सात्यकिं रभसं युद्धे द्रौणिब्राह्मणपुड्भव: । आजपघानोरसि क्ुद्धो नाराचेन परंतप:,दूसरी ओर शत्रुओंको संताप देनेवाले ब्राह्मण-शिरोमणि द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने कुपित हो युद्धमें अत्यन्त वेगशाली सात्यकिको लक्ष्य करके उनकी छातीमें एक नाराचसे प्रहार किया
De son côté, Aśvatthāmā, fils de Droṇa—fleur des brahmanes et fléau des ennemis—, saisi de colère au combat, visa le fougueux Sātyaki et le frappa à la poitrine d’une flèche nārāca.
संजय उवाच