
Aśvāyurveda (Medical Science of Horses)
यह अध्याय अग्निपुराण के विश्वकोशीय पाठ्यक्रम में पशु-चिकित्सा के विशेष क्षेत्र ‘अश्वायुर्वेद’ का शीर्षक-सेतु बनकर प्रवेश कराता है। आग्नेय विद्या की परंपरा में घोड़ों की देखभाल केवल उपयोगिता नहीं, बल्कि आजीविका, गतिशीलता तथा राजकीय/सामुदायिक स्थिरता की रक्षा द्वारा धर्म-पालन करने वाली मान्य विद्या मानी गई है। अध्याय का स्थान संकेत देता है कि पुराण का चिकित्साज्ञान मानव-उपचार तक सीमित नहीं, बल्कि प्रजाति-विशिष्ट स्वास्थ्य-प्रबंधन तक विस्तृत है, जो आगे आने वाली विधि और शान्तिकर्म-प्रधान प्रक्रियाओं की भूमिका तैयार करता है। यहाँ तकनीकी निर्देश भी पवित्र ज्ञान के रूप में रखे गए हैं—जहाँ सही आचरण, सही समय और सही संकल्प से देह-कल्याण का सामंजस्य विश्व-व्यवस्था से होता है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे अश्वायुर्वेदो नामाष्टाशीत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथोननवत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः अश्वशान्तिः शालिहोत्र उवाच अश्वशान्तिं प्रवक्ष्यामि वजिरोगविमर्दनीं नित्यां नैमित्तकीं कम्यां त्रिविधां शृणु सुश्रुत
इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘अश्वायुर्वेद’ नामक दो सौ नवासीवाँ अध्याय (समाप्त) हुआ। अब दो सौ नब्बेवाँ अध्याय ‘अश्वशान्ति’ आरम्भ होता है। शालिहोत्र बोले—मैं अश्वों के रोगों का नाश करने वाली अश्वशान्ति बताऊँगा; वह नित्य, नैमित्तिक और काम्य—तीन प्रकार की है। हे सुश्रुत, सुनो।
Verse 2
शुभे दिने श्रीधरञ्च श्रियमुच्चैःश्रवाश् च तं हयराजं समभ्यर्च्य सावित्रैर् जुजुयाद्घृतं
शुभ दिन में श्रीधर (विष्णु), श्री (लक्ष्मी) और हयराज उच्चैःश्रवस् की विधिवत् पूजा करके, सावित्री (गायत्री) मन्त्रों से अग्नि में घृत की आहुति दे।
Verse 3
द्विजेभ्यो दक्षिणान्दद्यादश्ववृद्धिस् तथा भवेत् अश्वयुक् शुक्लपक्षस्य पञ्चदश्याञ्च शान्तिकं
द्विजों (ब्राह्मणों) को दक्षिणा दे; इससे अश्वों की वृद्धि होती है। और अश्वयुज मास के शुक्लपक्ष की पञ्चदशी (पूर्णिमा) को शान्तिक कर्म भी कराए।
Verse 4
वहिः कुर्याद्विशेषेण नासत्यौ वरुणं यजेत् समुल्लिख्य ततो देवीं शाखाभिः परिवारयेत्
विशेष सावधानी से वेदी-परिसर के बाहर आहुति करे; नासत्यौ (अश्विनीकुमार) और वरुण का पूजन करे। फिर भूमि/मण्डल को स्पष्ट रेखांकित करके देवी को शाखाओं से घेरकर रक्षावृत्त बनाए।
Verse 5
घतान्सर्वरसैः पूर्णान् दिक्षु दद्यात्सवस्त्रकान् यवाज्यं जुहुयात् प्रार्च्य यजेदश्वांश् च साश्विनान्
सब प्रकार के रसों से भरे घड़े, वस्त्रों सहित, आठों दिशाओं में अर्पित करे। पहले विधिवत् पूजन करके जौ और घृत-मिश्रित आहुति अग्नि में दे; और अश्विन-देवताओं सहित अश्वों का भी यजन/पूजन करे।
Verse 6
विप्रेभ्यो दक्षिणान्दद्यान्नैमित्तिकमतः शृणु मकरादौ हयानाञ्च पद्मैर् विष्णुं श्रियं यजेत्
ब्राह्मणों को दक्षिणा दे। अब नैमित्तिक कर्म का विधान सुनो। मकर (मकर-संक्रान्ति) के आरम्भ में, तथा अश्विनी नक्षत्र के आरम्भ में भी, कमल-पुष्पों से विष्णु और श्री (लक्ष्मी) का पूजन करे।
Verse 7
ब्रह्माणं शङ्करं सोममादित्यञ्च तथाश्विनौ रेवन्तमुच्चैःश्रवसन्दिक्पालांश् च दलेष्वपि
कमल-दलों पर भी ब्रह्मा, शंकर (शिव), सोम (चन्द्र), आदित्य (सूर्य), दोनों अश्विन, रेवंत, उच्चैःश्रवस् तथा दिक्पालों का भी स्थापना/आवाहन करे।
Verse 8
प्रत्येकं पूर्णकुम्भैश् च वेद्यान्तत्सौम्यतः स्थले तिलाक्षताज्यसिद्धार्थान् देवतानां शतं शतं उपोषितेन कर्तव्यं कर्म चास्वरुजापहं
प्रत्येक स्थान पर वेदी के किनारे, शुभ (सौम्य) पक्ष में, पूर्णकुम्भ स्थापित करे। तिल, अक्षत, घृत और सिद्धार्थ (श्वेत सरसों) से देवताओं के लिए सैकड़ों-सैकड़ों आहुतियाँ/अर्पण करे; उपवासपूर्वक किया गया यह कर्म पीड़ा और रोग का नाशक होता है।
It marks the beginning of Aśvāyurveda, establishing veterinary Ayurveda—specifically horse medicine—as a recognized Agneya Vidya within the Purana’s encyclopedic system.
By presenting health-care knowledge as dharmic practice: protecting life and social order (bhukti) while cultivating disciplined, ritually aligned action that supports inner refinement (mukti).