ब्राह्मणस्य पूर्वतरा वृत्तिः — The Earlier Ideal Conduct of a Brahmana
River-of-Saṃsāra Metaphor
एकैकस्ते तदा पाश: क्रमश: परिमोक्ष्यते । “महान् असुर! जब प्रजाजनोंका न्यायके विपरीत आचरण होने लगेगा, तब तुम्हारा कल्याण होगा। जब पतोहू बूढ़ी साससे अपनी सेवा-टहल कराने लगेगी और पुत्र भी मोहवश पिताको विभिन्न प्रकारके कार्य करनेके लिये आज्ञा प्रदान करने लगेगा, शूद्र ब्राह्मणोंसे पैर धुलाने लगेंगे तथा वे निर्भय होकर ब्राह्मण जातिकी स्त्रीको अपनी भार्या बनाने लगेंगे, जब पुरुष निर्भय होकर मानवेतर योनियोंमें अपना वीर्य स्थापित करने लगेंगे, जब काँसेके पात्रमें ऊँच जाति और नीच जातिके लोग एक साथ भोजन करने लगेंगे एवं अपवित्र पात्रोंद्वारा देवपूजाके लिये उपहार अर्पित किया जायगा, सारा वर्णधर्म जब मर्यादाशून्य हो जायगा, उस समय क्रमश: तुम्हारा एक-एक पाश (बन्धन) खुलता जायगा ।। अस्मत्तस्ते भयं नास्ति समयं प्रतिपालय । सुखी भव निराबाध: स्वस्थचेता निरामय:,“हमारी ओरसे तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम समयकी प्रतीक्षा करो और निर्बाध, स्वस्थचित्त एवं रोगरहित हो सुखसे रहो”
ekaikaḥ te tadā pāśaḥ kramaśaḥ parimokṣyate | asmattaḥ te bhayaṃ nāsti samayaṃ pratipālaya | sukhī bhava nirābādhaḥ svasthacetā nirāmayaḥ |
ભીષ્મે કહ્યું—ત્યારે ક્રમશઃ તારો એક-એક બંધન છૂટતો જશે. અમારી તરફથી તને કોઈ ભય નથી; નિર્ધારિત સમયની રાહ જો. નિર્વિઘ્ન, સ્થિરચિત્ત અને નિરામય રહી સુખથી જીવ.
भीष्म उवाच