Adhyaya 69
Adi ParvaAdhyaya 6933 Verses

Adhyaya 69

Śakuntalā’s Satya-Discourse and the Recognition of Bharata (शकुन्तला–सत्योपदेशः; भरतप्रतिग्रहः)

Upa-parva: Śakuntalopākhyāna (Duḥṣanta–Śakuntalā Episode)

Chapter 69 presents Śakuntalā’s structured ethical critique of Duḥṣanta’s refusal to acknowledge their son. She opens with a perception-based rebuke—seeing others’ minor faults while ignoring one’s own—then develops illustrative analogies (mirror imagery; the swine and the swan separating impurity from essence) to distinguish the foolish from the discerning in moral speech. The discourse shifts to rājadharma and filial duty: abandoning one’s son undermines prosperity, reputation, and posthumous welfare, while truth is elevated above ritual magnitude (truth outweighing vast sacrificial merit). Śakuntalā warns that falsehood severs association and asserts her son’s capacity to rule even without Duḥṣanta. The narrative then introduces Vaiśaṃpāyana’s frame: a bodiless celestial voice validates Śakuntalā’s claim, instructs acceptance, and assigns the name Bharata (linked to “bearing/supporting”). Duḥṣanta explains his earlier hesitation as concern for public doubt, then formally embraces the child and honors Śakuntalā. The chapter concludes with Bharata’s consecration and a genealogical-ideological bridge: Bharata’s fame becomes an eponym for the Bhārata lineage and the epic’s civilizational identity.

Chapter Arc: Janamejaya, eager to know how the lion among men obtained Shakuntala, asks Vaishampayana for the full account—thus the tale turns from genealogy to a living scene of pursuit and fate. → Vaishampayana describes King Dushyanta setting out with a vast retinue—warriors in varied arms and attire, conches and kettledrums resounding—entering the forest for the royal hunt. The chase scatters herds, dries throats with dust and thirst, and turns the woodland into a tumult where beasts and men collide. → In the thick of the hunt, Dushyanta’s prowess blazes: he cuts down charging threats with sword and spear, whirls the mace with practiced mastery, and the forest itself seems overrun by elephants and storm-like volleys—until the king stands as the axis of the chaos, feared by beasts and admired by onlookers who liken him to Indra. → The chapter settles with the image of Dushyanta’s irresistible might and royal momentum established—his hunt has become the narrative engine that will carry him toward the encounter destined to change his lineage. → The king’s onward movement into the forest points toward the imminent meeting with Shakuntala, left just beyond the chapter’s threshold.

Shlokas

Verse 1

अपन बक। है २ >> $. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना 'प्रक्षे' कहलाता है। २. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना “विक्षेप” कहा गया है। ३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना “परिक्षेप” है। ४. गदाके अग्रभागसे मारना “अभिक्षेप” कहलाता है। एकोनसप्ततितमो<ध्याय: दुष्पन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना जनमेजय उवाच सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामते: । शकुन्तलाय श्रोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः,जनमेजय बोले--ब्रह्मन! मैं परम बुद्धिमान्‌ भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ

જનમેજય બોલ્યો—હે મહામતે! હું ભરતની ઉત્પત્તિ અને ચરિત્ર તથા શકુન્તલાની ઉત્પત્તિનો પ્રસંગ પણ તત્ત્વથી સાંભળવા ઇચ્છું છું।

Verse 2

दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला | त॑ वै पुरुषसिंहस्य भगवन्‌ विस्तरं त्वहम्‌

હે ભગવન્! તે પુરુષસિંહ વીરસ્વરૂપ દુષ્યન્તે જે રીતે શકુન્તલાને પ્રાપ્ત કરી, તેનું વિસ્તૃત વર્ણન કરો।

Verse 3

वैशम्पायन उवाच स कदाचिन्महाबाहु: प्रभूतनलवाहन:,वैशम्पायनजीने कहा--एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—એક વખત મહાબાહુ, શ્રીમાન રાજા દુષ્યન્ત બહુ સૈન્ય અને વાહનો સાથે, સૈકડો હાથી-ઘોડાઓથી ઘેરાયેલો, અતિ સુંદર ચતુરંગિણી સેના લઈને એક ઘન વનમાં ગયો।

Verse 4

वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृत: । बलेन चतुरज्जेण वृत: परमवल्गुना,वैशम्पायनजीने कहा--एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले

વૈશમ્પાયને કહ્યું—એક વખત મહાબાહુ રાજા દુષ્યંત પરમ સુંદર ચતુરંગિણી સેનાસહ, સૈકડો હાથી-ઘોડાંથી ઘેરાઈને, ઘન વન તરફ ગયો।

Verse 5

खड्गशक्तिधरैवीरिर्गदामुसलपाणिभि: । प्रासतोमरहस्तैश्व ययौ योधशतैर्वृत:,जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमें लिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे

વૈશમ્પાયને કહ્યું—રાજા જ્યારે યાત્રાએ નીકળ્યા, ત્યારે ખડ્ગ અને શક્તિ ધારણ કરનારા વીર, ગદા અને મુસલ હાથમાં ધરનારા, તેમજ પ્રાસ અને તોમર ધારણ કરનારા—સૈકડો યોદ્ધાઓએ તેમને ઘેરીને આગળ વધ્યા।

Verse 6

सिंहनादैश्व योधानां शड्खदुन्दुभिनि:स्वनै: । रथनेमिस्वनैश्वैव सनागवरबूंहितैः,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

વૈશમ્પાયને કહ્યું—રાજા આગળ વધતાં જ યોદ્ધાઓના સિંહનાદ, શંખ અને દુન્દુભિના નાદ, રથચક્રોની ગર્જના અને મહાગજોના તૂર્યધ્વનિથી ચારે તરફ મહાકોલાહલ થયો।

Verse 7

नानायुधधरैश्वापि नानावेषधरैस्तथा । ह्षितस्वनमिश्रैश्न क्षेगेडितास्फोटितस्वनै:,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

વૈશમ્પાયને કહ્યું—નાનાં આયુધ ધારણ કરનારા અને નાનાં વેષોથી સજ્જ યોદ્ધાઓના હર્ષમિશ્રિત નાદ, રમૂજી ચીત્કાર, તેમજ તાળી અને ભુજાસ્ફોટના અવાજોથી ચારે તરફ મહાકોલાહલ થયો।

Verse 8

आसीत्‌ किलकिलाशब्दस्तस्मिन्‌ गच्छति पार्थिवे । प्रासादवरशृज्गभस्था: परया नृपशो भया,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

વૈશમ્પાયને કહ્યું—તે રાજા આગળ વધતો હતો ત્યારે કિલકિલાનો ઘોષ થયો. શ્રેષ્ઠ પ્રાસાદોના શિખરો પર રહેલી સ્ત્રીઓ રાજશોભાથી પરમ રીતે મોહિત થઈ તે રાજયાત્રાને નિહાળતી હતી।

Verse 9

ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम्‌ | शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम्‌,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

ત્યાં સ્ત્રીઓએ તે શૂરને જોયો—જે પોતાનું યશ વધારનાર, ઇન્દ્રસમાન પરાક્રમી, શત્રુઘ્ન અને શત્રુપક્ષના મત્ત ગજરાજોને રોકનાર હતો; જાણે સિંહબળથી ઉન્મત્ત હાથીઓને દમન કરતો નરાધિપ।

Verse 10

पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं सम मेनिरे । अयं स पुरुषव्यात्रो रणे वसुपराक्रम:

ત્યાં જોતા જોતા સ્ત્રીઓના સમૂહે તેમને વજ્રપાણિ (ઇન્દ્ર) સમાન માન્યા—“આ એ પુરુષવ્યાઘ્ર છે; રણમાં તેનો પરાક્રમ વસુઓ સમાન દુર્ધર્ષ છે.”

Verse 11

इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ता: स्त्रिय: प्रेमणा नराधिपम्‌,ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे

આવી વાતો બોલતાં તે સ્ત્રીઓ પ્રેમથી નરાધિપની સ્તુતિ કરતી અને તેના મસ્તક પર પુષ્પવર્ષા કરતી હતી।

Verse 12

तुष्ठवुः पुष्पवृष्टी क्ष ससृजुस्तस्य मूर्थनि । तत्र तत्र च विप्रेन्द्रै: स्‍्तूयमान: समन्‍्ततः,ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे

તેઓએ તેની સ્તુતિ કરી અને તેના મસ્તક પર પુષ્પવર્ષા કરી. તેમજ ત્યાં ત્યાં ઊભેલા વિપ્રેન્દ્રો પણ સર્વ તરફથી તેની પ્રશંસા કરતા રહ્યા।

Verse 13

निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया । त॑ं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम्‌,इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे

પછી તે પરમ આનંદથી મૃગયા માટે વન તરફ નીકળ્યો—દેવરાજ ઇન્દ્ર સમાન તેજસ્વી—અને મત્ત ગજરાજ પર આરૂઢ થઈ આગળ વધ્યો।

Verse 14

द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे । ददृशुर्वर्धभानास्ते आशीर्भिश्च॒ जयेन च,इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—રાજા જ્યારે નગરમાંથી પ્રસ્થાન કર્યો, ત્યારે બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય, વૈશ્ય અને શૂદ્ર—ચારેય વર્ણોના લોકો તેની પાછળ પાછળ ચાલ્યા. તેઓ શુભ આશીર્વાદો અને ‘જય’ના ઘોષ સાથે તેની તરફ નજર રાખતા રહ્યા અને તેના કલ્યાણ તથા સફળતાની કામના કરતા રહ્યા।

Verse 15

सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा । न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह,नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे-पीछे गये। फिर महाराजकी आज्ञा होनेपर लौट आये

નગરના અને જનપદના લોકો પણ તેને બહુ દૂર સુધી અનુસર્યા. ત્યારબાદ રાજાની આજ્ઞા મળતાં તેઓ પાછા ફર્યા।

Verse 16

सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिप: । महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा,उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान्‌ दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था

પછી વસુધાધિપતિ રાજા ગરુડ સમ વેગવાળા રથ પર આરૂઢ થઈ આગળ વધ્યા. તે રથના ગર્જનથી ધરતી ગુંજી ઊઠી અને જાણે સ્વર્ગ સુધી પ્રતિધ્વનિ પહોંચી।

Verse 17

स गच्छन्‌ ददृशे धीमान्‌ नन्दनप्रतिमं वनम्‌ । बिल्वार्कखदिराकीर्ण कपित्थधवसंकुलम्‌,उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान्‌ दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था

આ રીતે આગળ વધતાં ધીમાન રાજાએ નંદનવન સમાન મનોહર વન જોયું. તે બિલ્વ, આર્ક અને ખદિર વૃક્ષોથી છવાયેલું હતું અને કપીટ્થ તથા ધવ વૃક્ષોથી ઘન ભરેલું હતું।

Verse 18

विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्व समावृतम्‌ । निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम्‌,पर्वतकी चोटीसे गिरे हुए बहुत-से शिला-खण्ड वहाँ इधर-उधर पड़े थे। ऊँची-नीची भूमिके कारण वह वन बड़ा दुर्गग जान पड़ता था। अनेक योजनतक फैले हुए उस वनमें कहीं जल या मनुष्यका पता नहीं चलता था

તે પ્રદેશ ઊબડખાબડ અને દુર્ગમ હતો; પર્વત પરથી ખસી પડેલા શિલાખંડોથી સર્વત્ર ઢંકાયેલો હતો. ત્યાં ન પાણીનું નિશાન હતું, ન માનવનો; અને તે વન અનેક યોજન સુધી વિસ્તરેલું હતું।

Verse 19

मृगसिंहैर्व॒तं घोरैरन्यैश्वापि वनेचरै: । तद्‌ वन॑ मनुजव्याघ्र: सभृत्ययलवाहन:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

વૈશંપાયન બોલ્યા—તે વન સર્વત્ર મૃગો, સિંહો તથા અન્ય ભયંકર વનચર પ્રાણીઓથી ભરેલું હતું. ત્યારે મનુજવ્યાઘ્ર રાજા દુષ્યંત સેવકો, સૈન્ય અને વાહનો સાથે તેમાં પ્રવેશ્યા અને ક્રૂર પશુઓનો શિકાર કરતાં કરતાં વનમાં આગળ વધ્યા. ત્યાં તેમના બાણોની પહોંચમાં આવેલા અનેક વ્યાઘ્રોને તેમણે ધરાશાયી કર્યા.

Verse 20

लोडयामास दुष्यन्त: सूदयन्‌ विविधान्‌ मृगान्‌ । बाणगोचरसपम्प्राप्तांस्तत्र व्याप्रगणान्‌ बहूनू,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

વૈશંપાયન બોલ્યા—રાજા દુષ્યંત વિવિધ પ્રકારના મૃગોને મારતા મારતા વનમાં ફરતા રહ્યા. ત્યાં બાણોની પહોંચમાં આવેલા અનેક વ્યાઘ્રસમૂહોને તેમણે ઢાળી દીધા.

Verse 21

पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकै: । दूरस्थान्‌ सायकै: कांश्चिदभिनत्‌ स नराधिप:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

વૈશંપાયન બોલ્યા—દુષ્યંતે અનેકને પાડી દીધા અને બાણોથી ભેદી નાખ્યા. દૂર રહેલાં કેટલાંકને પણ તે નરાધિપે પોતાના શરોથી ઘાયલ કર્યા.

Verse 22

अभ्याशमागतांश्वान्यान्‌ खड्गेन निरकृन्तत । कांश्चिदेणान्‌ समाजघ्ने शक्‍्त्या शक्तिमतां वर:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

વૈશંપાયન બોલ્યા—નજીક આવેલા કૂતરાં અને અન્ય પશુઓને તે ખડ્ગથી કાપી નાખતા. શક્તિમાનોમાં શ્રેષ્ઠ રાજાએ કેટલાક એણ (હરણ)ને શક્તિ (ભાલા)થી મારી નાખ્યા.

Verse 23

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्व मतिमतां वर । भगवन! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। अतः ये सब बातें बताइये,गदामण्डलतत्त्वज्ञक्ष॒चारामितविक्रम: । तोमरैरसिभिश्वापि गदामुसलकम्पनै: असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

જનમેજય બોલ્યા—હે તત્ત્વજ્ઞ, બુદ્ધિમાનોમાં શ્રેષ્ઠ! હું સર્વ વાત સાંભળવા ઇચ્છું છું. ભગવન, વીરવર દુષ્યંતે શકુંતલાને કેવી રીતે પ્રાપ્ત કરી? મનુષ્યસિંહ દુષ્યંતનું ચરિત્ર હું વિસ્તારે સાંભળવા માગું છું; તેથી આ બધું કહો. (આગળ) અसीમ પરાક્રમી રાજા ગદા ઘુમાવવાની કલામાં નિપુણ હતા. તેઓ તોમર, તલવાર, ગદા અને મુસળના પ્રહારોથી સ્વેચ્છાએ ફરતા જંગલી હાથીઓનો વધ કરતાં કરતાં તે વનમાં વિહરવા લાગ્યા. અદ્ભુત પરાક્રમી નરેશ અને તેમના યુદ્ધપ્રિય સૈનિકોએ તે વિશાળ વનનો ખૂણેખૂણો છાણી નાખ્યો. સિંહ અને વ્યાઘ્ર વન છોડીને ભાગી ગયા. જેમના યુથપતિ માર્યા ગયા હતા તે ઝુંડ ગભરાઈને દોડ્યા; કેટલાંક ઝુંડ આર્તનાદ કરવા લાગ્યા. તરસથી પીડિત થઈ તેઓ સૂકા નદીપાટમાં ગયા, પણ પાણી ન મળતાં નિરાશ થયા; દોડધામના શ્રમથી થાકી મૂર્છિત થઈ જમીન પર પડી ગયા. ભૂખ, તરસ અને થાકથી ચૂર થયેલા અનેક પશુ ધરતી પર છૂટાછવાયા પડ્યા રહ્યા.

Verse 24

चचार स विनिष्नन्‌ वै स्वैरचारान्‌ वनद्विपान्‌ । राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधेश्व समरप्रियै:,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

વૈશંપાયન બોલ્યા—તે ત્યાં સ્વેચ્છાએ ફરતા વનહાથીઓને ઘાયલ કરી પાડી દેતો સર્વત્ર વિચરવા લાગ્યો. અદ્ભુત પરાક્રમી તે રાજાએ યુદ્ધપ્રિય યોધાઓ સાથે મળીને તે મહાવનને ચારે તરફથી છાણી નાખ્યું; રાજબળની એ અતિશયતા વનને પ્રાણીઓ માટે ભયક્ષેત્ર બનાવી ગઈ.

Verse 25

लोड्यमानं महारण्यं तत्यजु: सम मृगाधिपा: । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

વૈશંપાયન બોલ્યા—જ્યારે તે મહાવનને આ રીતે રોંદી ને હાંકી કાઢવામાં આવતું હતું, ત્યારે મૃગાધિપ—સિંહ અને વાઘ—તે છોડીને ભાગી ગયા. ત્યાં અનેક ઝુંડ પોતાના યુથપતિઓના વધથી ગભરાઈ દોડ્યા; અને કેટલાંક વિખેરાયેલા જૂથો વ્યાકુળ થઈ આર્તનાદ કરતા ભાગ્યા.

Verse 26

मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्तत: । शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिता:,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

વૈશંપાયન બોલ્યા—પછી મૃગોના ઝુંડ વ્યાકુળ થઈ સ્થળે સ્થળે વારંવાર ચીસો પાડવા લાગ્યા. અને કેટલાંક પાણીની નિરાશાથી પીડાઈ સૂકી નદીઓના પટ સુધી પણ ગયા; પરંતુ ત્યાં પણ જળ ન મળતાં તેઓ નિરાશાથી વધુ જ ક્ષીણ થયા.

Verse 27

व्यायामक्लान्तह्ृदया: पतन्ति सम विचेतस: । क्षुत्पिपासापरीताश्र श्रान्ताश्न॒ पतिता भुवि,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

વૈશંપાયન બોલ્યા—અતિશ્રમથી જેમના હૃદય થાકી ગયા હતા અને જેમની ચેતના ડગમગી હતી, તે પ્રાણીઓ પડી પડતા હતા. ભૂખ અને તરસથી ઘેરાઈ, અત્યંત થાકીને તેઓ ધરતી પર ઢળી પડતા હતા.

Verse 28

केचित्‌ तत्र नरव्याप्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितै: । केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचरा:,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान्‌ और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे

વૈશંપાયન બોલ્યા—ત્યાં કેટલાંક લોકો ભૂખથી પ્રેરાઈ વાઘ જેવા સ્વભાવવાળા બની, અભક્ષ્ય પણ ખાવા લાગ્યા. અને કેટલાંક વનવાસીઓ અગ્નિ પ્રગટાવી, પોતાની રીત મુજબ ભોજન તૈયાર કરી, તેને રાંધીને ખાવા લાગ્યા.

Verse 29

भक्षयन्ति सम मांसानि प्रकुट्य विधिवत्‌ तदा । तत्र केचिद्‌ गजा मत्ता बलिन: शस्त्रविक्षता:,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान्‌ और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—ત્યારે તે વનપ્રદેશમાં કેટલાકે પોતાની કઠોર રીત મુજબ માંસ તૈયાર કરીને ભક્ષણ કર્યું. ત્યાં કેટલાક બળવાન, મદમત્ત હાથી શસ્ત્રાઘાતથી ક્ષત-વિક્ષત થઈ સૂંઢ સંકોચી ભયથી ઝડપી ભાગવા લાગ્યા.

Verse 30

संकोच्याग्रकरान्‌ भीता: प्रद्रवन्ति सम वेगिता: । शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान्‌ और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे

તેઓ ભયથી આગળનો ભાગ (સૂંઢ) સંકોચી સમાન વેગે દોડ્યા. દોડતાં દોડતાં તેઓ મલ-મૂત્ર છોડતા ગયા અને ઘાવમાંથી ઘણું લોહી વહી રહ્યું હતું.

Verse 31

वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान्‌ बहून्‌ । तद्‌ वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम्‌ | व्यरोचत मृगाकीर्ण राज्ञा हतमृगाधिपम्‌,बड़े-बड़े जंगली हाथियोंने भी वहाँ भागते समय बहुत-से मनुष्योंको कुचल डाला। वहाँ बाणरूपी जलकी धारा बरसानेवाले सैन्यरूपी बादलोंने उस वनरूपी व्योमको सब ओरसे घेर लिया था। महाराज दुष्यन्तने जहाँके सिंहोंको मार डाला था, वह हिंसक पशुओंसे भरा हुआ वन बड़ी शोभा पा रहा था

ત્યાં મહાન જંગલી હાથીઓએ ભાગતાં ભાગતાં અનેક મનુષ્યોને કચડી નાંખ્યા. તે વન જાણે આકાશ—ચારેય તરફથી સેનારૂપી મેઘોથી ઘેરાઈ ગયું હતું, જે બાણોની ધારાઓ વરસાવતાં હતાં. મૃગોથી ભરેલું તે વન વધુ શોભતું હતું, કારણ કે રાજાએ ત્યાંના મૃગાધિપ (સિંહ)ને મારી નાખ્યો હતો.

Verse 69

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने एकोनसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

આ રીતે શ્રીમહાભારતના આદિપર્વના અંતર્ગત સંભવપર્વમાં શકુંતલોપાખ્યાન વિષયક ઓગણસિત્તેરમો અધ્યાય સમાપ્ત થયો.

Verse 103

यस्य बाहुबलं प्राप्प न भवन्त्यसुहृदूगणा: । वहाँ देखती हुई स्त्रियोंने उन्हें वज्रपाणि इन्द्रके समान समझा और आपसमें वे इस प्रकार बातें करने लगीं--“सखियो! देखो तो सही, ये ही वे पुरुषसिंह महाराज दुष्यन्त हैं, जो संग्रामभूमिमें वसुओंके समान पराक्रम दिखाते हैं, जिनके बाहुबलमें पड़कर शत्रुओंका अस्तित्व मिट जाता है”

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—તેણે ત્યાં જોયા પછી સ્ત્રીઓએ તેને વજ્રપાણિ ઇન્દ્ર સમાન માન્યો અને પરસ્પર કહેવા લાગી—“સખીઓ, જુઓ! આ જ તે પુરુષસિંહ રાજા દુષ્યંત છે, જે રણભૂમિમાં વસુઓ સમાન પરાક્રમ દર્શાવે છે; જેના બાહુબળની પહોંચમાં આવ્યા પછી શત્રુઓનું અસ્તિત્વ જ રહેતું નથી.”

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns whether a ruler may deny a privately established relationship and child due to public doubt; the text evaluates this as a conflict between reputation-management and the non-negotiable duty of satya and पुत्रधर्म.

Truth is treated as the highest dharma and a stabilizing public good: discernment in speech, self-scrutiny, and fidelity to one’s obligations are presented as superior to mere external prestige or ritual magnitude.

A formal phalaśruti is not stated; instead, the chapter offers meta-validation through narrative authority (celestial testimony) and genealogical consequence: Bharata’s recognition becomes the legitimizing hinge for the Bhārata lineage and the epic’s historical self-identification.