Adhyaya 294
AyurvedaAdhyaya 29429 Verses

Adhyaya 294

Daṣṭa-cikitsā (Treatment for Bites) — Mantra-Dhyāna-Auṣadha Protocols for Viṣa

भगवान अग्नि दष्ट-चिकित्सा का विशेष आयुर्वेद-प्रकरण आरम्भ करते हैं और उपचार को तीन भागों में बताते हैं—मंत्र, ध्यान और औषध। पहले “ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय” के जप को विष-शमन और प्राण-रक्षा का साधन कहा गया है। फिर विष को दो वर्गों में बाँटा गया—जंगम (सर्प, कीट आदि प्राणीजन्य) और स्थावर (वनस्पति/खनिजजन्य)। आगे वियति/तार्क्ष्य (गरुड़) मंत्र-केन्द्रित विधि आती है—स्वर/ध्वनि-भेद, कवच व अस्त्र-मंत्र, यंत्र-मंडल का ध्यान (मातृका-कमल), तथा उँगलियों और संधियों पर विस्तृत न्यास। पंचमहाभूतों के रंग, आकार और अधिष्ठातृ देवताओं सहित ‘विनिमय/प्रतिलोम’ तर्क से विष को स्तम्भित, स्थानान्तरित और नष्ट करने की प्रक्रिया बताई गई है। अंत में गरुड़ तथा रुद्र/नीलकण्ठ मंत्र, कर्ण-जप, रक्षाबंधन (उपानहाव) और रुद्र-विधान पूजा द्वारा इसे चिकित्सा के साथ धर्मिक अनुष्ठान के रूप में स्थापित किया गया है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे नागलक्षणदिर्नाम त्रिनवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथ चतुर्नवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः दष्टचिकित्सा अग्निर् उवाच मन्त्रध्यानौषधैर् दष्टचिकित्सां प्रवदामि ते ॐ नमो भगवते नीलकण्ठायेति जपनाद्विषहानिः स्यदौषधं जीवरक्षणं

इस प्रकार श्रीआग्नेय महापुराण में ‘नागलक्षण-निर्णय’ नामक 294वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब 295वाँ अध्याय ‘दष्ट-चिकित्सा’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—मंत्र, ध्यान और औषधियों द्वारा मैं तुम्हें सर्पदंश की चिकित्सा बताता हूँ। ‘ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय’ का जप करने से विष का प्रभाव घटता है; यह जीवन-रक्षा की औषधि है।

Verse 2

साज्यं सकृद्रसं पेयं द्विविधं विषमुच्यते जङ्गमं सर्पभूषादि शृङ्ग्यादि स्थावरं विषं

विष दो प्रकार का कहा गया है—घी के साथ मिला कर पान करने योग्य, और एक बार में पिया जाने वाला निचोड़ा हुआ रस। जंगम (प्राणीजन्य) विष सर्प, कीट आदि का है; स्थावर (वनस्पति/खनिजजन्य) विष शृंगी आदि स्रोतों से उत्पन्न माना गया है।

Verse 3

शान्तस्वरान्वितो ब्रह्मा लोहितं तारकं शिवः वियतेर्नाममन्त्रो ऽयं तार्क्षः शब्दमयः स्मृतः

ब्रह्मा को शान्त-स्वर से युक्त समझना चाहिए; शिव को लोहित, तारक (उद्धारक) स्वर से संबद्ध कहा गया है। यह ‘वियति’ नामक मंत्र है; इसे ‘तार्क्ष्य’—शब्दमय—रूप में स्मरण किया गया है।

Verse 4

ख र्दय विमर्दय कवचाय अप्रतिहतशामनं वं हूं फट् अस्त्राय उग्ररूपवारक सर्वभयङ्कर भीषय सर्वं दह दह भस्मीकुरु कुरु स्वाहा नेत्राय सप्तवर्गान्तयुग्माष्टदिग्दलस्वर केशरादिवर्णरुद्धं वह्निराभूतकर्णकं मातृकाम्बुजं कृत्वा हृदिस्थं तन्मन्त्री वामहस्ततले स्मरेत् अङ्गष्ठादौ न्यसेद्वर्णान्वियतेर्भेदिताः कलाः

‘ख’—हृदय के लिए: मर्दन करो, मर्दन करो। कवच के लिए: अप्रतिहत का शमन करने वाला। ‘वं हूं फट्’—अस्त्र-मंत्र: उग्र रूपों को रोकने वाला। जो कुछ भी भयङ्कर है उसे भयभीत करो; सबको जलाओ, जलाओ; भस्म करो, करो—स्वाहा। नेत्र के लिए—सप्त-वर्गों के अन्त्य अक्षरों के युग्मों से विन्यस्त स्वर, आठ दिशाएँ जिनकी पंखुड़ियाँ हैं, केसर आदि वर्णों से सीमित रंग, अग्नि-स्वरूप कर्णिका—ऐसा ‘मातृका-कमल’ बनाकर, मंत्रज्ञ उसे हृदय में स्थित और बाएँ हाथ की हथेली पर स्थित रूप में स्मरण करे। अंगूठे से आरम्भ कर अक्षरों का न्यास करे; कलाएँ ‘वियति’ के अनुसार भेदित हैं।

Verse 5

पीतं वज्रचतुष्कोणं पार्थिवं शक्रदैवतं वृत्तार्धमाप्यपद्मार्धं शुक्लं वरूणदैवतं

पृथ्वी-तत्त्व पीत वर्ण का, वज्र के समान चतु:कोणाकार है और उसका अधिदेवता शक्र (इन्द्र) है। जल-तत्त्व श्वेत वर्ण का, अर्धवृत्त तथा अर्धपद्माकार है और उसका अधिदेवता वरुण है।

Verse 6

त्र्यस्त्रं स्वस्तिकयुक्तञ्च तैजसं वह्निदैवतं वृत्तं विन्दुवृतं वायुदैवतं कृष्णमालिनम्

त्र्यस्त्र को स्वस्तिक-चिह्न से युक्त करना चाहिए। तैजस का अधिदेव अग्नि है। वृत्त-आकृति में मध्य बिंदु हो; उसका अधिदेव वायु है और वह कृष्ण-माला (काली परिधि) से घिरा हो।

Verse 7

अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीमध्ये पर्यस्तेषु स्ववेश्मसु सुवर्णनागवाहेन वेष्ठितेषु न्यसेत् क्रमात्

फिर अंगूठे से आरम्भ कर उँगलियों के मध्य स्थित अपने-अपने ‘वेश्म’ (आवास-स्थान) में, जो सुवर्ण नाग-वाह (सर्प-धारा) से परिवेष्टित हैं, क्रमशः न्यास करना चाहिए।

Verse 8

वियतेश् चतुरो वर्णान् सुमण्डलसमत्विषः अरूपे रवतन्मात्रे आकाशेशिवदेवते

वियत् (आकाश) में चारों वर्ण सुमण्डल के समान तेजस्वी हैं। जो अरूप है, जिसमें केवल रवा-तन्मात्र (ध्वनि का सूक्ष्म मात्र) है, उस आकाश का अधिष्ठाता देवता शिव है।

Verse 9

कनिष्ठामध्यपर्वस्थे न्यसेत्तस्याद्यमक्षरम् नागानामादिवर्णांश् च स्वमण्डलगतान्न्यसेत्

कनिष्ठा (छोटी उँगली) के मध्य पर्व में उसका प्रथम अक्षर न्यास करे; और अपने मण्डल में स्थित क्रम के अनुसार नागों के आदिवर्ण (प्रारम्भिक अक्षर) भी न्यास करे।

Verse 10

भूतादिवर्णान् विन्यसेदङ्गुष्टाद्यन्तपर्वसु तन्मात्रादिगुणाभ्यर्णानङ्गुलीषु न्यसेद्बुधः

अंगूठे से लेकर अन्तिम पर्वों तक भूतादि-वर्णों का विन्यास (न्यास) करे; और तन्मात्रादि-गुणों से सम्बद्ध (समीपस्थ) वर्णों को उँगलियों पर बुद्धिमान साधक न्यास करे।

Verse 11

स्पर्शनादेवतार्क्षेण हस्ते हन्याद्विषद्वयं मण्डलादिषु तान् वर्णान् वियतेः कवयो जितान्

केवल स्पर्श से ही तार्क्ष्य (गरुड़) के प्रभाव द्वारा हाथ से विषों की जोड़ी का नाश करे। और मण्डल आदि यंत्रों में आकाश-तत्त्व से संबद्ध, ऋषियों द्वारा विजित वे वर्ण-अक्षर अंकित करे।

Verse 12

श्रेष्ठद्व्यङ्गुलिभिर्देहनाभिस्थानेषु पर्वसु भेदिकास्तथेति ख वरतन्मत्रे इति ख आजानुतः सुवर्णाभमानाभेस्तुहिनप्रभम्

श्रेष्ठ दो अङ्गुल के मान से देह के पर्वों को—नाभि-स्थान के निकट—भेदिका (विभाजन-चिह्न) के रूप में चिह्नित करे। घुटनों से नीचे वर्ण सुवर्ण-सा हो, और नाभि-प्रदेश हिम-प्रभा के समान उज्ज्वल हो।

Verse 13

कुङ्कुमारुणमाकण्ठादाकेशान्तात् सितेतरं ब्रह्माण्डव्यापिनं तार्क्षञ्चन्द्राख्यं नागभूषणम्

कण्ठ से लेकर केशान्त (शिखा/मस्तक-शिखर) तक कुंकुम-सा अरुण (लाल) ध्यान करे; उसके नीचे भिन्न—श्वेताभ—वर्ण माने। वह ब्रह्माण्डव्यापी, तार्क्ष्य, ‘चन्द्राख्य’ तथा नागों को भूषण रूप में धारण करने वाला है।

Verse 14

नीलोग्रनाशमात्मानं महापक्षं स्मरेद्बुधः एवन्तात्क्षात्मनो वाक्यान्मन्त्रः स्यान्मन्त्रिणो विषे

बुद्धिमान साधक अपने भीतर नील-उग्र विष का नाश करने वाले महापक्ष (गरुड़) का स्मरण/ध्यान करे। ऐसे ध्यान और अपने उच्चारित वचनों से, विष के विषय में मन्त्रज्ञ के लिए मन्त्र सिद्ध होता है।

Verse 15

सुष्टिस्तार्क्षकरस्यान्तःस्थिताङ्गुष्ठविषापहा तार्क्षं हस्तं समुद्यम्य तत्पञ्चाङ्गुलिचालनात्

तार्क्ष-हस्त के भीतर अङ्गुष्ठ को स्थित करके जो ‘सुष्टि’ (मुद्रा/प्रयोग) है, वह विषहर है। तार्क्ष-हस्त को उठाकर उसकी पाँचों अँगुलियों को चलाने (हिलाने) से विष शांत होता है।

Verse 16

कुर्याद्विषस्य स्तम्भादींस्तदुक्तमदवीषया आकाशादेष भूवीजः पञ्चार्णाधिपतिर्मनुः

‘अद-वीषा’ मन्त्र के द्वारा, जैसा कहा गया है, विष के स्तम्भन आदि विधान करने चाहिए। यह आकाश से उत्पन्न भू-बीज है और पंचाक्षरी का अधिपति मन्त्र है।

Verse 17

संस्तम्भयेतिविषतो भाषया स्तम्भ्येद्विषम् व्यत्यस्तभूषया वीजो मन्त्रो ऽयं साधुसाधितः

उचित उच्चारण में ‘संस्तम्भये’ से आरम्भ होने वाले मन्त्र का जप करके विष को स्तम्भित करना चाहिए। यह व्यत्यस्त (उलट/परिवर्तित) विन्यास से प्रयोज्य, भली-भाँति सिद्ध बीज-मन्त्र है।

Verse 18

संप्लवः प्लावय यमः शब्दाद्यः संहरेद्विषं दण्डमुत्थापयेदेष सुजप्ताम्भो ऽभिषेकतः

‘सम्प्लव’ (मन्त्र) प्लावन करता है; ‘प्लावय’ (मन्त्र) बहा देता है; ‘यम’ (मन्त्र) नियमन करता है। ‘शब्दाद्य’ मन्त्र, जो रहस्यमय नाद से आरम्भ है, शत्रु का संहार करता है। सुजप्त जल के अभिषेक-छिड़काव से यह दण्ड (अधिकार) को स्थापित करता है।

Verse 19

सुजप्तशङ्खभेर्यादिनिस्वनश्रवणेन वा संदहत्येव संयुक्तो भूतेजोव्यत्ययात् स्थितः

अथवा सुजप्त शङ्ख, भेरी आदि के निस्वन का श्रवण मात्र होने पर भी, भूत-तत्त्व और तेज के व्यत्यय से स्थित बाधक सत्ता, सम्मुख होने पर मानो दग्ध हो जाती है।

Verse 20

भूवायुव्यत्ययान्मन्त्रो विषं संक्रामयत्यसौ अन्तस्थो निजवेश्मस्थो वीजाग्नीन्दुजलात्मभिः

भूमि और वायु के व्यत्यय-नियमन से वह मन्त्र विष का संक्रामण (स्थानान्तरण) कर देता है। साधक भीतर (रोगी में) हो या अपने गृह में स्थित हो, वह बीज, अग्नि, इन्दु और जल-स्वरूप शक्तियों से कार्य करता है।

Verse 21

एतत् कर्म नयेन्मन्त्री गरुडाकृतिविग्रहः तार्क्षवर्णगेहस्थस्तज्जपान्नाशयेद्विषम्

मंत्र-साधक को यह कर्म गरुड़ाकार मुद्रा/आकृति धारण करके करना चाहिए; तार्क्ष्य (गरुड़) के वर्ण-चिह्न से युक्त स्थान में स्थित होकर, उसी मंत्र-जप से विष का नाश करे।

Verse 22

जामुदण्डीदमुदितं स्वधाश्रीवीजलाञ्छितं स्नानपानात्सर्वविषं ज्वरातोगापमृत्युजित्

यह ‘जामुदण्डी’ नामक विद्या यहाँ कही गई है, जो स्वधा, श्री और वीजला के चिह्न/शक्ति से युक्त है; इससे अभिमंत्रित जल का स्नान और पान करने से समस्त विष, ज्वर, रोग और अकाल मृत्यु पर विजय होती है।

Verse 23

पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि विधि स्वाहा यश इति ञ पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि क्षि क्षि स्वाहा

मंत्रोच्चार: “पक्षि, पक्षि; महापक्षि, महापक्षि—विधि, स्वाहा। ‘यश’—ऐसे कहकर ‘ञ’ (अक्षर) जोड़े। फिर: पक्षि, पक्षि; महापक्षि, महापक्षि—क्षि क्षि, स्वाहा।”

Verse 24

द्वावेतौ पक्षिराड्मन्त्रौ विषघ्नावभिमन्त्रणात् पक्षिराजाय विध्महे पक्षिदेवाय धीमहि तत्रो गरुड प्रचोदयात् वह्निस्थौ पार्श्वतत्पूर्वौ दन्तश्रीकौ च दण्डिनौ सकालो लाङ्गली चेति नीलकण्ठाद्यमीरितं वक्षःकण्ठशिखाश्वेतं न्यसेत्स्तम्भे सुसंस्कृतौ

ये दो ‘पक्षिराज’ (गरुड़-संबंधी) मंत्र अभिमंत्रण से विषघ्न हो जाते हैं—“पक्षिराजाय विध्महे, पक्षिदेवाय धीमहि, तन्नो गरुडः प्रचोदयात्।” फिर उन्हें भली-भाँति संस्कृत स्तम्भ पर न्यास करे—अग्नि में स्थित, पार्श्व तथा पूर्व में ‘दन्तश्रीक’ और ‘दण्डिन’; तथा ‘सकाल’ और ‘लाङ्गली’—जैसा नीलकण्ठ आदि से उपदिष्ट है; वक्ष, कण्ठ और शिखा पर श्वेत-चिह्न का विन्यास करे।

Verse 25

हर हर हृदयाय नमः कपर्दिने च शिरसे नीलकण्ठाय वै शिखां कालकूटविषभक्षणाय स्वाहा अथ वर्म च कण्ठे नेत्रं कृत्तिवासास्त्रिनेत्रं पूर्वाद्यैर् आननैर् युक्तं श्वेतपीतारुणासितैः अभयं वरदं चापं वासुकिञ्च दधद्भुजैः यस्योपरीतपार्श्वस्थगौरीरुद्रो ऽस्य देवता

“हर, हर! हृदय में नमः। शिर पर कपर्दिन् को नमः। शिखा में नीलकण्ठ को (नमः)। कालकूट-विष-भक्षक को स्वाहा।” अब कण्ठ में वर्म तथा नेत्र-न्यास करे—कृत्तिवास, त्रिनेत्र, पूर्व आदि दिशाओं के मुखों से युक्त, जिनके मुख श्वेत, पीत, अरुण और असित हैं; जिनकी भुजाएँ अभय, वरद, धनुष और वासुकि धारण करती हैं; इस कवच/न्यास की देवता ऊर्ध्व-पार्श्व में स्थित गौरी सहित रुद्र हैं।

Verse 26

पादजानुगुहानाभिहृत्कण्ठाननमूर्धसु मन्त्रार्णान्न्यस्य करयोरङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीषु च

पैरों, घुटनों, जंघाओं, नाभि, हृदय, कंठ, मुख और मस्तक पर मंत्र के अक्षरों का न्यास करके, फिर हाथों में—अंगूठे तथा अन्य उँगलियों पर भी—न्यास करे।

Verse 27

तर्जन्यादितदन्तासु सर्वमङ्गुष्ठयोर् न्यसेत् ध्यात्वैवं संहरेत् क्षिप्रं वद्धया शूलमुद्रया

तर्जनी आदि उँगलियों के अग्रभागों पर सबका न्यास करके, फिर दोनों अंगूठों पर स्थापित करे। इस प्रकार ध्यान करके, बंधी हुई शूल-मुद्रा द्वारा शीघ्र संहार (वापसी) करे।

Verse 28

कनिष्ठा ज्येष्ठया वद्धा तिश्रो ऽन्याः प्रसृतेर्जवाः विषनाशे वामहस्तमन्यस्मिन् दक्षिणं करं

कनिष्ठा को अंगूठे से बाँधकर, शेष तीन उँगलियों को वेग से फैलाए। विष-नाश के लिए इस प्रकार बाएँ हाथ का और दूसरी ओर दाएँ हाथ का प्रयोग करे।

Verse 29

ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय चिः अमलकण्ठाय चिः सर्वज्ञकण्ठाय चिः क्षिप ॐ स्वाहा अमलनीलकण्ठाय नैकसर्वविषापहाय नमस्ते रुद्रमन्यव इतिसर्मार्जनाद्विषं विनश्यति न सन्देहः कर्णजाप्या उपानहावा यजेद्रुद्रविधानेन नीलग्रीवं महेश्वरम् विषव्याधिविनाशः स्यात् कृत्वा रुद्रविधानकं

“ॐ—भगवान नीलकंठ को नमस्कार। ‘चिः’—अमलकंठ को। ‘चिः’—सर्वज्ञकंठ को। ‘क्षिप’। ॐ स्वाहा। निर्मल नीलकंठ को, जो अनेक तथा समस्त विषों का अपहर्ता है, नमः। ‘नमस्ते रुद्रमन्यव’ का जप और सर्मार्जन (शुद्धि-मार्जन) करने से विष नष्ट होता है—इसमें संदेह नहीं। इसे कान में जप (कर्णजाप) करके उपानहाव (रक्षा-बन्ध/ताबीज-विधि) में भी प्रयोग करें। रुद्र-विधान से नीलग्रीव महेश्वर की पूजा करे; रुद्र-विधानक करने पर विषजन्य व्याधियों का विनाश होता है।”

Frequently Asked Questions

A structured anti-poison protocol combining (1) poison taxonomy (jaṅgama/sthāvara), (2) mantra sets (kavaca/astra/bīja), (3) mātṛkā-ambuja visualization and maṇḍala inscription, and (4) precise nyāsa placements on finger-phalanxes and bodily joints with elemental color-shape-deity correspondences.

It frames healing as dharma-sādhana: devotion to Nīlakaṇṭha/Rudra and disciplined mantra-dhyāna are presented as life-protecting powers, aligning medical action (bhukti) with purity, restraint, and sacred speech that support inner steadiness and spiritual progress (mukti).