Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka
Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable
२१) 'हे उद्धव! संतोंका परमप्रिय “आत्मा” रूप मैं एकमात्र श्रद्धा-भक्तिसे ही वशीभूत होता हूँ। मेरी भक्ति जन्मतः चाण्डालोंको भी पवित्र कर देती है।” यहाँ “पापयोनय:” पदको स्त्री, वैश्य और शूद्रोंका विशेषण नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वैश्योंकी गणना द्विजोंमें की गयी है। उनको वेद पढ़नेका और यज्ञादि वैदिक कर्मोंके करनेका शास्त्रमें पूर्ण अधिकार दिया गया है। अतः द्विज होनेके कारण वैश्योंको “पापयोनि” कहना नहीं बन सकता। इसके अतिरिक्त छान्दोग्योपनिषदमें जहाँ जीवोंकी कर्मानुरूप गतिका वर्णन है, यह स्पष्ट कहा गया है कि-- तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरज्श्चयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा ।। (अध्याय ५ खण्ड १० मं० ७) “उन जीवोंमें जो इस लोकमें रमणीय आचरणवाले अर्थात् पुण्यात्मा होते हैं, वे शीघ्र ही उत्तम योनि--ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं और जो इस संसारमें कपूय (अधम) आचरणवाले अर्थात् पापकर्मा होते हैं, वे अधमयोनि अर्थात् कुत्तेकी, सूकरकी या चाण्डालकी योनिको प्राप्त करते हैं।' इससे यह सिद्ध है कि वैश्योंकी गणना “पापयोनि” में नहीं की जा सकती। अब रही स्त्रियोंकी बात--सों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी स्त्रियोंका अपने पतियोंके साथ यज्ञादि वैदिक कर्मोंमें अधिकार माना गया है। इस कारणसे उनको भी पापयोनि कहना नहीं बन सकता। सबसे बड़ी अड़चन तो यह पड़ेगी कि भगवान्की भक्तिसे चाण्डाल आदिको भी परमगति मिलनेकी बात, जो कि सर्वशास्त्रसम्मत है और जो भक्तिके महत्त्वको प्रकट करती है, कैसे रहेगी? अतएव पापयोनय:” पदको स्त्री, वैश्य और शूद्रोंका विशेषण न मानकर शूद्रोंकी अपेक्षा भी हीनजातिके मनुष्योंका वाचक मानना ही ठीक प्रतीत होता है। क्योंकि भागवतमें बतलाया है-- किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकड़का यवना: खसादय: । येडन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रया: शुद्धयन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: | (२,जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तवमें जन्मरहित, अनादि और लोकोंका महान् ईश्वर तत्त्वसे जानता है,* वह मनुष्योंमें ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। बुद्धिरज्ञानमसम्मोह:९ < 5 क्षमा सत्यं दम: शम: । सुखं दु:ःखं भवो5भावो भयं चाभयमेव च निश्चय करनेकी शक्ति यथार्थ ज्ञान, असम्मूढता, क्षमा,< सत्य,“ इन्द्रियोंका वशमें करना, मनका निग्रह तथा सुख-दुःख,* उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय* तथा अहिंसा, समता, संतोष तप,£ दान,” कीर्ति और अपकीर्ति-ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकारके भाव मुझसे ही होते हैं।?
arjuna uvāca | yo mām ajam anādiṁ ca vetti lokamaheśvaram | asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate ||
Celui qui Me connaît en vérité comme non‑né, sans commencement, et comme le grand Seigneur des mondes—celui‑là, sans égarement parmi les mortels, est un sage et se trouve délivré de tous les péchés.
अजुन उवाच
True understanding of Krishna’s transcendence—unborn, beginningless, and sovereign over the worlds—dispels delusion and becomes a basis for moral and spiritual purification, culminating in freedom from sin.
In the midst of the Kurukṣetra teaching, Arjuna speaks a verse affirming that the person who rightly knows Krishna’s supreme, birthless nature is not confused by appearances and attains release from sin.