विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index
जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता,“ सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले, अचिन्त्यस्वरूप, सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्यासे अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है, वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबलसे भृकुटीके मध्यमें प्राणको अच्छी प्रकार स्थापित करके फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्यस्वरूप परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है ।। सम्बन्ध- पाँचवें श्लोकमें भगवानका चिन्तन करते-करते मरनेवाले साधारण मनुष्यकी गतिका संक्षेपर्ें वर्णन किया गया; फिर आठवेंसे दसवें श*लीकतक भगवान्के 'अधियज्ञ" नामक सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिके सम्बन्धगें बतलाया;, अब ग्यारहवें शलोकसे तेरहवेंतक परम अक्षर निर्गुण नियाकार प्॑रह्मकी उपासना करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका वर्णन करनेके लिये पहले उस अक्षर ब्रह्मकी प्रशंसा करके उसे बतलाते हैं-- यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागा: । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण प्रवक्ष्ये
arjuna uvāca | yad akṣaraṁ vedavido vadanti viśanti yad yatayo vītarāgāḥ | yad icchanto brahmacaryaṁ caranti tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣye ||
Arjuna dit : «Cette Réalité impérissable dont parlent les connaisseurs du Veda ; celle où entrent les ascètes sans attachement ; et, la désirant, pour laquelle les chercheurs observent la discipline du brahmacarya : de ce but, je te prie de me dire l’essentiel en bref.»
अजुन उवाच