Śraddhā–Guṇa–Vibhāga Yoga (Faith and the Three Guṇas) — Mahābhārata Book 6, Chapter 39
सम्बन्ध--इस अध्यायके तीसरे शलोकमें भगवानने क्षेत्रके विषयमें चार बातें और क्षेत्रञके विषयमें दो बातें संक्षेपें सुननेके लिये अर्जुनसे कहा था, फिर विषय आरम्भ करते ही क्षेत्रके स््व्छपका और उसके विकारोंका वर्णन करनेके अनन्तर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके तत्वको भलीभाँति जाननेके उपायभूत साधनोंका और जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन प्रयसंगवश किया गया। इससे क्षेत्रके विषयमें उसके स्वभावका और किस कारणसे कौन कार्य उत्पन्न होता है; इस विषयका तथा प्रभावसहित क्षेत्रज्के स््वरूपका भी वर्णन नहीं हुआ। अतः: अब उन सबका वर्णन करनेके लिये भगवान् पुनः प्रकृति और पुरुषके नागसे प्रकरण आरम्भ करते हैं-- प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि । विकारांश्व गुणांश्वैव* विद्धि प्रकृतिसम्भवान्
prakṛtiṁ puruṣaṁ caiva viddhy anādī ubhāv api | vikārāṁś ca guṇāṁś caiva viddhi prakṛti-sambhavān ||
પ્રકૃતિ અને પુરુષ—બન્નેને અનાદિ જાણ; અને સમસ્ત વિકારો તથા ગુણો પ્રકૃતિમાંથી જ ઉત્પન્ન થાય છે એમ પણ જાણ.
अजुन उवाच