोपी प्रेमजनित रोष से व्याकुल होकर भौंहें चढ़ाए, होंठ दाँतों से दबाए, कठोर कटाक्षों से मानो उन्हें घायल करने लगी।

Verse 7

अपरानिमिषद्‌दृग्भ्यां जुषाणा तन्मुखाम्बुजम् । आपीतमपि नातृप्यत् सन्तस्तच्चरणं यथा ॥ ७ ॥

दूसरी गोपी अनिमेष नेत्रों से उनके मुख-कमल का रसास्वादन करती रही; पी लेने पर भी तृप्त न हुई, जैसे संत प्रभु के चरणों का ध्यान कर कभी तृप्त नहीं होते।

Verse 8

तं काचिन्नेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्वा निमील्य च । पुलकाङ्‌‌ग्युपगुह्यास्ते योगीवानन्द सम्प्लुता ॥ ८ ॥

एक गोपी ने नेत्रों के द्वार से प्रभु को भीतर ले जाकर हृदय में स्थापित किया; फिर आँखें मूँदकर, रोमांचित देह से, भीतर ही भीतर उन्हें निरंतर आलिंगन करती रही—आनन्द में निमग्न योगिनी-सी।

Verse 9

सर्वास्ता: केशवालोकपरमोत्सवनिर्वृता: । जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जना: ॥ ९ ॥

केशव को फिर देखकर सभी गोपियाँ परम उत्सव में मग्न हो गईं। विरह का ताप त्याग दिया, जैसे लोग किसी प्राज्ञ-संत का संग पाकर अपना दुःख भूल जाते हैं।

Verse 10

ताभिर्विधूतशोकाभिर्भगवानच्युतो वृत: । व्यरोचताधिकं तात पुरुष: शक्तिभिर्यथा ॥ १० ॥

शोक से मुक्त गोपियों से घिरे भगवान अच्युत और भी अधिक शोभित हुए। हे राजन्, कृष्ण ऐसे दीप्तिमान लगे जैसे परमात्मा अपनी दिव्य शक्तियों से परिवृत हो।

Verse 11

ता: समादाय कालिन्द्या निर्विश्य पुलिनं विभु: । विकसत्कुन्दमन्दारसुरभ्यनिलषट्पदम् ॥ ११ ॥ शरच्चन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोषातम: शिवम् । कृष्णाया हस्ततरलाचितकोमलवालुकम् ॥ १२ ॥

तब सर्वशक्तिमान श्रीकृष्ण गोपियों को साथ लेकर कालिन्दी (यमुना) के तट पर आए। वहाँ लहरों के हाथों ने किनारे पर कोमल बालू के ढेर बिछा दिए थे; खिले कुन्द और मन्दार की सुगन्ध से भरी पवन ने भौंरों को बुलाया, और शरद्-चन्द्रमा की प्रचुर किरणों ने रात्रि का अन्धकार हरकर उस स्थान को मंगलमय कर दिया।

Verse 12

ता: समादाय कालिन्द्या निर्विश्य पुलिनं विभु: । विकसत्कुन्दमन्दारसुरभ्यनिलषट्पदम् ॥ ११ ॥ शरच्चन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोषातम: शिवम् । कृष्णाया हस्ततरलाचितकोमलवालुकम् ॥ १२ ॥

शरद्-चन्द्रमा की किरणों ने रात्रि का अन्धकार मिटा दिया और वह पुलिन अत्यन्त शुभ हो उठा। कालिन्दी की तरंग-हथेलियों ने वहाँ कोमल बालू बिछा रखी थी; खिले कुन्द और मन्दार की सुगन्ध से भरी हवा भौंरों के झुंड को खींच लाती थी।

Verse 13

तद्दर्शनाह्लादविधूतहृद्रुजो मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययु: । स्वैरुत्तरीयै: कुचकुङ्कुमाङ्कितै- रचीक्लृपन्नासनमात्मबन्धवे ॥ १३ ॥

कृष्ण के दर्शन के आनन्द से उनके हृदय का सारा दुःख मिट गया और वे, मानो साक्षात् श्रुतियाँ हों, अपने मनोरथ की पूर्णता को प्राप्त हुईं। फिर अपने प्रिय सखा श्रीकृष्ण के लिए उन्होंने अपने उत्तरीय बिछाकर आसन बनाया, जो उनके स्तनों के कुंकुम से रँगे हुए थे।

Verse 14

तत्रोपविष्टो भगवान् स ईश्वरो योगेश्वरान्तर्हृदि कल्पितासन: । चकास गोपीपरिषद्गतोऽर्चित- स्त्रैलोक्यलक्ष्म्येकपदं वपुर्दधत् ॥ १४ ॥

वहाँ गोपियों की सभा में भगवान् ईश्वर श्रीकृष्ण विराजमान हुए—जिनके लिए योगेश्वर अपने हृदय में आसन की कल्पना करते हैं। गोपियाँ उनकी आराधना कर रही थीं, और उनका दिव्य शरीर, जो तीनों लोकों की लक्ष्मी का एकमात्र धाम है, अत्यन्त तेजस्वी होकर चमक उठा।

Verse 15

सभाजयित्वा तमनङ्गदीपनं सहासलीलेक्षणविभ्रमभ्रुवा । संस्पर्शनेनाङ्ककृताङ्‍‍‍‍‍घ्रिहस्तयो: संस्तुत्य ईषत्कुपिता बभाषिरे ॥ १५ ॥

अनंग को जगाने वाले श्रीकृष्ण का उन्होंने सत्कार किया—हँसी-खेल की चितवन से, भौंहों के प्रेमिल संकेतों से, और गोद में रखकर उनके हाथ-पाँव दबाकर। परन्तु पूजन करते हुए भी वे कुछ रूठी हुई थीं, इसलिए उन्होंने उनसे इस प्रकार कहा।

Verse 16

श्रीगोप्य ऊचु: भजतोऽनुभजन्त्येक एक एतद्विपर्ययम् । नोभयांश्च भजन्त्येक एतन्नो ब्रूहि साधु भो: ॥ १६ ॥

श्रीगोपियाँ बोलीं—कुछ लोग केवल उनसे ही प्रेम करते हैं जो उनसे प्रेम करते हैं; कुछ उदासीन या वैरी पर भी कृपा करते हैं; और कुछ किसी से भी प्रेम नहीं करते। हे कृष्ण, यह बात हमें ठीक-ठीक समझाइए।

Verse 17

श्रीभगवानुवाच मिथो भजन्ति ये सख्य: स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते । न तत्र सौहृदं धर्म: स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा ॥ १७ ॥

श्रीभगवान बोले—जो लोग परस्पर मित्रता दिखाकर केवल अपने स्वार्थ के लिए प्रेम करते हैं, वे वास्तव में स्वार्थी हैं। वहाँ न सच्चा सौहार्द है, न धर्म। अपना लाभ न हो तो वे प्रत्युत्तर भी नहीं देते।

Verse 18

भजन्त्यभजतो ये वै करुणा: पितरौ यथा । धर्मो निरपवादोऽत्र सौहृदं च सुमध्यमा: ॥ १८ ॥

परन्तु हे सुमध्यमा गोपियो, जो लोग प्रत्युपकार न करने वालों की भी सेवा करते हैं, वे करुणामय होते हैं—जैसे माता-पिता का स्वाभाविक स्नेह। ऐसे जन निष्कलंक धर्म के पथ पर चलते हैं और सच्चे हितैषी होते हैं।

Verse 19

भजतोऽपि न वै केचिद् भजन्त्यभजत: कुत: । आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्रुह: ॥ १९ ॥

और कुछ ऐसे भी हैं जो प्रेम करने वालों से भी प्रेम नहीं करते, फिर जो वैरी हों उनसे क्या करेंगे! वे आत्माराम, आप्तकाम, स्वभाव से कृतघ्न या बड़ों से द्वेष रखने वाले होते हैं।

Verse 20

नाहं तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून् भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये । यथाधनो लब्धधने विनष्टे तच्चिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ॥ २० ॥

हे सखियो, मैं भक्तों की भी आराधना का तुरंत प्रत्युत्तर इसलिए नहीं देता कि उनकी प्रेम-भक्ति और तीव्र हो जाए। वे उस निर्धन के समान हो जाते हैं जिसे धन मिला और फिर खो गया; वह उसी चिंता में डूबकर और कुछ नहीं जान पाता।

Verse 21

एवं मदर्थोज्झितलोकवेद- स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबला: । मयापरोक्षं भजता तिरोहितं मासूयितुं मार्हथ तत् प्रियं प्रिया: ॥ २१ ॥

हे प्रिय गोपियों! तुमने केवल मेरे लिए लोक-लाज, वेद-मत और स्वजनों की मर्यादा भी छोड़ दी। तुम्हारा मुझमें प्रेम बढ़े, इसलिए ही मैं क्षणभर अदृश्य हुआ; फिर भी मेरा स्नेह तुमसे कभी नहीं हटा। अतः हे प्रिये, अपने प्रिय मुझसे कोई दुर्भाव न रखो।

Verse 22

न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि व: । या माभजन् दुर्जरगेहश‍ृङ्खला: संवृश्च्य तद् व: प्रतियातु साधुना ॥ २२ ॥

तुम्हारी निष्कलंक सेवा का ऋण मैं ब्रह्मा की आयु भर भी चुका नहीं सकता। तुमने कठिन गृह-बन्धनों की शृंखला काटकर मेरी भक्ति की है। इसलिए तुम्हारे अपने पवित्र और यशस्वी कर्म ही तुम्हारे लिए प्रतिदान बनें।

Frequently Asked Questions

Kṛṣṇa’s disappearance functions as an intensifier of bhakti: by removing His visible presence, He concentrates the gopīs’ consciousness exclusively upon Him, converting desire into single-pointed prema. His return signifies divine validation of their surrender—He restores their life and reveals that His apparent withdrawal was not neglect but a pedagogical mercy meant to deepen attachment (āsakti) and love (prema).

The text presents multiple devotional psychologies (bhāvas) as equally centered on Kṛṣṇa: some serve externally (pāda-sevā), some express māna (loving pique) that presupposes intimacy, and some internalize Him through the eyes into the heart, resembling yogic dhyāna. The Bhāgavata’s point is that Kṛṣṇa is the object of both yoga and bhakti, yet in Vraja the same absorption is propelled by love rather than austerity.

He explains that delayed reciprocation can be an act of grace: it intensifies longing until the devotee’s mind cannot rest in anything else, making devotion irrevocable and exclusive. The analogy is a poor person who gains wealth and loses it—anxiety fixes the mind; similarly, separation fixes the heart on Kṛṣṇa, purifying motivation from mixed desires.

First are those who reciprocate only for self-benefit (transactional friendship). Second are those naturally compassionate—like parents—who serve even without return (faultless dharma). Third are those who do not love even those who love them, due to self-satisfaction, material fullness, ingratitude, or envy of superiors. Kṛṣṇa uses this typology to clarify that His own apparent non-reciprocation is neither selfish nor envious but purposeful for elevating devotion.

Because their devotion is described as spotless and total: they cut through difficult domestic bonds and social/Vedic constraints solely for His sake, offering themselves without calculation. In bhakti theology, such prema places Bhagavān in a position of loving ‘debt’ (ṛṇa), underscoring that pure devotion conquers the unconquerable and is valued above all cosmic reward.