माधवी-प्रदानम् (Mādhavī Offered to Gālava) — Udyoga Parva 113
असकृत् तेन चोक्तेन किंचिदागतमन्युना । अयमुक्त: प्रयच्छेति जानता विभवं लघु,“इनके बार-बार आग्रह करनेपर विश्वामित्रजीको कुछ क्रोध आ गया; अत: इनके पास धनका अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा--“लाओ, गुरुदक्षिणा दो। गालव! मुझे अच्छी जातिमें उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अंगकान्ति चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और कान एक ओरसे श्याम रंगके हों। गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो।” तपोधन विश्वामित्रने यह बात कुपित होकर ही कही थी
asakṛt tena coktena kiñcid āgatamanyunā | ayam uktaḥ prayaccheti jānatā vibhavaṁ laghu ||
વારંવાર વિનંતી કરતાં તેમના મનમાં થોડો ક્રોધ આવ્યો; અને તેની અલ્પ સંપત્તિ જાણતા હોવા છતાં તેમણે કહ્યું—“આપ—ગુરુદક્ષિણા લાવો.”
नारद उवाच