Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation
अब दूसरे प्रायश्षित्तोंका भी क्रमश: वर्णन करता हूँ। अनजानमें कीड़ों-मकोड़ोंका वध आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करे। इतनेहीसे उसकी शुद्धि हो जाती है। गोवधके सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमेंसे प्रत्येकके लिये एक-एक वर्षतक व्रतका आचरण करे। श्रोत्रियकी पत्नीसे व्यभिचार करनेपर तीन वर्षतक और अन्य परस्त्रियोंसे समागम करनेपर दो वर्षोतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए दिनके चौथे पहरमें एक बार भोजन करे। अपने लिये पृथक् स्थान और आसनकी व्यवस्था रखते हुए घूमता रहे। दिनमें तीन बार जलसे स्नान करे। ऐसा करनेसे ही वह अपने उपर्युक्त पापोंका निवारण कर सकता है। जो अग्निको भ्रष्ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्रित्त है ।। ५९ ज:5३ || त्यजत्यकारणे यश्न पितरं मातरं गुरुम् । पतित: स्यात्स कौरव्य यथा धर्मेषु निश्चय:
tyajaty akāraṇe yajñaṃ pitaraṃ mātaraṃ gurum | patitaḥ syāt sa kauravya yathā dharmeṣu niścayaḥ ||
ભીષ્મે કહ્યું—હે કૌરવ્ય! જે અકારણ યજ્ઞનો ત્યાગ કરે છે અને પિતા, માતા અથવા ગુરુને છોડે છે, તે પતિત બને છે—ધર્મવિષયે આ જ નિશ્ચિત નિર્ણય છે.
भीष्म उवाच