Nahūṣa’s Pride, the Ṛṣi-Borne Palanquin, and the Search for Indra (नहुष-इन्द्राणी-प्रकरणम्)
मयि क्ुद्धे जगन्न स्यान्मयि सर्व प्रतिष्ठितम् । देवदानवगन्धर्वा: किन्नरोरगराक्षसा:,मेरे कुपित होनेपर यह संसार मिट जायगा। मुझपर ही सब कुछ टिका हुआ है। शुचिस्मिते! यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो यह देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस और सम्पूर्ण लोक मेरा सामना नहीं कर सकते हैं। मैं अपनी आँखसे जिसको देख लेता हूँ, उसका तेज हर लेता हूँ
mayi kruddhe jagan na syān mayi sarvaṁ pratiṣṭhitam | devadānavagandharvāḥ kinnaroragarākṣasāḥ ||
નહુષ બોલ્યા—હું ક્રોધિત થાઉં તો જગત્ જ ન રહે; સર્વ કંઈ મારે ઉપર જ પ્રતિષ્ઠિત છે. દેવ, દાનવ, ગંધર્વ, કિન્નર, નાગ અને રાક્ષસ—કોઈ પણ મારો સામનો કરી શકશે નહીં।
नहुष उवाच