अध्याय ३३७ — ज्ञानमार्ग-वैविध्यप्रश्नः तथा व्यासस्य नारायणोद्भवकथा
Systems of Knowledge and Vyāsa’s Nārāyaṇa-Origin
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें नाययणका महत्त्वविषयक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३३५ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं) ऑपन-- मा बक। अपर षट्त्रिशर्दाधिकत्रिशततमो< ध्याय: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवानपर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान्की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना भीष्म उवाच ततो5तीते महाकल्पे उत्पन्नेडड्रिरस: सुते । बभूवुर्निर्वता देवा जाते देवपुरोहिते,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! तदनन्तर बीते हुए महान् कल्पके आरम्भमें जब अंगिराके पुत्र बृहस्पति उत्पन्न हुए और देवताओंके पुरोहित बन गये, तब देवताओंको बड़ा संतोष प्राप्त हुआ
bhīṣma uvāca | tato 'tīte mahākalpe utpanne 'ṅgirasaḥ sute | babhūvur nirvṛtā devā jāte devapurohite ||
Bhīṣma dit : «Ô Yudhiṣṭhira, ensuite, au commencement d’un grand éon déjà révolu, lorsque Bṛhaspati—fils d’Aṅgiras—naquit et devint le prêtre des dieux, les dieux furent remplis d’une profonde satisfaction.»
भीष्म उवाच