Adhyāya 32: Tāpasānāṃ Darśanaṃ — Ascetics Seek to Identify the Pāṇḍavas
ततस्तस्य वच: श्रुत्वा श्रद्दधाना वराड़ना: । श्वशुरं समनुज्ञाप्य विविशुर्जाह्नवीजलम्,उन सबके अदृश्य हो जानेपर कौरवोंके हितकारी महातेजस्वी धर्मशील महामुनि व्यासजीने जलमें खड़े-खड़े उन सब विधवा क्षत्राणियोंसे कहा--“देवियो! तुम लोगोंमेंसे जो-जो सती-साध्वी स्त्रियाँ अपने-अपने पतिके लोकको जाना चाहती हों, वे आलस्य त्यागकर तुरंत गड़ाजीके जलमें गोता लगावें।” उनकी बात सुनकर उनमें श्रद्धा रखनेवाली वे सती स्त्रियाँ अपने श्वशुर धृतराष्ट्रकी आज्ञा ले गड़ाजीके जलमें समा गयीं
tatas tasya vacaḥ śrutvā śraddadhānā varāṅganāḥ | śvaśuraṃ samanujñāpya viviśur jāhnavī-jalam ||
પછી તેનું વચન સાંભળી શ્રદ્ધાથી ભરેલી તે શ્રેષ્ઠ સ્ત્રીઓએ શ્વશુરની અનુમતિ લઈને જાહ્નવી (ગંગા)ના જળમાં પ્રવેશ કર્યો.
वैशम्पायन उवाच