अध्याय ६६: पुनर्द्यूत-प्रस्तावः
Proposal for a Renewed Dice Game
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ “लोक मिलाकर कुल ४६३ “लोक हैं) निज जा धन #* षट्षष्टितमो<5 ध्याय: विदुरका दुर्योधनको फटकारना दुर्योधन उवाच एहि क्षत्तद्रौपदीमानयस्व प्रियां भार्या सम्मतां पाण्डवानाम् | सम्मार्जतां वेश्म परैतु शीघ्र तत्रास्तु दासीभिरपुण्यशीला,दुर्योधन बोला--विदुर! यहाँ आओ। तुम जाकर पाण्डवोंकी प्यारी और मनोनुकूल पत्नी द्रौपदीको यहाँ ले आओ। वह पापाचारिणी शीघ्र यहाँ आये और मेरे महलमें झाड़ू लगाये। उसे वहीं दासियोंके साथ रहना होगा
duryodhana uvāca | ehi kṣattad draupadīm ānayāsva priyāṃ bhāryāṃ sammatāṃ pāṇḍavānām | sammārjatāṃ veśma paraitu śīghraṃ tatrāstu dāsībhir apuṇyaśīlā ||
દુર્યોધન બોલ્યો—આવો, ક્ષત્તા (વિદુર)! તમે જઈને પાંડવોની પ્રિય અને સંમત પત્ની દ્રૌપદીને અહીં લઈ આવો. એ પાપાચારિણી તરત જ મારા મહેલમાં ઝાડૂ લગાવે; અને ત્યાં દાસીઓ સાથે રહે।
दुर्योधन उवाच