Kṛṣṇa’s Dhyāna and the Prompt to Question Bhīṣma (कृष्णध्यानं भीष्मप्रश्नप्रेरणा च)
सुग्रीवशैब्यप्रमुखैर्वरा श्वै- मनोजवै: काञ्चनभूषिताड्रैः । संयुक्तमावेदयदच्युताय कृताञ्जलिदररुिको राजसिंह,राजसिंह! सात्यकिका यह वचन सुनकर दारुकने मरकत, चन्द्रकान्त तथा सूर्यकान्त मणियोंकी ज्योतिर्मयी तरंगोंसे विभूषित उस उत्तम रथको, जिसका एक-एक अंग सुनहरे साजोंसे सजाया गया था तथा जिसके पहियोंपर सोनेके पत्र जड़े गये थे, जोतकर तैयार किया और हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णको इसकी सूचना दी। वह शीघ्रगामी रथ सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे उद्धासित हो तुरंतके उगे हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता था, उसके भीतरी भागको नाना प्रकारकी विचित्र मणियोंसे विभूषित किया गया था। वह प्रतापी रथ विचित्र गरुड़चिह्लित ध्वजा और पताकासे सुशोभित था। उसमें सोनेके साजबाजसे सजे हुए अंगोंवाले, मनके समान वेगशाली, सुग्रीव और शैब्य आदि सुन्दर घोड़े जुते हुए थे
vaiśampāyana uvāca |
sugrīva-śaibya-pramukhair varāśvaiḥ manojavaiḥ kāñcana-bhūṣitāṅgaiḥ |
saṃyuktam āvedayad acyutāya kṛtāñjalir dāruko rāja-siṃha ||
સુગ્રીવ, શૈબ્ય વગેરે મુખ્ય શ્રેષ્ઠ અશ્વોથી—મન સમા વેગવાળા અને સોનાના આભૂષણોથી શોભિત—યુક્ત તે રથ તૈયાર થયો છે, એવી જાણ દારુકે હાથ જોડીને અચ્યૂત (શ્રીકૃષ્ણ)ને કરી, હે રાજસિંહ।
वैशम्पायन उवाच