सर्वभूतहितो मैत्रस्तस्मान्नोद्विजते जन: । समुद्र इव गम्भीर: प्रज्ञातृप्त: प्रशाम्यति,जो सम्पूर्ण भूतोंका हित चाहनेवाला और सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला है, उससे किसी भी पुरुषको उद्वेग नहीं प्राप्त होता है। जो समुद्रके समान गम्भीर एवं उत्कृष्ट ज्ञानरूपी अमृतसे तृप्त है, वही परम शान्तिका भागी होता है
Celui qui veut le bien de tous les êtres et garde une amitié envers tous—nul ne s’alarme à son sujet. Profond comme l’océan, rassasié de l’amrita d’une connaissance sublime—c’est lui qui obtient la paix suprême.
विदुर उवाच