Saptasārasvata-tīrtha-prasaṅgaḥ | The Saptasārasvata Pilgrimage Account and the Maṅkaṇaka Narrative
कड्कोलैश्न पलाशैश्व करीरै: पीलुभिस्तथा । सरस्वतीतीर्थरुहैस्तरुभिविविधैस्तथा,तदनन्तर हलायुध बलदेवजी सप्तसारस्वत नामक तीर्थमें आये जो सरस्वतीके तीथॉमें सबसे श्रेष्ठ हैं। वहाँ अनेकानेक ब्राह्मणोंके समुदाय निवास करते थे। वेर, इंगुद, काश्मर्य (गम्भारी), पाकर, पीपल, बहेड़े, कंकोल, पलाश, करीर, पीलु, करूष, बिल्व, अमड़ा, अतिमुक्त, पारिजात तथा सरस्वतीके तटपर उगे हुए अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित वह तीर्थ देखनेमें कमनीय और मनको मोह लेनेवाला है। वहाँ केलेके बहुत-से बगीचे हैं। उस तीर्थमें वायु, जल, फल और पत्ते चबाकर रहनेवाले, दाँतोंस ही ओखलीका काम लेनेवाले और पत्थरसे फोड़े हुए फल खानेवाले बहुतेरे वानप्रस्थ मुनि भरे हुए थे। वहाँ वेदोंके स्वाध्यायकी गम्भीर ध्वनि गूँज रही थी। मृगोंके सैकड़ों यूथ सब ओर फैले हुए थे। हिंसारहित धर्मपरायण मनुष्य उस तीर्थका अधिक सेवन करते थे। वहीं सिद्ध महामुनि मंकणकने बड़ी भारी तपस्या की थी
Vaiśampāyana uvāca: kaṅkolaiś ca palāśaiś ca karīraiḥ pīlubhis tathā | sarasvatī-tīrtha-ruhais tarubhir vividhaiḥ tathā ||
વૈશંપાયને કહ્યું—સરસ્વતીના તીર્થપ્રદેશ કંકોલ, પલાશ, કરીર, પીલુ તથા તીર્થની આસપાસ ઉગેલા નાનાવિધ વૃક્ષોથી શોભિત હતા. ત્યારબાદ હલાયુધ બલદેવ સરસ્વતીના તીર્થોમાં શ્રેષ્ઠ ‘સપ્તસારસ્વત’ તીર્થમાં પહોંચ્યા, જ્યાં અનેક બ્રાહ્મણસમુદાયો વસતા હતા।
वैशम्पायन उवाच