
Chapter 364 — ब्रह्मवर्गः (Brahmavarga: Lexical Classification of Brahminical/Ritual Terms)
कोश-शैली की संक्षिप्त परिभाषाओं में भगवान अग्नि वैदिक-यज्ञ साक्षरता और ब्राह्मणीय सामाजिक-आचार भूमिकाओं के लिए आवश्यक सूक्ष्म पदों का निरूपण करते हैं। पहले वंश, अन्ववाय, गोत्र, कुल/अभिजन-अन्वय आदि से वंश-परिचय के चिह्न बताते हैं; फिर अध्वर में आचार्य को मंत्र-व्याख्याता और आदेश्टा को यज्ञ-निर्देशक अधिकारी कहते हैं। आगे यज्ञ-परिसर—यजमान/यष्टा, सहकर्मी व सभा-भूमिकाएँ, तथा ऋत्विज-त्रय (अध्वर्यु, उद्गाता, होता) को यजुः-साम-ऋक्-विशेषज्ञता से जोड़कर स्पष्ट करते हैं। यूप पर चषाल, वेदी का चतुष्कोण, आमिक्षा, पृषदाज्य, परमान्न, उपाकृत पशु आदि उपकरण-आहुतियों की परिभाषा देते हैं और अभिषेक/प्रोक्षण/पूजा के पर्याय बताते हैं। फिर नियम और व्रत का भेद, कल्प बनाम अनुकल्प, विधि-विवेक, श्रुति-अध्ययन का उपाकरण, तपस्वियों के प्रकार, तथा अंत में यम (नित्य, देह-संयम) और नियम (कभी-कभी, बाह्य-सहाय आचरण) का तकनीकी अंतर बताकर ब्रह्म-भूय/ब्रह्मत्व/ब्रह्म-सायुज्य तक निष्कर्ष करते हैं।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे नृवर्गो नाम त्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ चतुःषष्ट्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः ब्रह्मवर्गः अग्निर् उवाच वंशो ऽन्ववायो गोत्रं स्यात् कुलान्यभिजनान्वयौ मन्त्रव्याख्याकृदाचार्य आदेष्टा त्वध्वरे व्रती
इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘नृवर्ग’ नामक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब ‘ब्रह्मवर्ग’ नामक तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय आरम्भ होता है। अग्नि बोले—वंश को अन्ववाय (पूर्वज-परम्परा) कहते हैं; गोत्र कुल-परम्परा है। ‘कुल’ और ‘अभिजनान्वय’ श्रेष्ठ वंश-परिचय और वंशावली के द्योतक हैं। मंत्रों की व्याख्या करने वाला आचार्य है; विधि-निर्देश देने वाला आदेश्टा है; और यज्ञ (अध्वर) में वह व्रती (व्रत-पालक) होता है।
Verse 2
यष्टा च यजमानः स्यात् ज्ञात्वारम्भ उपक्रमः सतीर्थ्याश् चैकगुरवः सभ्याः सामाजिकास् तथा
यष्टा वही यजमान हो; वह आरम्भ और उपक्रम की विधि को भली-भाँति जानकर कर्म करे। साथ में सतीर्थ्य, एक-गुरु वाले सहाध्यायी, सभ्य तथा सामाजिक (अनुष्ठान-सहभागी) भी हों।
Verse 3
सभासदः सभास्तारा ऋत्विजो याजकाश् च ते अध्वर्यूद्गातृहोतारो यजुःसामर्ग्विदः क्रमात्
वे सभासद और सभा के तारा (नेता) हैं; तथा ऋत्विज और याजक भी। क्रम से अध्वर्यु, उद्गाता और होता—जो क्रमशः यजुः, साम और ऋक् के ज्ञाता हैं।
Verse 4
चषालो यूपकटकः समे स्थण्डिलचत्वरे आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः
चषाल यूप (यज्ञ-स्तम्भ) का कटक (छल्ला) है। समतल भूमि पर स्थण्डिल-चत्वर में यथाविधि वेदिका होती है। आमिक्षा वह है जो उबले-गरम दूध में दही मिलाने से बनती है।
Verse 5
पृषदाज्यं सदध्याज्ये परमान्नन्तु पायसम् उपाकृतः पशुरसौ यो ऽभिमन्त्र्य क्रतौ हतः
पृषदाज्य वह है जो दही-मिश्रित घृत हो; और परमान्न पायस (दूध में पका अन्न) है। जो पशु मंत्र से अभिमंत्रित होकर यज्ञ (क्रतु) में वध किया जाए, वह ‘उपाकृत’ कहलाता है।
Verse 6
परम्पराकं समनं प्रोक्षणञ्च बधार्थकम् पूजा नमस्यापिचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः
‘परम्पराक’, ‘समन’ और ‘प्रोक्षण’—ये शब्द निग्रह/बंधन के प्रयोजन से किए जाने वाले प्रोक्षण (अभिषेक-सदृश छिड़काव) के लिए हैं। ‘पूजा’, ‘नमस्या’, ‘अपचिति’, ‘सपर्या’, ‘अर्चा’ और ‘अर्हणा’—ये उपासना और सम्मान-प्रदान के पर्याय हैं।
Verse 7
वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासनम् नियमो ब्रतमस्त्री तच्चोपवासादि पुण्यकम्
‘वरिवस्या’ सावधान सेवा है; ‘शुश्रूषा’ श्रद्धापूर्वक उपस्थिति और परिचरण है; तथा ‘परिचर्या’ भी उपासनारूप सेवा है। ‘नियम’ धार्मिक संयम है; ‘व्रत’ प्रतिज्ञाबद्ध अनुष्ठान है; और वह उपवास आदि पुण्यकर्मों से युक्त होता है।
Verse 8
मुख्यः स्यात् प्रथमः कल्पो ऽनुकल्पस्तु ततो ऽधमः कल्पे विधिक्रमौ ज्ञेयौ विवेकः पृथगात्मता
मुख्य कल्प को प्रथम मानना चाहिए; उसके बाद अनुकल्प उससे निम्न है। कल्प में विधि-क्रम दो जानने योग्य हैं—विवेक और आत्मा की पृथकता (पृथगात्मता)।
Verse 9
संस्कारपूर्वं ग्रहणं स्यादुपाकरणं श्रुतेः भिक्षुः परिव्राट् कर्मन्दी पाराशर्यपि मस्करी
श्रुति का ग्रहण (अध्ययन/पाठ) संस्कारपूर्वक होना चाहिए; यही वेद का ‘उपाकरण’ (आरम्भ-समारोह) कहलाता है। यह भिक्षु, परिव्राट, कर्मन्दी, पाराशर्य तथा मस्करी—इन सबके द्वारा आचरित होना चाहिए।
Verse 10
ऋषयः सत्यवचसःस्नातकश्चाप्लुतव्रती ये निर्जितेन्द्रियग्रामा यतिनो यतयश् च ते
जो ऋषि सत्यवचन हैं, जो स्नातक (विधिवत् दीक्षित-समाप्त) हैं, जो अखण्ड व्रत का पालन करते हैं, और जिन्होंने इन्द्रियों के समूह को जीत लिया है—वे ही वास्तव में यति हैं, सच्चे साधक संन्यासी।
Verse 11
शरीरसाधनापेक्षं नित्यं यत् कर्म तद्यमः नियमस्तु स यत् कर्मानित्यमागन्तुसाधनम् स्याद् ब्रह्मभूयं ब्रह्मत्वं ब्रह्मसायुज्यमित्यपि
जो कर्म शरीर-साधना पर आश्रित होकर नित्य किया जाता है, वह ‘यम’ है। ‘नियम’ वह कर्म है जो अनित्य है और जो कभी-कभी/बाह्य साधनों से सिद्ध होता है। उसका फल ‘ब्रह्मभूय’ (ब्रह्म हो जाना), ‘ब्रह्मत्व’ और ‘ब्रह्मसायुज्य’ (ब्रह्म से एकत्व) भी कहा जाता है।
A ritual-lexical map: precise definitions for lineage identifiers (vaṃśa, gotra, kula), priestly roles (ācārya, ādeṣṭā; Adhvaryu/Udgātṛ/Hotṛ), and yajña technicalities (caṣāla, altar-space terms, āmikṣā, pṛṣadājya, paramānna, upākṛta), including synonym clusters for consecration and worship.
By standardizing terms for restraint, vows, worship, and disciplined study (upākaraṇa), it protects correct practice and right understanding; the culminative framing—yama/niyama leading toward brahma-bhūya/brahma-sāyujya—connects technical observance to liberation-oriented transformation.