Purushottama Yoga — Purushottama Yoga
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि...
adhaś cordhvaṁ prasṛtās tasya śākhā guṇa-pravṛddhā viṣaya-pravālāḥ | adhaś ca mūlāny anusantatāni karmānubandhīni...
તેની શાખાઓ ઉપર અને નીચે ફેલાયેલી છે; તે ત્રણ ગુણોથી પોષાયેલી છે અને વિષય-ભોગ તેના કૂંપળો છે. નીચે તરફ તેની મૂળો પણ વિસ્તરેલી છે, જે મનુષ્યોને કર્મબંધનમાં બાંધે છે.
उस (संसाररूपी अश्वत्थ-वृक्ष) की शाखाएँ ऊपर और नीचे फैली हुई हैं; वे तीनों गुणों से पुष्ट हैं और विषय-भोग उनके कोपल हैं। नीचे की ओर उसकी जड़ें भी फैली हुई हैं, जो मनुष्यों के कर्मों के बन्धन का कारण हैं।
Its branches extend both downward and upward; they are nourished by the guṇas, with sense-objects as their shoots. And its roots extend downward, continuously, functioning as the bonds of action (karma) in the human realm.
अधिकांश परंपरागत व्याख्याएँ ‘अश्वत्थ-वृक्ष’ को संसार/संसार-प्रपञ्च का रूपक मानती हैं और ‘विषयप्रवालाः’ को इन्द्रिय-विषयों के आकर्षण के रूप में पढ़ती हैं। अकादमिक/शाब्दिक अनुवाद ‘guṇa-pravṛddhā’ (गुणों से वृद्धि/पोषण) और ‘karmānubandhīni’ (कर्म से जुड़े/कर्म-बन्धन कराने वाले) पदों के व्याकरणिक बल पर अधिक जोर देता है। यहाँ दिया गया पाठ ‘…’ के कारण अपूर्ण है; पूर्ण पाठ-परंपरा में इस पाद का समापन सामान्यतः ‘मनुष्यलोके’ के साथ मिलता है।
वृक्ष-रूपक को मनोवैज्ञानिक रूप से आदतों और प्रवृत्तियों के जाल के रूप में पढ़ा जा सकता है: ‘गुण’ (स्वभावगत प्रवृत्तियाँ) मन में प्रतिक्रियात्मक पैटर्न को ‘पोषित’ करते हैं और ‘विषय’ (इन्द्रिय-आकर्षण) नए-नए विचार/इच्छा-प्ररोह की तरह उगते हैं। ‘कर्मानुबन्ध’ यह संकेत देता है कि बार-बार की गई क्रियाएँ और उनसे जुड़ी अपेक्षाएँ मन में बन्धनकारी चक्र बनाती हैं।
यह श्लोक संसार को एक उलटे-सीधे फैलते वृक्ष के रूप में निरूपित करता है, जिसमें गुण-प्रधान प्रकृति के कारण विविध नाम-रूप विकसित होते हैं। इन्द्रिय-विषय ‘प्रवाल’ (कोपल) के रूप में दिखाए गए हैं—यानी अनुभव-जगत का विस्तार। ‘अधश्च मूलानि’ के माध्यम से कर्म-कारणता (action–consequence linkage) को बन्धन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो जीव को पुनः-पुनः अनुभव-क्षेत्र में बाँधे रखता है।
अध्याय 15 में कृष्ण ‘अश्वत्थ’ रूपक द्वारा बन्धन और मुक्ति के विवेक को विकसित करते हैं। 15.2, 15.1 में आरम्भ हुए वृक्ष-वर्णन को आगे बढ़ाकर बताता है कि यह संरचना कैसे ‘गुण’ और ‘कर्म’ के माध्यम से फैलती और स्थिर होती है—जो बाद के श्लोकों में वैराग्य/ज्ञान द्वारा ‘छेदन’ (अर्थात् बन्धन-च्छेद) की भूमिका तैयार करता है।
आधुनिक संदर्भ में यह श्लोक यह देखने का ढाँचा देता है कि कैसे स्वभावगत प्रवृत्तियाँ (गुण) और उपभोग-उन्मुख लक्ष्य (विषय) मिलकर व्यवहार-चक्र बनाते हैं। व्यावहारिक रूप से इसका उपयोग आत्म-पर्यवेक्षण, आदत-निर्माण में विवेक, और कर्म के दीर्घकालिक परिणामों पर ध्यान देकर अधिक जिम्मेदार तथा कम आसक्ति-प्रधान निर्णय लेने में किया जा सकता है।