
Kapilādipūjāvidhāna — Procedure for Worship Beginning with Kapilā
इस अध्याय में ईश्वर गृह्य-पूजा का क्रम बताते हैं, जिसमें वास्तु-प्रतिष्ठा की भावना को ईशान-कल्प की शुद्धि-नियमावली से जोड़ा गया है। आरम्भ कपिला (पवित्र गौ) की पूजा से होता है—विशेष मंत्रों और प्रायश्चित्त/स्वीकारोक्ति-वाक्यों सहित—उसे जगन्माता और पापहरिणी माना गया है। फिर मध्यान्ह में अष्टपुष्पिका-विधि द्वारा शिव-उपासना (पीठ-रूप और शिव के अंग/तत्त्व-रूप) का विधान है। पके अन्न को मृत्युञ्जय-मंत्र जप तथा दर्भ-संस्कृत जल के छिड़काव से पवित्र किया जाता है। कूल्लिका-होम में नाभि-अग्नि, रेचक, वह्नि-बीज और वर्ण-स्थान-गति जैसे आन्तरिक अग्नि-प्रतीक बताए गए हैं; अंत में आहुतियाँ, क्षमा और विसर्जन। आगे गृह-वास्तु-बलि के स्थान—द्वार, ओखली-मूसल, झाड़ू-स्थान, शयनकक्ष, मध्य-स्तम्भ—और विघ्नराज, काम, स्कन्द आदि देवताओं का नियोजन। शुद्ध पात्र, मौन-भोजन, वर्जनाएँ, प्राणोपचार, उप-वायुओं को अर्पण, तथा भोजन के बाद आचमन; साथ ही पाठ-भेद-टिप्पणियाँ जीवित परम्परा को सुरक्षित रखती हैं।
Verse 1
इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये चण्डपूजाकथनं नाम षट्सप्ततितमो ऽध्यायः अथ सप्तसप्ततितमो ऽध्यायः कपिलादिपूजाविधनं ईश्वर उवाच कपिलापूजनं वक्ष्ये एभिर्मन्त्रैर् यजेच्च गां ॐ कपिले नन्दे नमः ॐ कपिले भद्रिके नमः
इस प्रकार आदिमहापुराण अग्निपुराण में ‘चण्डा-पूजा का कथन’ नामक छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब सत्तहत्तरवाँ अध्याय—‘कपिला आदि की पूजा-विधि’ आरम्भ होती है। ईश्वर बोले—मैं कपिला-पूजन बताता हूँ; इन मंत्रों से गौ की पूजा करे—“ॐ कपिले नन्दे नमः। ॐ कपिले भद्रिके नमः।”
Verse 2
ॐ कपिले सुशीले नमः कपिले सुरभिप्रभे ॐ कपिले सुमनसे नमः ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदे नमः
ॐ कपिले सुशीले नमः—सुस्वभाव वाली कपिला को नमस्कार। ॐ कपिले सुरभिप्रभे नमः—सुगन्धित तेज वाली कपिला को नमस्कार। ॐ कपिले सुमनसे नमः—शुभ-मन वाली कपिला को नमस्कार। ॐ भुक्तिमुक्तिप्रदे नमः—भोग और मुक्ति देने वाली को नमस्कार।
Verse 3
सौरभेयि जगन्मातर्देवानाममृतप्रदे गृहाण वरदे ग्रासमीप्सितार्थञ्च देहि मे
हे सौरभेयी, जगन्माता, देवों को अमृत देने वाली! हे वरदायिनी, यह ग्रास स्वीकार करो और मुझे भी इच्छित फल प्रदान करो।
Verse 4
वन्दितासि वसिष्ठेन विश्वामित्रेण धीमता कपिले हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतं
हे कपिले, वसिष्ठ और बुद्धिमान विश्वामित्र द्वारा तुम वन्दित हो। मेरे पाप को हर लो—जो भी दुष्कृत्य मुझसे हुआ है।
Verse 5
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च गावो मे हृदये चापि गवां मध्ये वसाम्यहं
गायें सदा मेरे आगे रहती हैं; गायें ही मेरे पीछे भी हैं। गायें मेरे हृदय में भी हैं, और मैं गायों के मध्य निवास करता हूँ।
Verse 6
दत्तं गृह्णन्तु मे ग्रासं जप्त्वा स्यां निर्मलः शिवः प्रार्च्य विद्यापुस्तकानि गुरुपादौ नमेन्नरः
मेरे द्वारा दिया गया ग्रास वे स्वीकार करें। जप करके मैं निर्मल और शिवमय हो जाऊँ। विद्या के पुस्तकों का विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य गुरु के चरणों में नमस्कार करे।
Verse 7
यजेत् स्नात्वा तु मध्याह्ने अष्टपुष्पिकया शिवं पीठमूर्तिशिवाङ्गानां पूजा स्यादष्टपुष्पिका
स्नान करके मध्याह्न में अष्टपुष्पिका-विधि से शिव की पूजा करे। पीठमूर्ति तथा शिव के अंग-स्वरूपों की जो पूजा होती है, वही अष्टपुष्पिका कहलाती है।
Verse 8
मध्याह्ने भोजनागारे सुलिप्ते पाकमानयेत् ततो मृत्युञ्जयेनैव वौषडन्तेन सप्तधा
मध्याह्न में भली-भाँति लिपे (शुद्ध) भोजनागार में पका हुआ अन्न लाए। फिर केवल मृत्युञ्जय-मंत्र से, ‘वौषट्’ अंत करके, उसे सात बार करे।
Verse 9
जप्तैः सदर्भशङ्खस्थैः सिञ्चेत्तं वारिविन्दुभिः सर्वपाकाग्रमुद्धृत्य शिवाय विनिवेदयेत्
जप से अभिमंत्रित, दर्भयुक्त शंख में स्थित जल-बिंदुओं से उसे छिड़के। फिर समस्त पके अन्न का अग्रभाग निकालकर शिव को विधिपूर्वक निवेदित करे।
Verse 10
अथार्धं चुल्लिकाहोमे विधानायोपकल्पयेत् विशोध्य विधिना चुल्लीं तद्वह्निं पूरकाहुतिं
इसके बाद चुल्लिका-होम की विधि के लिए आवश्यक सामग्री का आधा भाग तैयार करे। नियमपूर्वक चुल्ली (छोटी वेदी) को शुद्ध करके उसी अग्नि में पूरक-आहुति दे।
Verse 11
हुत्वा नाभ्यग्निना चैकं ततो रेचकवायुना वह्निवीजं समादाय कादिस्थानगतिक्रमात्
नाभि-अग्नि में एक बार आहुति देकर, फिर रेचक-प्राण (उच्छ्वास) के द्वारा अग्नि-बीज को ग्रहण करे और ‘क’ से आरम्भ होने वाले वर्ण-स्थानों में गति-क्रम के अनुसार आगे बढ़े।
Verse 12
शिवाग्निस्त्वमिति ध्यात्वा चुल्लिकाग्नौ निवेशयेत् ॐ हां अग्नये नमो वै हां सोमाय वै नमः
“तुम शिवरूप शुभ अग्नि हो” ऐसा ध्यान करके चुल्लिका-अग्नि में (आहुति/संस्कारित द्रव्य) स्थापित करे। फिर बोले— “ॐ हां—अग्नि को नमस्कार; हां—सोम को नमस्कार।”
Verse 13
सूर्याय वृहस्पतये प्रजानां पतये नमः सर्वेभ्यश् चैव देवेभ्यः सर्वविश्वेभ्य एव च
सूर्य को नमस्कार; बृहस्पति को नमस्कार; प्रजापति (प्राणियों के स्वामी) को नमस्कार। तथा समस्त देवताओं को और समस्त विश्वेदेवों को भी नमस्कार।
Verse 14
ठः अन्यार्धमिति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः अन्त्यार्धमिति ङ, चिह्नितपुस्तकपाठः निधानायोपकल्पयेदिति च, ङ, चिह्नितपुस्तकद्वयपाठः हृदि स्थानमतिक्रमेदिति ग, चिह्नितपुस्तकपाठः कादिस्थानमतिक्रमादिति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः हामग्नये खिष्टिकृते पूर्वादावर्चयेदिमान् स्वाहान्तामाहुतिं दत्वा क्षमयित्वा विसर्जयेत्
‘ठः’ के प्रसंग में कुछ चिह्नित पाण्डुलिपियाँ “अन्यार्धम्” पढ़ती हैं, कुछ “अन्त्यार्धम्”; और दो पाण्डुलिपियों में “निधानायोपकल्पयेत्” का पाठ भी मिलता है। कुछ में “हृदि स्थानम् अतिक्रमेत्” तथा कुछ में “कादि-स्थानम् अतिक्रमात्” का पाठ है। इस प्रकार विधि करके पूर्व आदि दिशाओं से इनका पूजन करे; फिर ‘स्वाहा’ से युक्त अग्नि को आहुति देकर, क्षमा-याचना कर के विसर्जन करे।
Verse 15
चुल्ल्या दक्षिणबाहौ च यजेद्धर्माय वै नमः वामबाहावधर्माय काञ्जिकादिकभाण्डके
चूल्हे के दाहिने भाग/भुजा पर ‘धर्माय वै नमः’ मंत्र से पूजन करे। बाएँ भाग/भुजा पर ‘अधर्माय’ का पूजन करे; तथा काञ्जिक (खट्टे मांड) आदि के पात्रों में भी संबंधित शक्ति का विन्यास/पूजन करे।
Verse 16
रसपरिवर्तमानाय वरुणाय जलाग्नये विघ्नराजो गृहद्वारे पेषण्यां सुभगे नमः
रसों के परिवर्तन कराने वाले जलाग्नि तथा जलाधिपति वरुण को नमस्कार। गृहद्वार पर विघ्नराज को नमस्कार; और चक्की/पेषणी पर स्थित शुभगा (मंगलमयी) को नमस्कार।
Verse 17
ॐ रौद्रिके नमो गिरिके नमश् चओलूखले यजेत् बलप्रियायायुधाय नमस्ते मुषले यजेत्
‘ॐ। रौद्रिका को नमस्कार, गिरिका को नमस्कार।’ ओलूखल (ओखली) में यजन/अर्पण करे। ‘बलप्रिय आयुध को नमस्कार’—ऐसा कहकर मुषल (मूसल) में यजन/अर्पण करे।
Verse 18
सम्मार्जन्यां देवतोक्ते कामाय शयनीयके मध्यस्तम्भे च स्कन्दाय दत्वा वास्तुबलिं ततः
तदनंतर झाड़ू/सम्मार्जन-स्थान पर देवता-विहित अर्पण करे; शयनकक्ष में कामदेव को, और मध्य-स्तम्भ पर स्कन्द को अर्पण करे। इस प्रकार वास्तु-बलि देकर फिर आगे की क्रिया करे।
Verse 19
भुञ्जीत पात्रे सौवर्णे पद्मिन्यादिदलादिके आचार्यः साधकःपुत्र समयी मौनमास्थितः
मौन धारण किए हुए आचार्य, साधक का पुत्र और समयी (दीक्षित व्रतधारी) स्वर्ण-पात्र में या पद्मिनी (कमल) के पत्ते आदि के पत्तल में भोजन करें।
Verse 20
वटाश्वत्थार्कवाताविसर्जभल्लातकांस्त्यजेत् अपोशानं पुरादाय प्राणाद्यैः प्रणवान्वितैः
वट, अश्वत्थ, अर्क, वात, विसर्ज और भल्लातक का सेवन/प्रयोग त्यागना चाहिए। पहले आचमन करके, प्राण आदि का संयम कर, ‘ॐ’ सहित (जपते हुए) फिर औषधि या भोजन ग्रहण करे।
Verse 21
स्वाहान्तेनाहुतीः पञ्च दत्वादीप्योदरानलं नागः कूर्मो ऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः
‘स्वाहा’ के अंत वाले पाँच आहुतियाँ देकर, भीतर के जठराग्नि को प्रज्वलित करे। ये (आहुतियाँ) नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनञ्जय—इन पाँच उपवायुओं से संबंधित हैं।
Verse 22
एतेभ्य उपवायुभ्यः स्वाहापोषानवारिणा भक्तादिकं निवेद्याय पिवेच्छेषोदकं नरः
इन उपवायुओं को ‘स्वाहा’ से संस्कारित जल सहित पका हुआ अन्न आदि निवेद्य करके, मनुष्य शेष जल (शेषोदक) पिए।
Verse 23
अमृतोपस्तरणमसि प्राणाहुतीस्ततो ददेत् प्राणाय स्वाहापानाय समानाय ततस् तथा
“तुम अमृत का उपस्तरण हो”—ऐसा कहे। फिर प्राणाहुतियाँ दे: ‘प्राणाय स्वाहा’, ‘अपानाय स्वाहा’, और क्रम से ‘समानाय स्वाहा’।
Verse 24
उदानाय च व्यानाय भुक्त्वा चुल्लकमाचरेत् जलाशये इति ङ, चिह्नितपुस्तकपाठः ॐ रौद्रकोटिगिरिके इति ख, ग, घ, ङ, चिह्नितपुस्तकचतुष्टयपाठः अमृतापिश्चानमसीति शरीरे ऽन्नादिवायवः
भोजन के बाद उदान और व्यान को समर्पित करते हुए चुल्लक-आचमन करे। एक चिह्नित पाण्डुलिपि में ‘जलाशये’ पाठ है; चार चिह्नित पाण्डुलिपियों में ‘ॐ रौद्रकोटिगिरिके’ पाठ मिलता है। इस क्रिया से शरीर में अन्न आदि (तत्त्व) वायुओं से संबद्ध माने जाकर ‘तुम अमृत हो; तुम अनमसि हो’—इस मंत्र से संस्कारित होते हैं।
A stepwise domestic-ritual blueprint: Kapilā-pūjā mantras, midday Aṣṭapuṣpikā Śiva worship, naivedya consecration with Mṛtyuñjaya, cullikā-homa with internal-agni visualization and letter-position sequencing, and Vāstu-bali placements across household loci.
It sacralizes everyday spaces (kitchen, doorway, bedchamber, pillar) and bodily processes (breath, digestion) through mantra and offering, aligning household order (bhukti: protection, purity, auspiciousness) with inner purification and Śiva-orientation (mukti: reduction of pāpa and cultivation of śuddhi).
Vighnarāja at the doorway, Kāma in the sleeping area, Skanda at the central pillar, and additional worship points associated with implements/locations such as mortar (olūkhala), pestle (muṣala), grinding-stone, broom/cleansing space, and vessels—forming a protective and ritually ordered household grid.