Adhyaya 283
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Adhyaya 283

Chapter 283 — Mantras as Medicine (मन्त्ररूपौषधकथनम्)

इस अध्याय में धन्वन्तरि मन्त्र-चिकित्सा को औषध के रूप में स्थापित करते हैं। आयु, आरोग्य और विशेष परिस्थितियों में रक्षा हेतु पवित्र ध्वनि को प्रत्यक्ष उपचार कहा गया है। ‘ॐ’ को परम मन्त्र और गायत्री को भुक्ति-मुक्ति देने वाली बताकर यह सिद्धान्त रखा गया है कि स्वास्थ्य और मोक्ष परस्पर सहचर फल हैं। आगे विष्णु/नारायण मन्त्रों तथा नाम-जप को प्रसंगानुसार उपाय बताया गया है—विजय, विद्या, भय-निवारण, नेत्र-रोग शमन, युद्ध में सुरक्षा, जल-उत्तीर्ण होना, दुःस्वप्न से रक्षा, तथा दाह आदि संकटों में सहायता। फिर एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर सर्वभूत-हित और धर्म को ‘महौषध’ कहा गया, अर्थात् नैतिक आचरण ही उपचार का मूल अंग है। अंत में कहा है कि एक भी दिव्य नाम, विधिपूर्वक प्रयुक्त हो, तो इच्छित चिकित्सा या संरक्षण सिद्ध कर देता है।

Shlokas

Verse 1

आनि नाम द्व्यशीत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः पञ्चविशतिरिति ञ , ट च कर्पूरजहुकातैलमिति ख कर्पूरजानुकातैलमिति ज अथ त्र्यशीत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः मन्त्ररूपौषधकथनं धन्वन्तरिर् उवाच आयुरारोग्यकर्तर ओंकारद्याश् च नाकदाः ओंकारः परमो मन्त्रस्तं जप्त्वा चामरो भवेत्

अब दो सौ तिरासीवाँ अध्याय ‘मन्त्ररूप औषध-कथन’ आरम्भ होता है। धन्वन्तरि बोले—‘ॐकार और ॐ से आरम्भ होने वाले मंत्र आयु और आरोग्य देने वाले हैं तथा साधक को स्वर्ग-स्थिति तक ले जाते हैं। ॐकार परम मंत्र है; उसका जप करने से मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है।’

Verse 2

गायत्री परमो मन्त्रस्तं जप्त्वा भुक्तिमुक्तिभाक् ॐ नमो नारायणाय मन्त्रः सर्वार्थसाधकः

गायत्री परम मंत्र है; उसका जप करने से मनुष्य भोग और मोक्ष—दोनों का भागी होता है। ‘ॐ नमो नारायणाय’ यह मंत्र समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करता है।

Verse 3

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सर्वदः ॐ हूं नमो विष्णवे मन्त्रोयञ्चौषधं परं

‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—जो सब कुछ देने वाले हैं, उन्हें नमस्कार। तथा ‘ॐ हूँ नमो विष्णवे’—विष्णु को नमस्कार। यह मंत्र निश्चय ही परम औषधि है।

Verse 4

अनेन देवा ह्य् असुराः सश्रियो निरुजो ऽभवत् भूतानामुपकारश् च तथा धर्मो महौषधम्

इसी के द्वारा देव और असुर दोनों ही श्रीसम्पन्न और निरोग हुए; तथा प्राणियों का उपकार—यही धर्म—महाऔषधि है।

Verse 5

धर्मः सद्धर्मकृद्धर्मी एतैर् धर्मैश् च निर्मलः श्रीदः श्रीषः श्रीनिवासः श्रीधरःश्रीनिकेतनः

वह स्वयं धर्म है, सद्धर्म का कर्ता है, धर्म का धारक है; इन धर्मों से वह निर्मल है। वह श्री देने वाला, श्री का स्वामी, श्री का निवास, श्री को धारण करने वाला और श्री का धाम है।

Verse 6

श्रियः पतिः श्रीपरम एतैः श्रियमवाप्नुयात् कामी कामप्रदः कामः कामपालस् तथा हरिः

‘श्रियः पति’ और ‘श्रीपरम’—इन नामों के जप से श्री की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ‘कामी’, ‘कामप्रद’, ‘काम’, ‘कामपाल’ तथा ‘हरि’—इनका भी जप करना चाहिए।

Verse 7

आनन्दो माधवश् चैव नाम कामाय वै हरेः रामः परशुरामश् च नृसिंहो विष्णुरेव च

कामनाओं की सिद्धि के लिए हरि के नाम हैं—आनन्द और माधव; तथा राम, परशुराम, नृसिंह और विष्णु भी।

Verse 8

त्रिविक्रमश् च नामानि जप्तव्यानि जिगीषुभिः विद्यामभ्यस्यतां नित्यं जप्तव्यः पुरुषोत्तमः

विजय चाहने वालों को त्रिविक्रम के नामों का जप करना चाहिए; और जो नित्य विद्या का अभ्यास करते हैं, उन्हें पुरुषोत्तम का निरन्तर जप करना चाहिए।

Verse 9

दामोदरो बन्धहरः पुष्कराक्षो ऽक्षिरोगनुत् हृषीकेशो भयहरो जपेदौषधकर्मणि

औषध-क्रिया के समय जप करे—दामोदर (बंधन-हर), पुष्कराक्ष (कमल-नेत्र), नेत्र-रोग-नाशक, और हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी), भय-हर।

Verse 10

अच्युतञ्चामृतं मन्त्रं सङ्ग्रामे चापराजितः जलतारे नारसिंहं पूर्वादौ क्षेमकामवान्

जो क्षेम चाहता है वह ‘अच्युत’ और ‘अमृत’ मन्त्र का जप करे; और संग्राम में ‘अपराजित’ (मन्त्र)। जल पार करने हेतु ‘नारसिंह’; तथा पूर्व आदि दिशाओं में भी क्षेम-इच्छा से (इनका) जप करे।

Verse 11

चक्रिणङ्गदिनञ्चैव शार्ङ्गिणं खड्गिनं स्मरेत् नारायणं सर्वकाले नृसिंहो ऽखिलभीतिनुत्

चक्र और गदा धारण करने वाले, शार्ङ्ग (धनुष) धारी और खड्ग धारी प्रभु का स्मरण करे; सर्वदा नारायण का स्मरण करे—नृसिंह, जो समस्त भय का नाशक है।

Verse 12

गरुडध्वजश् च विषहृत् वासुदेवं सदाजपेत् धान्यादिस्थापने स्वप्ने अनन्ताच्युतमीरयेत्

‘गरुड़ध्वज’ और ‘विषहृत’ नामों का नित्य जप करे और ‘वासुदेव’ का सदा स्मरण-उच्चारण करे। धान्य आदि के भंडारण के समय तथा स्वप्न में ‘अनन्त’ और ‘अच्युत’ नामों का उच्चार करे।

Verse 13

नारायणञ्च दुःस्वप्ने दाहादौ जलशायिनं हयग्रीवञ्च विद्यार्थी जगत्सूतिं सुताप्तये बलभद्रं शौरकार्ये एकं नामार्थसाधकम्

दुःस्वप्न होने पर ‘नारायण’ का स्मरण करे; दाह आदि संकट में ‘जलशायी’ (विष्णु) का स्मरण करे। विद्यार्थी ‘हयग्रीव’ का स्मरण करे; पुत्र-प्राप्ति हेतु ‘जगत्सूती’ (जगत्-माता) का स्मरण करे। शौर्य-कार्य में ‘बलभद्र’ का स्मरण करे। इस प्रकार एक ही दिव्य नाम से अभिप्रेत फल सिद्ध होता है।

Frequently Asked Questions

The chapter gives a purpose-specific mapping of mantras and Viṣṇu-names to applied contexts (medicinal procedure, eye-disease, fear, battle, water-crossing, nightmares, fire danger, learning, progeny, valor), treating mantra-selection as a functional therapeutic protocol.

It explicitly links health and protection practices to bhukti-mukti: Oṃ and Gāyatrī are framed as salvific, while dharma and compassion are called the ‘great medicine,’ making ethical devotion and disciplined recitation part of a unified sādhanā.