कपिल–स्यूमरश्मि संवादः
Kapila and Syūmaraśmi on Renunciation, Householder Support, and Epistemic Authority
एक समयकी बात है, ऋषियों और यतियोंने राजा नहुषके पास जाकर निवेदन किया कि तुमने माता गौ और प्रजापति वृषभका वध किया है, नहुष! यह तुम्हारे द्वारा न करनेयोग्य पापकर्म किया गया है, तुम्हारे इस कुकृत्यके कारण हम सब लोगोंको बड़ी व्यथा हो रही है। जाजले! ऐसा कहकर नहुषके द्वारा प्रशंसित उन महाभाग ऋषियोंने पापको एक सौ एक रोगोंके रूपमें परिणत करके समस्त प्राणियोंपर डाल दिया, राजा नहुषको भ्रूणहत्यारा बताया और स्पष्ट कह दिया कि हमलोग तुम्हारे यज्ञमें हविष्यकी आहुति नहीं देंगे ।। इत्युक्त्वा ते महात्मान: सर्वे तत्त्वार्थदर्शिन: । ऋषयो यतय: शान्तास्तपसा प्रत्यवेदयन्,ऐसा कहकर उन समस्त तत्त्वार्थदर्शी महात्माओंने तपस्या (ध्यान) द्वारा सारी बातें जान लीं और नहुषके अज्ञानवश वह पाप होनेके कारण उन्हें निर्दोष पाकर वे सब ऋषि और यति शान्त हो गये
ity uktvā te mahātmānaḥ sarve tattvārthadarśinaḥ | ṛṣayo yatayaḥ śāntās tapasā pratyavedayan ||
આ રીતે કહીને તે સર્વ મહાત્માઓ—તત્ત્વાર્થદર્શી, શાંત ઋષિ અને યતિઓ—તપસ્યા તથા ધ્યાનબળથી સમગ્ર વિષયને યથાર્થ રીતે જાણી ગયા. તેમણે સમજ્યું કે નહુષનો દોષ અજ્ઞાનવશ થયો હતો; જાણબૂઝીને પાપ કરવાનો સંકલ્પ નહોતો. તેથી તે દૃષ્ટિએ તેને નિર્દોષ માની તેઓ સૌ શાંત થયા.
तुलाधार उवाच