
Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by converting the kingdom into an administrable revenue-machine. Chapter 2.17 positions the forest not as wilderness but as a controlled fiscal organ feeding the kośa. The Kupyādhyakṣa is tasked to (i) procure forest wealth through rangers and production units, (ii) classify commodities into administrable categories (timber, bamboo, creepers, bark/fibers, rope materials, leaves, flowers/dyes, drugs, poisons, animal products, metals, earthenware), and (iii) institutionalize accountability via standardized loss-allowances and receivables/arrears ledgers, with an exception regime for emergencies. This chapter therefore links ecological extraction to state capacity: predictable supplies support workshops, military logistics, and trade, while ledgers reduce corruption and stabilize cashflow. In the Saptāṅga logic, it strengthens kośa directly and janapada indirectly by preventing resource-plunder that would erode long-term productivity and public order.
Sutra 1
कुप्याध्यक्षो द्रव्यवनपालैः कुप्यमानाययेत् ॥ कZ_०२.१७.०१ ॥
कुप्याध्यक्ष राजस्व-वनों के वनपालों के द्वारा कुप्य (वन-उत्पाद) मँगवाए।
Sutra 2
द्रव्यवनकर्मान्तांश्च प्रयोजयेत् ॥ कZ_०२.१७.०२ ॥
उसे राजस्व वनों के कार्य-स्थानों (कर्मान्त) का भी संचालन कराना चाहिए।
Sutra 3
द्रव्यवनच्छिद्रां च देयमत्ययं च स्थापयेदन्यत्रापद्भ्यः ॥ कZ_०२.१७.०३ ॥
उसे राजस्व वनों में होने वाली हानि/रिसाव तथा देय राशि में दी गई छूट/माफी—दोनों का लेखा रखना चाहिए; आपदा की स्थिति को छोड़कर।
Sutra 4
कुप्यवर्गः शाकतिनिशधन्वनार्जुनमधूकतिलकसालशिंशपारिमेदराजादनशिरीषखदिरसरलतालसर्जाश्वकर्णसोमवल्ककुशाम्रप्रियकधवादिः सारदारुवर्गः ॥ कZ_०२.१७.०४ ॥
‘कुप्य’ वर्ग में सारदारु (हृदयकाष्ठ/इमारती लकड़ी) का वर्ग आता है, जैसे—शाकति, निशा, धन्वन, अर्जुन, मधूक, तिलक, साल, शिंशपा, रिमेद, राजादन, शिरीष, खदिर, सरल, ताल, सर्ज, अश्वकर्ण, सोमवल्क, कुशाम्र, प्रियक, धव आदि।
Sutra 5
उटजचिमियचापवेणुवंशसातिनकण्टकभाल्लूकादिर्वेणुवर्गः ॥ कZ_०२.१७.०५ ॥
वेणु-वर्ग (बाँस वर्ग) में उटज, चिमिय, चाप, वेणु, वंश, सातिन, कण्टक, भाल्लूक आदि आते हैं।
Sutra 6
वेत्रशीकवल्लीवाशीश्यामलतानागलतादिर्वल्लीवर्गः ॥ कZ_०२.१७.०६ ॥
वेत्र, शीक, वल्ली, वाशी, श्यामलता, नागलता आदि लताएँ ‘वल्ली-वर्ग’ (लता-श्रेणी) में आती हैं।
Sutra 7
मालतीमूर्वार्कशणगवेधुकातस्यादिर्वल्कवर्गः ॥ कZ_०२.१७.०७ ॥
मालती, मूर्वा, अर्क, शण, गवेधुका आदि छाल/रेशा देने वाले पौधे ‘वल्क (छाल) वर्ग’ में आते हैं।
Sutra 8
मुञ्जबल्बजादि रज्जुभाण्डम् ॥ कZ_०२.१७.०८ ॥
मुञ्ज, बल्बज आदि से रस्सी-सम्बन्धी वस्तुएँ (रज्जुभाण्ड) बनती हैं।
Sutra 9
तालीतालभूर्जानां पत्त्रम् ॥ कZ_०२.१७.०९ ॥
ताली, ताल और भूर्ज से पत्ते/पत्र (लिखने या आवरण हेतु) प्राप्त होते हैं।
Sutra 10
किंशुककुसुम्भकुङ्कुमानां पुष्पम् ॥ कZ_०२.१७.१० ॥
किंशुक, कुसुम्भ और कुंकुम आदि के पुष्प (वस्तु-रूप में) आते हैं।
Sutra 11
कन्दमूलफलादिरौषधवर्गः ॥ कZ_०२.१७.११ ॥
कन्द, मूल, फल आदि ‘औषध (औषधि-द्रव्य) वर्ग’ में आते हैं।
Sutra 12
कालकूटवत्सनाभहालाहलमेषशृङ्गमुस्ताकुष्ठमहाविषवेल्लितकगौरार्द्रबालकमार्कटहैमवतकालिङ्गकदारदकाङ्कोलसारकोष्ट्रकादीनि विषाणि सर्पाः कीटाश्च त एव कुम्भगताः विषवर्गः ॥ कZ_०२.१७.१२ ॥
कालकूट, वत्सनाभ, हालाहल, मेषशृंग, मुस्ता, कुष्ठ, महाविष, वेल्लितक, गौर, आर्द्रबालक, मार्कट, हैमवत, कालिङ्ग, दारद, काङ्कोल, सारक, कोष्ट्रक आदि—और इन्हीं प्रकार के सर्प तथा कीट, जब घड़ों में रखे जाएँ—‘विषवर्ग’ (विष-श्रेणी) कहलाते हैं।
Sutra 13
गोधासेरकद्वीप्यृक्षशिंशुमारसिंहव्याघ्रहस्तिमहिषचमरसृमरखड्गगोमृगगवयानां चर्मास्थिपित्तस्नाय्वक्षिदन्तशृङ्गखुरपुच्छानि अन्येषां वापि मृगपशुपक्षिव्यालानाम् ॥ कZ_०२.१७.१३ ॥
गोधा, सेरक, द्वीपि (तेंदुआ), ऋक्ष (भालू), शिंशुमार, सिंह, व्याघ्र, हस्ती, महिष, चमर, सृमर (हिरण), खड्ग (गैंडा), गोमृग, गवय आदि तथा अन्य मृग-पशु-पक्षी-व्यालों से—चर्म, अस्थि, पित्त, स्नायु, नेत्र, दाँत, सींग, खुर और पूँछ—ये वस्तुएँ (राज्य के लिए) व्यापारिक द्रव्य हैं।
Sutra 14
कालायसताम्रवृत्तकंससीसत्रपुवैकृन्तकारकूटानि लोहानि ॥ कZ_०२.१७.१४ ॥
धातुओं में कालायस (काला लोहा), ताम्र, वृत्त, कंस (कांसा), सीस (सीसा), त्रपु (रंगा/टिन), वैकृन्तक और कारकूट शामिल हैं।
Sutra 15
विदलमृत्तिकामयं भाण्डम् ॥ कZ_०२.१७.१५ ॥
भाण्ड (पात्र/भंडार-उपकरण) विदल (फाड़े/चिरे हुए पदार्थ) और मृत्तिका (मिट्टी) से बनते हैं।
Sutra 16
अङ्गारतुषभस्मानि मृगपशुपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटाश्च । इति ॥ कZ_०२.१७.१६ ॥
अंगार, तुष और भस्म; मृग, पशु, पक्षी और व्याल (हिंसक पशु) के बाड़े; तथा काष्ठ और तृण के भंडार—ये (व्यवस्थाएँ) हैं।
Sutra 17
आजीवपुररक्षार्थाः कार्याः कुप्योपजीविना ॥ कZ_०२.१७.१७च्द् ॥
आजीविका की सुरक्षा और नगर-रक्षा के लिए आवश्यक कार्य उन लोगों से कराए जाएँ जो ऐसे माल (कुप्य) से जीविका चलाते हैं।
Stable public revenue and predictable supplies (timber, fibers, drugs, metals) for state works reduce price shocks, enable infrastructure and defense provisioning, and curb predatory over-harvesting—supporting long-run prosperity and order.
Implied: accountability is enforced through the chidrā and deyam-atyaya records—losses beyond the established allowance (except in āpadaḥ) are treated as official fault/misappropriation, triggering recovery and punitive action under general Arthāśāstra rules for embezzlement and negligence.