Bhagavad Gita - Raja Vidya Raja Guhya Yoga
BhaktiShraddhaIshvara34 Shlokas

Chapter 9: Raja Vidya Raja Guhya Yoga

राजविद्याराजगुह्ययोग

The Yoga of Royal Knowledge

अध्याय 9 में श्रीकृष्ण ‘राजविद्या’ और ‘राजगुह्य’—परम ज्ञान और परम रहस्य—का उपदेश देते हैं, जो प्रत्यक्ष, पावन और आचरण-योग्य मार्ग है तथा तत्त्वज्ञान को जीवित भक्ति से जोड़ता है। साधक की समस्या युद्धनीति की अनिश्चितता से हटकर ज्ञानात्मक और अस्तित्वगत स्पष्टता बन जाती है—परमेश्वर का जगत, कर्म और मोक्ष से संबंध क्या है। श्रीकृष्ण अपनी व्यापकता और परात्परता बताते हैं—सबमें व्याप्त होकर भी असंग—और प्रकृति के द्वारा, अपनी अधिष्ठात्री सत्ता के अंतर्गत, सृष्टि-प्रपंच की अभिव्यक्ति समझाते हैं। वे बाह्य दृष्टि और मिथ्या श्रद्धा के कारण ईश्वर को न पहचानने वालों की तुलना उस महात्मा से करते हैं जो एकनिष्ठ भक्ति से आराधना करता है। यज्ञ का अर्थ ईश्वर-केन्द्रित तत्त्वमीमांसा में प्रतिष्ठित होता है—“यज्ञ मैं हूँ, हवि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ”—और साधना को सुलभ भक्ति में स्थिर किया जाता है: पत्र, पुष्प, फल या जल भी यदि भक्ति से अर्पित हो तो स्वीकार होता है। अंततः उपदेश यह है कि समस्त कर्म भगवान को समर्पित करके उनकी शरण में रहा जाए; तब उनकी रक्षा प्राप्त होती है और अखंड स्मरण व भक्ति से परम गति की प्राप्ति होती है।

Speakers

KrishnaArjuna

Key Concepts

राजविद्याराजगुह्यज्ञान-विज्ञानमाया/प्रकृतिईश्वरत्व (प्रभुत्व)अनन्य-भक्तियोगक्षेमशरणागति/समर्पण

Philosophical Constructs

Raja-vidya (Royal Knowledge)Raja-guhya (Royal Secret)Bhakti (Devotion)Jñāna-Vijñāna (Knowledge and Realization)Prakṛti (Nature)Īśvara (Divine Lordship)Karma-yoga (Consecrated Action)Yoga-kṣema (Welfare and Security)Samatva (Equanimity)Mokṣa (Liberation)

Shlokas in Chapter 9

Verse 1

श्रीभगवानुवाच । इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ ९.१ ॥

श्रीभगवान् बोले: हे अनसूयु (दोषदृष्टि-रहित) जन! मैं तुम्हें यह परम गुह्य ज्ञान, विज्ञान सहित, कहूँगा; जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।

Verse 2

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ ९.२ ॥

यह राजविद्या है, राजगुह्य है, परम पवित्र और उत्तम है; प्रत्यक्ष अनुभवगम्य, धर्म्य, करने में अत्यन्त सुखद और अव्यय है।

Verse 3

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ९.३ ॥

हे परन्तप! इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु और संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।

Verse 4

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ९.४ ॥

मेरे अव्यक्त स्वरूप के द्वारा यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। समस्त भूत मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

Verse 5

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ९.५ ॥

और भूत मुझमें स्थित नहीं हैं—मेरे ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। भूतों को धारण-पोषण करने वाला मेरा आत्मस्वरूप भूतों में स्थित नहीं है, और वही भूतों को उत्पन्न करने वाला है।

Verse 6

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ९.६ ॥

जैसे सदा आकाश में स्थित महान् वायु सर्वत्र विचरण करता है, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं—ऐसा समझो।

Verse 7

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ९.७ ॥

हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और कल्प के आदि में मैं उनको फिर उत्पन्न करता हूँ।

Verse 8

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ९.८ ॥

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त भूतसमुदाय को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से परवश है।

Verse 9

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९.९ ॥

हे धनञ्जय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते; मैं उन कर्मों में आसक्तिरहित, उदासीन के समान स्थित रहता हूँ।

Verse 10

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ ९.१० ॥

हे कौन्तेय! मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चर-अचर सहित जगत को उत्पन्न करती है; इसी कारण यह जगत निरन्तर परिवर्तित होता रहता है।

Verse 11

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ९.११ ॥

मूढ़ लोग मुझे मनुष्य शरीर धारण करने वाला समझकर मेरा तिरस्कार करते हैं; वे मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते, जो समस्त भूतों का महान् ईश्वर है।

Verse 12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ ९.१२ ॥

वे विवेकहीन लोग व्यर्थ आशा वाले, व्यर्थ कर्म वाले और व्यर्थ ज्ञान वाले होते हैं तथा मोहिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृति को धारण किए रहते हैं।

Verse 13

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ ९.१३ ॥

परन्तु हे पार्थ! महात्मा जन दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर, समस्त भूतों के अविनाशी आदि-कारण मुझे जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।

Verse 14

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ ९.१४ ॥

सदा मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत लेकर प्रयत्नशील रहकर, और भक्ति से मुझे नमस्कार करते हुए—नित्य मुझमें युक्त होकर—वे मेरी उपासना करते हैं।

Verse 15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ ९.१५ ॥

अन्य लोग ज्ञान-यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हुए, मुझे एकत्व से, पृथक्त्व से और बहुधा—सर्वतोमुख—रूप में पूजते हैं।

Verse 16

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ ९.१६ ॥

मैं ही क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों के लिए स्वधा हूँ, मैं ही औषधि हूँ। मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घृत हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही आहुति हूँ।

Verse 17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ ९.१७ ॥

मैं इस जगत का पिता हूँ, माता हूँ, धाता (धारण करने वाला) हूँ और पितामह हूँ। मैं ही वेद्य (जानने योग्य) हूँ, पवित्र करने वाला हूँ, ओंकार हूँ, तथा ऋक्, साम और यजुर्वेद भी हूँ।

Verse 18

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ ९.१८ ॥

मैं ही गति हूँ, भर्ता (पालनकर्ता) हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास हूँ, शरण हूँ और सुहृत् (हितैषी मित्र) हूँ। मैं ही उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, आधार हूँ, निधान (कोष) हूँ और अव्यय बीज हूँ।

Verse 19

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ ९.१९ ॥

मैं ही तपाता हूँ; मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत (अमरत्व) और मृत्यु हूँ; मैं ही सत् और असत् हूँ।

Verse 20

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं ...

तीनों वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले, पापों से शुद्ध हुए लोग यज्ञों द्वारा मेरी उपासना करके स्वर्ग-गति की प्रार्थना करते हैं। वे पुण्य प्राप्त करके देवों के इन्द्र के लोक को प्राप्त होते हैं।

Verse 21

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गताग...

उस विशाल स्वर्गलोक का भोग करके, पुण्य क्षीण होने पर वे फिर मर्त्यलोक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों के धर्म का अनुसरण करने वाले बार-बार जाते और लौटते रहते हैं।

Verse 22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ९.२२ ॥

जो लोग अनन्य भाव से मेरा ही चिन्तन करते हुए सर्वथा मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य-युक्त भक्तों का योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ—जो प्राप्त नहीं है उसे दिलाता हूँ और जो प्राप्त है उसकी रक्षा करता हूँ।

Verse 23

येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ ९.२३ ॥

हे कुन्तीपुत्र! जो श्रद्धा से युक्त होकर अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, वे भी वास्तव में मेरी ही उपासना करते हैं, परन्तु विधिपूर्वक नहीं।

Verse 24

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ ९.२४ ॥

क्योंकि समस्त यज्ञों का भोक्ता और स्वामी तो मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्वतः नहीं जानते, इसलिए वे च्युत हो जाते हैं।

Verse 25

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ ९.२५ ॥

देवव्रती देवों को प्राप्त होते हैं, पितृव्रती पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों की पूजा करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं; और मेरी पूजा करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।

Verse 26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ ९.२६ ॥

जो कोई भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध-चित्त भक्त द्वारा भक्तिसहित अर्पित उस उपहार को मैं स्वीकार करता हूँ।

Verse 27

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ ९.२७ ॥

हे कौन्तेय! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ यज्ञ में अर्पित करते हो, जो कुछ दान देते हो, और जो तप करते हो—वह सब मुझे अर्पण करके करो।

Verse 28

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ ९.२८ ॥

इस प्रकार शुभ और अशुभ फलों वाले कर्म-बन्धनों से तुम मुक्त हो जाओगे; संन्यास-योग से युक्त चित्त होकर, विमुक्त होकर, तुम मुझे प्राप्त होओगे।

Verse 29

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ ९.२९ ॥

मैं समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखता हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है, न कोई प्रिय। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें स्थित रहते हैं और मैं भी उनमें स्थित रहता हूँ।

Verse 30

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ९.३० ॥

यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य-भक्ति से मेरा भजन करे, तो उसे निश्चय ही साधु मानना चाहिए; क्योंकि उसका संकल्प सम्यक् है।

Verse 31

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ९.३१ ॥

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय, दृढ़तापूर्वक जान ले—मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

Verse 32

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ९.३२ ॥

हे पार्थ, जो भी मेरा आश्रय लेते हैं, वे—even तथाकथित पापयोनि—स्त्रियाँ, वैश्य तथा शूद्र भी—परम गति को प्राप्त होते हैं।

Verse 33

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ९.३३ ॥

फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या! इस अनित्य और दुःखमय लोक को प्राप्त होकर मेरा भजन कर।

Verse 34

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ९.३४ ॥

मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार मुझसे युक्त होकर और मुझे ही परम आश्रय तथा परम लक्ष्य मानकर तुम निश्चय ही मुझे ही प्राप्त होओगे।

Frequently Asked Questions

Chapter 9 reframes anxiety about outcomes into stable focus through single-minded devotion and consecrated action. By placing responsibility for “yoga-kṣema” with the Divine while maintaining disciplined practice, the seeker learns to act without inner fragmentation, reducing stress and rumination.

The chapter teaches a dual-aspect relation: the Supreme pervades all beings (immanence) yet is not constrained by them (transcendence). Cosmic manifestation proceeds through prakṛti under divine oversight, while liberation is approached through realized knowledge integrated with devotion.

It resolves the dilemma by supplying a unifying orientation: recognize the Divine as the ground of all processes, then offer all actions—work, giving, discipline, and daily living—as worship. This replaces conflicted agency with a coherent ethical framework: duty becomes a means of spiritual integration rather than a source of distress.

Use Chapter 9 as a practice of intentionality: dedicate your workday, decisions, and self-care to a higher purpose; keep one stabilizing daily devotion (recitation, reflection, or mindful offering); and reduce outcome-anxiety by focusing on effort, integrity, and service. This supports leadership, emotional balance, and resilience under pressure.

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