राजधर्मप्रश्नः — Yudhiṣṭhira’s Inquiry into Rājadharma (Śānti-parva 56)
अत-#-#क्त षट्पज्चाशत्तमो<5 ध्याय: युधिष्ठटिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष वैशम्पायन उवाच प्रणिपत्य हृषीकेशमभिवाद्य पितामहम् । अनुमान्य गुरून् सर्वान् पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मको प्रणाम करके युधिष्ठिरने समस्त गुरुजनोंकी अनुमति ले इस प्रकार प्रश्न किया इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षट्पञ्चाशत्तमो<5 ध्याय: ।। ५६ || इस प्रकार श्रीमह्या भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वनें छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १६ ॥। हि 7 छा आप >फअटार:-ह > व्यसन अठारह प्रकारके बताये गये हैं। इनमें दस तो कामज हैं, और आठ क्रोधज। शिकार, जूआ, दिनमें सोना, परनिन्दा, स्त्रीसेवन, मद, वाद्य, गीत, नृत्य और मदिरापान--ये दस कामज व्यसन बताये गये हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता--ये आठ क्रोधज व्यसन कहे गये हैं। सप्तपञ्चाशत्तमोड ध्याय: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन भीष्म उवाच नित्योद्युक्तेन वै राज्ञा भवितव्यं युधिष्ठिर । प्रशस्यते न राजा हि नारीवोद्यमवर्जित:
vaiśampāyana uvāca | praṇipatya hṛṣīkeśam abhivādya pitāmaham | anumānya gurūn sarvān paryapṛcchad yudhiṣṭhiraḥ ||
વૈશંપાયન બોલ્યા—રાજન! ત્યારબાદ યુધિષ્ઠિરે હૃષીકેશ (શ્રીકૃષ્ણ)ને પ્રણામ કર્યા, પિતામહ ભીષ્મને અભિવાદન કર્યું અને ત્યાં ઉપસ્થિત સર્વ ગુરુજનોની અનુમતિ મેળવી આ રીતે પ્રશ્ન કર્યો.
वैशम्पायन उवाच
Before seeking guidance on statecraft and dharma, the king must approach knowledge with humility, proper respect to spiritual and moral authorities, and with the community of elders’ consent—signaling that righteous rule begins with disciplined inquiry and reverence.
Vaiśampāyana narrates that Yudhiṣṭhira bows to Kṛṣṇa and Bhīṣma, receives the approval of the assembled elders, and then formally asks his question—setting the stage for Bhīṣma’s discourse on rajadharma in the Shānti Parva.