Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
विशुद्धमिच्छन् गाड़ेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छ॑ पयस्विनीम्,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी
viśuddham icchan gāḍeya dharmopetaṃ pratigraham | antād antaṃ parikramya nādhyagacchaṃ payasvinīm ||
વૈશંપાયન બોલ્યા—હે ગાડેય! ધર્મોપેત વિશુદ્ધ પ્રતિગ્રહની ઇચ્છાથી હું તે દેશને છેડેથી છેડે સુધી ફરી આવ્યો, છતાં દૂધ આપતી કોઈ ગાય મને મળી નહીં.
वैशम्पायन उवाच