ययातिपतन-कारणम् (The Cause of Yayāti’s Fall) — Nārada’s Counsel on Pride and Reconciliation
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्याभरणभूषित: । दिव्यगन्धगुणोपेतो न पृथ्वीमस्पृशत् पदा,नारदजी कहते हैं--उन सत्पुरुषोंके द्वारा पहचाने जानेमात्रसे नरश्रेष्ठ राजा ययाति पृथ्वीतलका स्पर्श न करते हुए ऊपरकी ओर उठने लगे। उस समय उनकी आकृति दिव्य हो गयी थी। वे शोक और चिन्तासे रहित थे। उन्होंने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। दिव्य आभूषण उनके अंगोंकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वे दिव्य सुगन्धसे सुवासित हो रहे थे। वे अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे थे
divyamālyāmbaradharo divyābharaṇabhūṣitaḥ | divyagandhaguṇopeto na pṛthvīm aspṛśat padā ||
તેઓ દિવ્ય માળા અને દિવ્ય વસ્ત્ર ધારણ કરેલા, દિવ્ય આભૂષણોથી ભૂષિત, દિવ્ય સુગંધ અને ગુણથી યુક્ત હતા; તેમના પગ પૃથ્વીને સ્પર્શતા ન હતા.
नारद उवाच