भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
सम्बन्ध-- इस प्रकार सात्विकी बुद्धि और ध्ृतिका ग्रहण तथा राजसी-तामसीका त्याग करनेके लिये बुद्धि और धृतिके सात्तिक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब जिसके लिये मनुष्य समस्त कर्म करता है; उस सुखके भी सात्विक, राजस और तामस--इस प्रकार तीन भेद क्रमसे बतलाते हैं-- सुखं तल्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद् रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति,हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसे सुन। जिस सुखमें साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादिके अभ्याससे रमण करता है* और जिससे दु:खोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है*-- जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकालमें यद्यपि विषके तुल्य प्रतीत होता है,* परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है;* इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाला सुख+ सात्त्विक कहा गया है
sukhaṁ tv idānīṁ trividhaṁ śṛṇu me bharatarṣabha | abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ ca nigacchati ||
હે ભરતશ્રેષ્ઠ! હવે સુખના પણ ત્રણ પ્રકાર તું મારી પાસેથી સાંભળ. જે સુખમાં સાધક મનુષ્ય અભ્યાસથી રમણ કરે છે અને જેના દ્વારા દુઃખનો અંત પ્રાપ્ત કરે છે—
अजुन उवाच