इन्द्र–बलि संवादः
The Dialogue of Indra and Bali on Fortune, Humility, and Restraint
अत्राह को न्वयं भाव: स्वप्ने विषयवानिव । प्रलीनैरिन्द्रियैदेही वर्तते देहवानिव,यहाँ पूर्व पक्ष यह प्रश्न उठाता है कि स्वप्नमें जो यह देहादि पदार्थ दिखायी देता है, क्या है? (सत्य है या असत्य? यदि कहें कि सत्य है तो ठीक नहीं; क्योंकि) स्वप्रावस्थामें सब कुछ विषयोंसे सम्पन्न-सा दिखायी देनेपर भी वास्तवमें वहाँ कोई विषय नहीं होता, सारी इन्द्रियाँ उस समय मनमें विलीन हो जाती हैं। उन्हीं इन्द्रियोंसे देहाभिमानी जीव देहधारी- जैसा बर्ताव करता है। और यदि कहें कि स्वप्नके पदार्थ असत्य हैं तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जो सर्वथा असत् है, (जैसे आकाशका पुष्प) उसकी प्रतीति ही नहीं होती
atrāha ko nv ayaṃ bhāvaḥ svapne viṣayavān iva | pralīnair indriyaiḥ dehī vartate dehavān iva ||
અહીં શંકા ઊભી થાય છે—સ્વપ્નમાં વિષયોથી યુક્ત જેવો અનુભવ દેખાય છે, તેનું સ્વરૂપ શું છે? કારણ કે તે સમયે ઇન્દ્રિયો લય પામેલી હોય છે, છતાં દેહી જાણે દેહવાન્ બની વિષયોમાં વિચરે છે. તેથી સ્વપ્નને ન તો સહેલાઈથી સત્ય કહી શકાય, ન અસત્ય—આ જ વિષય સ્પષ્ટ કરવા પૂછાય છે.
भीष्म उवाच